“हम किसी को दोष नहीं दे सकते अंजलि,” आंटी ने बड़ी सहजता से कहा। “रोहन कोई बुरा बेटा नहीं है। वह बस हमारी ही परछाईं है। उसने वही सीखा जो हमने उसे दिखाया। हम अपने माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी नहीं बने, तो हम किस हक से उम्मीद करें कि रोहन हमारा सहारा बनेगा?
प्रकृति का न्याय बहुत सीधा है बेटा—जो बीज हम बोते हैं, फसल भी उसी की काटनी पड़ती है। अगर हमने अपने वक्त में बबूल बोए हैं, तो आज हम आम की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इसीलिए मैं कभी शिकायत नहीं करती। मैं जानती हूँ कि यह रोहन की नहीं, हमारी अपनी कर्मों की वसीयत है, जिसे हम आज भुगत रहे हैं।”
शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में स्थित वह दो मंजिला मकान हमेशा अपनी खामोशी के लिए जाना जाता था। उस मकान में पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी और उनके सत्तर वर्षीय पति दीनानाथ जी रहते थे। देखने में वह मकान जितना विशाल था, उसके भीतर का सूनापन उतना ही गहरा।
मोहल्ले के लोग अक्सर इस बात पर अचरज करते थे कि उम्र के इस पड़ाव में भी यह दंपति किसी पर निर्भर नहीं था। सुबह सवेरे उठकर घर के आँगन को बुहारने से लेकर, बाजार से ताजी सब्जियाँ और महीने भर का राशन लाने तक का सारा काम दोनों खुद ही निपटा लेते थे। दीनानाथ जी को अक्सर अपनी पुरानी छतरी टेकते हुए बैंक या पोस्ट ऑफिस जाते देखा जा
सकता था, और सुमित्रा देवी धूप में अचार सुखाते या स्वेटर बुनते हुए नजर आ जाती थीं। घर में काम के लिए बस एक बाई आती थी जो झाड़ू-पोछा और बर्तन करके चली जाती थी।
मैं, अंजलि, कुछ महीने पहले ही उनके पड़ोस वाले मकान में किराए पर रहने आई थी। मेरे पति का ट्रांसफर इस शहर में हुआ था और हम दोनों अपनी व्यस्त कॉर्पोरेट जिंदगी में उलझे रहते थे। सुमित्रा आंटी का शांत और सौम्य स्वभाव मुझे बहुत भाता था। जब भी मैं बालकनी में खड़ी होती, वे मुस्कुराकर हालचाल पूछ लेतीं।
धीरे-धीरे मेरा उनके घर आना-जाना शुरू हो गया। मैं अक्सर हैरान रह जाती थी यह देखकर कि कैसे सुमित्रा आंटी अकेले ही पूरे घर को शीशे की तरह चमका कर रखती थीं। दीनानाथ जी को शुगर और ब्लड प्रेशर की बीमारी थी, उनकी दवाइयों का समय, उनके परहेज का खाना, सब कुछ सुमित्रा आंटी घड़ी की सुइयों की तरह सटीक तरीके से संभालती थीं।
उनका एक इकलौता बेटा था, रोहन, जो शहर के ही दूसरे, पॉश इलाके में अपनी पत्नी शिखा और एक छोटे बच्चे के साथ रहता था। रोहन एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और उसकी पत्नी भी एक जानी-मानी इंटीरियर डिजाइनर थी। दोनों की जिंदगी बहुत तेज रफ्तार से भाग रही थी।
महीने-दो महीने में कभी एक बार उनकी बड़ी सी गाड़ी सुमित्रा आंटी के दरवाजे पर आकर रुकती। रोहन और शिखा दो-तीन घंटे के लिए आते, बच्चा पूरे घर में उधम मचाता, शिखा सोफे पर बैठकर अपने मोबाइल में उलझी रहती और रोहन अपने पिता से कुछ औपचारिक बातें करता।
सुमित्रा आंटी उन चंद घंटों में मानो अपनी सारी ममता उड़ेल देना चाहती थीं। वे रसोई में पसीने से लथपथ होकर शिखा की पसंद का पनीर, रोहन के लिए खीर और पोते के लिए तरह-तरह के पकवान बनातीं। जब वे लोग वापस जाते, तो घर पहले से भी ज्यादा खाली और बिखरा हुआ लगने लगता था।
मुझे यह देखकर बहुत कोफ्त होती थी। एक दिन दीनानाथ जी अचानक बाथरूम में फिसल गए। उनके घुटने में गहरी चोट आई और वे चलने-फिरने से लाचार हो गए। सुमित्रा आंटी ने घबराहट में मुझे फोन किया। मैं तुरंत अपने पति के साथ वहाँ पहुँची और हम उन्हें अस्पताल लेकर गए। डॉक्टर ने तीन हफ्ते के पूर्ण आराम की सलाह दी।
जब मैंने सुमित्रा आंटी से कहा कि वे रोहन को फोन करके बुला लें, तो उन्होंने बड़ी शांति से कहा, “बेटा, उसकी मीटिंग्स चल रही होंगी। वीकेंड पर आ जाएगा, अभी उसे परेशान करना ठीक नहीं है।” मैं हैरान थी। पिता बिस्तर पर हैं और माँ को बेटे की मीटिंग्स की चिंता है!
