सपनों की उड़ान और रिश्तों की दहलीज

शाम का धुंधलका गहराने लगा था और बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। ड्राइंग रूम में टीवी पर समाचार चल रहे थे, जहाँ विक्रम अपने मोबाइल में उलझा हुआ था, पास ही सोफे पर बैठी उसकी माँ सुमित्रा जी स्वेटर बुन रही थीं और पिता रघुनाथ जी अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अखबार के पन्नों में खोए हुए थे।

घर का माहौल रोज़मर्रा की तरह ही शांत और सामान्य था। तभी दरवाजे की घंटी बजी। काव्या हमेशा की तरह अपनी चाबी से दरवाज़ा खोलकर अंदर आई, लेकिन आज उसकी चाल में एक अजीब सी फुर्ती थी और चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पूरे कमरे को रोशन कर रही थी। उसने अपना बैग सोफे पर फेंका और एक गहरी, उत्साह भरी सांस लेते हुए बोली, “आप लोगों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी है!”

विक्रम ने मोबाइल से नज़रें हटाईं, सुमित्रा जी के हाथ रुक गए और रघुनाथ जी ने भी अखबार थोड़ा नीचे कर लिया। काव्या की आँखों में खुशी के आंसू तैर रहे थे। उसने विक्रम की तरफ देखते हुए कहा, “विक्रम, मुझे प्रमोशन मिल गया है! मैं अब कंपनी की वाइस प्रेसिडेंट बन गई हूँ!”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। यह खबर इतनी बड़ी थी कि किसी को तुरंत प्रतिक्रिया समझ नहीं आई। रघुनाथ जी के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान तैर गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ बोल पाते, काव्या ने अपनी बात पूरी की, “लेकिन… इसके साथ ही मेरा ट्रांसफर भी हो गया है। मुझे अगले महीने से मुंबई हेड ऑफिस जॉइन करना होगा। यह मेरे करियर का सबसे बड़ा मौका है!”

मुंबई का नाम सुनते ही विक्रम के चेहरे की रंगत उड़ गई। उसकी त्यौरियां चढ़ गईं और आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट घुल गई। “मुंबई? और तुमने इतनी आसानी से कह दिया कि तुम्हें जाना होगा? मेरी जॉब यहाँ दिल्ली में है, मेरा सेटल करियर है। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे मुंबई नहीं जा सकता। तुमने यह फैसला लेने से पहले मुझसे एक बार भी पूछना या सलाह लेना ज़रूरी नहीं समझा?”

काव्या की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए नरमी से कहा, “विक्रम, मैंने ट्रांसफर नहीं माँगा था। यह प्रमोशन के साथ अनिवार्य है। यह एक ऐसी अपॉर्चुनिटी है जिसके लिए मैंने पिछले सात सालों से दिन-रात एक किया है। यह सिर्फ एक शहर बदलने की बात नहीं है, यह मेरे काम का सम्मान है। और मैंने फैसला कहाँ लिया है, मैं तो बस आप सबको बता रही हूँ। हम मिलकर कोई रास्ता निकाल सकते हैं।”

“रास्ता क्या निकालना है? तुम्हें जाना ही नहीं चाहिए। साफ मना कर दो,” विक्रम ने अपनी आवाज़ ऊंची करते हुए कहा। “तुम्हें क्या लगता है, तुम घर की मुखिया हो गई हो जो अपने फैसले खुद थोपोगी?”

