सुधाकर बाबू ने तुरंत बीच में टोकते हुए कहा, “अरे तो इसमें सोचने वाली क्या बात है? पागल है क्या तू? पुणे में क्या रखा है! तू अमेरिका जाएगा। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस सीलन भरे घर में और दफ्तर की घिसी हुई कुर्सियों पर बिता दी,
ताकि तू खुले आसमान में उड़ सके। अपने देश में, यहाँ धक्के खाने के अलावा कुछ नहीं रखा है। तू वहाँ जा, डॉलर कमा। हम भी लोगों को गर्व से बताएँगे कि हमारा बेटा अमेरिका में अफसर है!”
अंशुल ने अपनी माँ की तरफ देखा। रेवती कुछ नहीं बोल रही थी। वह जानती थी कि उसके पति का सपना बेटे को आसमान की ऊँचाइयों पर देखना है। उसने अपने आँसुओं को पल्लू से पोंछा, चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाई और बोली, “तेरे बाबूजी ठीक कह रहे हैं बेटा। पुणे-वुणे में क्या रखा है।
तू अमेरिका ही जा। हम तो यहाँ जैसे-तैसे जी ही लेंगे, हमारी क्या है। तू बस खूब तरक्की कर। चल, मैं भगवान को प्रसाद चढ़ाकर आती हूँ।” यह कहकर रेवती तेजी से रसोई की तरफ मुड़ गई ताकि कोई उसके छलकते आँसुओं को न देख सके।
सुधाकर बाबू के पुराने पुश्तैनी मकान के दालान में आज एक अजीब सी खामोशी थी, लेकिन इस खामोशी में भी एक मीठी सी प्रतीक्षा घुली हुई थी। सावन का महीना था और बाहर हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। मिट्टी की सोंधी महक पूरे घर में फैली थी, लेकिन सुधाकर बाबू का ध्यान आज न तो मौसम पर था और न ही अपने प्रिय अखबार पर,
जिसे वे पिछले एक घंटे से उल्टा पकड़े बैठे थे। उनकी निगाहें बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ जाती थीं। रसोई में उनकी पत्नी, रेवती, चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाए हुए बार-बार बाहर झाँक रही थी। आज उनका इकलौता बेटा, अंशुल, दिल्ली से अपने फाइनल इंटरव्यू के नतीजे लेकर लौटने वाला था।
अंशुल एक बेहद होनहार और मेहनती लड़का था। उसने वास्तुकला (आर्किटेक्चर) की पढ़ाई की थी। सुधाकर बाबू एक साधारण से सरकारी क्लर्क रहे थे। अपनी पूरी ज़िंदगी उन्होंने पाई-पाई जोड़कर अपने बेटे की पढ़ाई पर लगा दी थी। यहाँ तक कि अंशुल के कॉलेज के आखिरी साल की फीस भरने के लिए रेवती को अपने पुश्तैनी कंगन तक गिरवी रखने पड़े थे। अंशुल इस बात को बहुत गहराई से जानता था।
वह जानता था कि उसके माता-पिता के झुर्रियों भरे चेहरों के पीछे अनगिनत समझौते और बेहिसाब त्याग छिपे हैं। पिछले छह महीनों से वह नौकरी के लिए दर-दर भटक रहा था। उसकी काबिलियत में कोई कमी नहीं थी, लेकिन सही अवसर मानो उससे आँख-मिचौली खेल रहा था। हर रात सुधाकर बाबू और रेवती भगवान के सामने बस यही प्रार्थना करते थे कि उनके बेटे की मेहनत रंग लाए।
तभी बाहर लोहे के गेट के खुलने की चरमराहट हुई। रेवती ने आनन-फानन में আঁচ धीमी की और दौड़कर दालान में आ गई। सामने अंशुल खड़ा था। बारिश की वजह से उसके बाल हल्के भीग गए थे, लेकिन उसके चेहरे पर जो चमक थी, वह बादलों के बीच से निकलने वाली धूप से भी ज्यादा तेज़ थी। उसके हाथों में मिठाई का एक बड़ा सा डिब्बा था। उसे देखते ही सुधाकर बाबू अपनी आरामकुर्सी से ऐसे उछल पड़े जैसे उनके पैरों में जवानी की फुर्ती लौट आई हो।
“बाबूजी! माँ!” अंशुल ने लगभग चिल्लाते हुए कहा और आगे बढ़कर दोनों के पैर छुए। “नौकरी मिल गई बाबूजी, नौकरी मिल गई! और एक नहीं, दो-दो जगह से बुलावा आया है।”
रेवती की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। ये खुशी के आँसू थे, उस तपस्या के पूरे होने के आँसू थे जो उन्होंने बरसों तक की थी। उसने अपने बेटे का माथा चूम लिया और बोली, “मुझे पता था मेरे लाल, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। जल्दी बता, कहाँ मिली है नौकरी?”