वीकेंड पर रोहन और शिखा आए जरूर, लेकिन उनकी बातों में चिंता से ज्यादा औपचारिकता थी। शिखा ने आते ही कहा, “मम्मी जी, आपको पापा का ध्यान रखना चाहिए ना। इस उम्र में गिरना बहुत रिस्की होता है। हमने तो फुल-टाइम नर्स के लिए भी कहा था, पर आप लोग सुनते ही नहीं।
” रोहन ने कुछ फल मेज पर रखे और बोला, “पापा, मैं एक अच्छा डॉक्टर रेफर कर देता हूँ। मुझे कल ही एक कॉन्फ्रेंस के लिए बैंगलोर निकलना है, शिखा भी अपने प्रोजेक्ट में बिजी है। आप लोग प्लीज अपना ख्याल रखिए। कोई जरूरत हो तो अंजलि जी तो हैं ही पड़ोस में।”
वे दोनों कुछ देर रुक कर चले गए। उनके जाने के बाद मैंने देखा, सुमित्रा आंटी चुपचाप रसोई में जाकर उनके झूठे बर्तन धो रही थीं। उनके चेहरे पर न कोई शिकायत थी, न आँखों में आँसू। वे इतनी निर्विकार थीं जैसे उन्हें पहले से ही पता हो कि यही होने वाला है। मुझसे रहा नहीं गया। मैं रसोई में गई और उनके हाथ से जूठी प्लेट लेते हुए झल्ला कर बोली, “आंटी, आप यह सब कैसे बर्दाश्त कर लेती हैं? आपको गुस्सा नहीं आता?
आपने अपनी पूरी जिंदगी, अपना खून-पसीना उस बेटे को बड़ा करने में लगा दिया, और आज जब आपके पति बिस्तर पर हैं, तो वह दो घंटे की फॉर्मेलिटी करके चला गया? आपकी बहू को तो एक गिलास पानी तक खुद से लेना गंवारा नहीं। आप उनको डांटती क्यों नहीं? आप अपना हक क्यों नहीं जतातीं?”
सुमित्रा आंटी ने नल बंद किया, तौलिये से हाथ पोंछे और मेरी तरफ देखकर बहुत ही मद्धम, लेकिन गहरी मुस्कान के साथ बोलीं, “किस बात का गुस्सा अंजलि? और किस पर गुस्सा? जो फसल हम काट रहे हैं, उसका बीज तो हमने खुद ही बोया था।”
मैं उनकी बात समझ नहीं पाई। मैंने पूछा, “मतलब? आप इतनी अच्छी हैं, आपने जरूर उनकी हर खुशी पूरी की होगी। फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”
सुमित्रा आंटी मुझे हाथ पकड़कर बाहर आँगन में बिछी चारपाई पर ले आईं। सर्दियों की हल्की धूप आँगन में फैली थी। वे कुछ पल चुप रहीं, जैसे अपने अतीत के पन्नों को पलट रही हों। फिर उन्होंने एक ठंडी सांस ली और कहना शुरू किया।
“अंजलि बेटा, बात आज से करीब पैंतीस साल पुरानी है। जब मेरी शादी दीनानाथ जी से हुई थी, तब हम एक छोटे से कस्बे में रहते थे। मेरे सास-ससुर बहुत सीधे और पारंपरिक विचारों वाले थे। मेरा पति पढ़ने में बहुत होशियार था, उसने शहर में आकर नौकरी ढूँढ ली। गाँव में मेरे ससुर जी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी। मेरी सास को उम्मीद थी कि हम दोनों वहीं रहकर उनकी सेवा करेंगे, या कम से कम उन्हें अपने साथ शहर ले आएँगे। लेकिन… लेकिन मुझे वह पाबंदियों वाली जिंदगी पसंद नहीं थी। मैं अपनी आजादी चाहती थी। मुझे अपनी ‘प्राइवेसी’ चाहिए थी।”
आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई थी, “मैंने तुम्हारे अंकल पर दबाव डाला कि हम अपना अलग घर बसाएंगे। हम शहर आ गए। शुरू में तो हम त्योहारों पर गाँव जाते थे, लेकिन फिर रोहन पैदा हो गया। हमारी जिम्मेदारियां और बहाने दोनों बढ़ गए। कभी कहते कि बच्चे की पढ़ाई का नुकसान होगा, कभी कहते कि हमारी छुट्टियां नहीं हैं। मेरे सास-ससुर अकेले उस बड़े से पुश्तैनी मकान में एक-दूसरे का सहारा बने रहे। वे बीमार पड़ते तो पड़ोसियों की मदद लेते, ठीक वैसे ही जैसे आज हम तुम्हारी मदद ले रहे हैं।”
मैं अवाक होकर उन्हें सुन रही थी। मुझे सुमित्रा आंटी के भीतर छिपी उस युवा, महत्वाकांक्षी औरत का अक्स दिखाई दे रहा था, जिसने कभी अपने स्वार्थ के लिए रिश्तों की बलि चढ़ाई थी।