बहस बढ़ती जा रही थी। काव्या हैरान थी कि जिस सफलता का जश्न मनाया जाना चाहिए था, वह एक अपराध में तब्दील हो रही थी। तभी सुमित्रा जी, जो अब तक खामोशी से सब सुन रही थीं, अपनी बुनाई एक तरफ रखते हुए बोलीं, “विक्रम सही कह रहा है बहू। एक औरत के लिए उसका घर, उसका पति ही उसकी असली तरक्की होती है। तुम इतनी दूर अकेली कैसे रहोगी? और सच कहूँ तो, तुम घर के कामों में कितनी लापरवाह हो, यह किसी से छिपा नहीं है।”

काव्या ने अविश्वास से अपनी सास की ओर देखा। सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी, “तुम्हें बुरा लगे तो लगे, पर सच यही है। नहाने के बाद गीला तौलिया तुम आज भी बिस्तर पर छोड़ देती हो। सुबह की जल्दी में तुम्हारा लैपटॉप और फाइलें डाइनिंग टेबल पर बिखरी रहती हैं। किचन में घुसने में तुम्हें जोर आता है, सब कुछ तो कामवाली के भरोसे चलता है। जो लड़की अपना घर सलीके से नहीं रख सकती, वो एक नए शहर में जाकर वाइस प्रेसिडेंट की कुर्सी क्या संभालेगी? वहाँ तुम्हें कौन पानी का गिलास पकड़ाएगा?”

काव्या के होंठ कांपने लगे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी व्यावसायिक योग्यता को उसके गीले तौलिए और किचन के काम से क्यों तौला जा रहा था। क्या एक औरत की सारी डिग्रियां और उसकी मेहनत सिर्फ इसलिए शून्य हो जाती है क्योंकि वह गोल रोटियां नहीं बना पाती?

कमरे का माहौल बेहद घुटन भरा हो गया था। विक्रम अपनी माँ की बातों से और भी ज्यादा मजबूत महसूस कर रहा था। तभी रघुनाथ जी, जो अब तक खामोश थे, ने अपना अखबार पूरी तरह से फोल्ड करके मेज पर रखा। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और एक गहरी, शांत लेकिन सख्त आवाज़ में बोले, “सुमित्रा, बस करो।”

सुमित्रा जी और विक्रम दोनों चौंक कर रघुनाथ जी की तरफ देखने लगे। रघुनाथ जी ने सुमित्रा जी की आँखों में देखते हुए कहा, “तुम्हें बहू के गीले तौलिए और बिखरी हुई फाइलों की बहुत चिंता हो रही है ना? लेकिन जरा याद करो अपनी बेटी शिखा को। जब शिखा को लंदन की यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप मिली थी, तब क्या तुमने उसे यह कहकर रोका था कि उसे तो चाय तक बनानी नहीं आती? शिखा तो अपने कपड़े भी खुद वाशिंग मशीन में नहीं डालती थी, बीमार होने पर दवा तक समय पर नहीं लेती थी। तब तो तुमने पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी कि तुम्हारी बेटी विदेश जा रही है। जब तुमने अपनी बेटी की लापरवाही को उसकी सफलता के आड़े नहीं आने दिया, तो काव्या की छोटी-छोटी कमियों को उसकी इतनी बड़ी तरक्की के सामने दीवार क्यों बना रही हो?”

रघुनाथ जी के शब्दों ने कमरे में एक ऐसा सच उछाला था जिसकी गूंज से सुमित्रा जी तिलमिला उठीं। उनका चेहरा लाल हो गया, लेकिन वह कोई जवाब नहीं दे पाईं। मन ही मन वह भुनभुना रही थीं कि बेटी और बहू में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। बेटी विदेश जाए तो शान बढ़ती है, लेकिन बहू अगर पति से दो कदम आगे निकल जाए, तो घर का ढांचा चरमरा जाता है। उन्हें इस बात का भी मलाल हो रहा था कि उन्होंने एक पढ़ी-लिखी और महत्वाकांक्षी लड़की को अपने घर की बहू क्यों बनाया।