वे आगे बोलीं, “मुझे आज भी वह दिन याद है। मेरे ससुर जी को दिल का दौरा पड़ा था। गाँव से तार आया था। हम पहुँचे जरूर, लेकिन उनके आखिरी वक्त में नहीं पहुँच सके। मेरी सास उस दिन दरवाजे की चौखट पर बैठकर पत्थर की तरह शून्य हो गई थीं। उन्होंने हमें ताना नहीं मारा, कोई शिकायत नहीं की, बस इतना कहा था—’जाओ बेटा, अपना घर संभालो। अब यहाँ क्या रखा है।’ हमने उनका वह खालीपन नहीं समझा। हम उन्हें वहीं अकेला छोड़कर अपने इस नए मकान में आ गए, जिसे हमने बड़ी मेहनत से बनाया था। हमने सोचा था कि हम बहुत समझदार हैं, हमने अपनी जिंदगी को बहुत अच्छे से सेट कर लिया है।”
उन्होंने मेरी आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “बेटा, हमने रोहन को भी वही संस्कार दिए। हमने उसे बताया कि दुनिया में सबसे जरूरी चीज है ‘सक्सेस’ (सफलता), पैसा और अपना खुद का एक अलग स्पेस। हमने कभी उसे यह सिखाया ही नहीं कि परिवार का मतलब सिर्फ एक छत के नीचे रहना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को साझा करना होता है। हमने ही जॉइंट फैमिली को तोड़कर इस ‘न्यूक्लियर फैमिली’ की नींव रखी थी। हमने अपनी प्राइवेसी के नाम पर जो दीवारें खड़ी की थीं, रोहन आज बस उसी दीवार के दूसरी तरफ अपनी जिंदगी जी रहा है।”
सुमित्रा आंटी ने एक पल का ठहराव लिया और मेरी तरफ देखकर एक ऐसा सवाल पूछा जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। “अंजलि, तुम मुझे रोहन के लिए कोस रही हो। लेकिन जरा अपने दिल पर हाथ रखकर बताओ… तुम्हारे सास-ससुर कहाँ हैं? क्या तुम उनके साथ रहती हो? क्या तुम्हें अपनी सास की दखलंदाजी बर्दाश्त होती? क्या तुमने अपनी आजादी के लिए अपने पति को उनसे दूर नहीं किया?”
मेरे पास उनके इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मेरे सास-ससुर बनारस में अकेले रहते थे। मैं और मेरे पति भी तो साल में सिर्फ एक बार दिवाली पर उनके पास जाते थे, और वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि हमें समाज में अपनी ‘अच्छी इमेज’ बनाए रखनी होती थी। वहाँ जाकर भी मैं अक्सर इस बात पर चिढ़ जाती थी कि मेरी सास मेरे कपड़ों या मेरे सोने के समय को लेकर क्यों टोकती हैं। मैंने ही तो अपने पति से कहकर यह ट्रांसफर इस शहर में करवाया था ताकि हम उन रोज-रोज की चिकचिक से दूर शांति से रह सकें।
सुमित्रा आंटी की बातें मेरे लिए कोई कहानी नहीं थीं, वह मेरा अपना आईना था जिसमें मुझे अपना भविष्य नजर आ रहा था।
“हम किसी को दोष नहीं दे सकते अंजलि,” आंटी ने बड़ी सहजता से कहा। “रोहन कोई बुरा बेटा नहीं है। वह बस हमारी ही परछाईं है। उसने वही सीखा जो हमने उसे दिखाया। हम अपने माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी नहीं बने, तो हम किस हक से उम्मीद करें कि रोहन हमारा सहारा बनेगा? प्रकृति का न्याय बहुत सीधा है बेटा—जो बीज हम बोते हैं, फसल भी उसी की काटनी पड़ती है। अगर हमने अपने वक्त में बबूल बोए हैं, तो आज हम आम की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इसीलिए मैं कभी शिकायत नहीं करती। मैं जानती हूँ कि यह रोहन की नहीं, हमारी अपनी कर्मों की वसीयत है, जिसे हम आज भुगत रहे हैं।”
मैं सुमित्रा आंटी के पास से उठी तो मेरे कदम भारी हो रहे थे। शाम घिर आई थी और उस पुराने मकान के आँगन में अंधेरा फैलने लगा था। लेकिन मेरे दिमाग में अचानक से एक तेज रोशनी हो गई थी। मैंने घर आकर सबसे पहले अपना मोबाइल उठाया और बनारस का नंबर डायल किया। घंटी बज रही थी और हर बीतते सेकंड के साथ मुझे यह अहसास हो रहा था कि रिश्ते कोई सौदेबाजी नहीं होते, वे एक निवेश होते हैं, जो वक्त रहते नहीं किया गया तो बुढ़ापे में सिवाय खालीपन के कोई रिटर्न नहीं मिलता।
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#’कर्मों की वसीयत’