रघुनाथ जी अब विक्रम की तरफ मुड़े। “और तुम, विक्रम। एक पति होने के नाते तुम्हारा फर्ज़ था कि तुम आज सबसे ज्यादा खुश होते। पर मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारी पत्नी की सफलता तुम्हें खुशी नहीं, बल्कि हीन भावना दे रही है। तुम इस बात से परेशान नहीं हो कि वो मुंबई जा रही है, तुम इस बात से परेशान हो कि वो अब तुमसे बड़े पद पर होगी, तुमसे ज्यादा कमाएगी। यह तुम्हारा अहम बोल रहा है, तुम्हारा प्यार नहीं। इसे जाने दो विक्रम, इसे उड़ने दो। इसने अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया है।”

पिता की इतनी खरी-खोटी सुनने के बाद विक्रम के पास कहने को कुछ नहीं बचा था, लेकिन उसके अंदर का पुरुषवादी अहम बुरी तरह से आहत हो चुका था। वह बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया।

काव्या ने मुंबई जाने की तैयारी शुरू कर दी। उसके पास कोई और विकल्प नहीं था। उसने विक्रम को कई बार समझाने की कोशिश की, लॉन्ग डिस्टेंस मैरिज के फायदे गिनाए, हर वीकेंड मिलने का वादा किया, लेकिन विक्रम ने जैसे अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर ली थी। उसका व्यवहार पूरी तरह से उखड़ा-उखड़ा और रूखा हो गया था। वह काव्या से सीधे मुँह बात तक नहीं करता था। काव्या अंदर ही अंदर टूट रही थी। जिस इंसान के साथ उसने अपनी हर खुशी बांटने का सपना देखा था, वही इंसान आज उसकी खुशी का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा था।

जाने वाले दिन से एक शाम पहले, काव्या उदास मन से अपने कमरे में सूटकेस पैक कर रही थी। तभी रघुनाथ जी कमरे में आए। काव्या ने उनके पैर छुए। रघुनाथ जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, मुझे पता है तुम विक्रम के बर्ताव से दुखी हो। लेकिन तुम अपने कदम पीछे मत हटाना। तुम्हारे पास एक बहुत बड़ा आसमान है। विक्रम अभी अपने अहम और समाज की उस पुरानी सोच के बीच फंसा हुआ है जहाँ पति का हमेशा पत्नी से ऊपर होना ज़रूरी माना जाता है। उसे थोड़ा वक्त दो। जब उसकी आँखों से यह पुरुषार्थ का पर्दा हटेगा, तो उसे तुम्हारी अहमियत समझ आएगी। तुम बस सब्र रखना और अपने काम पर ध्यान देना।”

काव्या की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसे लगा जैसे उसे अपने मायके वाला पिता फिर से मिल गया हो। जिस पिता ने बचपन से उसे हमेशा आगे बढ़ने की सीख दी थी, आज वही अक्स उसे अपने ससुर में दिखाई दे रहा था।

अगले दिन सुबह काव्या जब कैब में बैठने के लिए घर से निकली, तो विक्रम उसे छोड़ने बाहर तक नहीं आया। सुमित्रा जी ने भी बस रस्म अदायगी के लिए उसे विदा किया। अंदर ही अंदर सुमित्रा जी कुढ़ रही थीं कि उनके पति ने एक बहू का साथ देकर उनके बेटे को नीचा दिखाया है। लेकिन रघुनाथ जी दरवाज़े पर खड़े होकर अपनी बहू को हाथ हिलाकर तब तक विदा करते रहे, जब तक कैब गली के नुक्कड़ से ओझल नहीं हो गई। काव्या जा रही थी—अपने नए सफर पर, आँखों में कुछ दर्द, लेकिन दिल में एक नई उम्मीद और उड़ान भरने का हौसला लिए।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या विक्रम का अपनी पत्नी की तरक्की से नाराज़ होना स्वाभाविक था या यह हमारे समाज में रची-बसी उस पुरुषवादी सोच का नतीजा है जो आज भी एक औरत को अपने से आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकती? क्या काव्या ने मुंबई जाने का फैसला लेकर सही किया? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं। आपके नज़रिए का हमें इंतज़ार रहेगा।

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