अंशुल ने अपना भीगा हुआ बैग सोफे पर रखा और उसमें से दो लिफाफे निकाले। उसकी उँगलियाँ खुशी से हल्की-हल्की कांप रही थीं। उसने पहला लिफाफा सुधाकर बाबू के हाथ में रखा। “बाबूजी, यह पहला ऑफर है। यह अमेरिका की सबसे नामी आर्किटेक्चर फर्म से है। उन्होंने मेरा प्रोजेक्ट देखकर मुझे सीधे सीनियर डिज़ाइनर की पोस्ट दी है। सैलरी इतनी है कि हम एक साल में अपना यह पुराना घर तोड़कर महल बना सकते हैं, आपके सारे कर्ज़े खत्म हो जाएंगे और माँ के कंगन भी वापस आ जाएंगे।”
अमेरिका का नाम सुनते ही सुधाकर बाबू की आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके हाथ कांपने लगे। अमेरिका! उनका बेटा अमेरिका जाएगा! जिस आदमी ने ज़िंदगी भर अपने शहर की सीमा के बाहर मुश्किल से ही कदम रखा था, उसका बेटा सात समंदर पार जाने वाला था। उनकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई।
लेकिन रेवती के चेहरे का रंग अचानक बदल गया। अमेरिका? उसका बेटा इतनी दूर चला जाएगा? जहाँ से चाहकर भी वह उसे देखने नहीं आ पाएगा? माँ का दिल तुरंत सारी दौलत, सारे ऐशो-आराम भूलकर अपने बेटे के वियोग की कल्पना से सिहर उठा। उसने भारी मन से पूछा, “और… और दूसरा लिफाफा किसका है बेटा?”
अंशुल ने दूसरा लिफाफा निकालते हुए कहा, “माँ, दूसरा ऑफर पुणे की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी से है। कंपनी अच्छी है, उभरती हुई है, लेकिन… अमेरिका वाली कंपनी के मुकाबले पैकेज बहुत कम है। मतलब, गुज़ारा बहुत अच्छे से हो जाएगा, कुछ बचत भी हो जाएगी, पर वो वाली बात नहीं होगी जो अमेरिका वाली नौकरी में है।”
सुधाकर बाबू ने तुरंत बीच में टोकते हुए कहा, “अरे तो इसमें सोचने वाली क्या बात है? पागल है क्या तू? पुणे में क्या रखा है! तू अमेरिका जाएगा। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस सीलन भरे घर में और दफ्तर की घिसी हुई कुर्सियों पर बिता दी, ताकि तू खुले आसमान में उड़ सके। अपने देश में, यहाँ धक्के खाने के अलावा कुछ नहीं रखा है। तू वहाँ जा, डॉलर कमा। हम भी लोगों को गर्व से बताएँगे कि हमारा बेटा अमेरिका में अफसर है!”
अंशुल ने अपनी माँ की तरफ देखा। रेवती कुछ नहीं बोल रही थी। वह जानती थी कि उसके पति का सपना बेटे को आसमान की ऊँचाइयों पर देखना है। उसने अपने आँसुओं को पल्लू से पोंछा, चेहरे पर एक झूठी मुस्कान सजाई और बोली, “तेरे बाबूजी ठीक कह रहे हैं बेटा। पुणे-वुणे में क्या रखा है। तू अमेरिका ही जा। हम तो यहाँ जैसे-तैसे जी ही लेंगे, हमारी क्या है। तू बस खूब तरक्की कर। चल, मैं भगवान को प्रसाद चढ़ाकर आती हूँ।” यह कहकर रेवती तेजी से रसोई की तरफ मुड़ गई ताकि कोई उसके छलकते आँसुओं को न देख सके।
उस रात घर में मिठाई तो बंटी, पर एक अजीब सी बेचैनी हर कमरे में तैर रही थी। सुधाकर बाबू देर रात तक अपने रिश्तेदारों को फोन करके बेटे के अमेरिका जाने की खबर देते रहे। रेवती रसोई में बर्तन मांजते हुए चुपचाप रोती रही। अंशुल अपने कमरे में लेटा छत के पंखे को घूर रहा था। उसकी आँखों के सामने पिछले पच्चीस सालों की पूरी फिल्म चल रही थी।
उसे याद आया कि कैसे एक बार जब उसे तेज़ बुखार था, तो सुधाकर बाबू उसे तेज बारिश में अपने कंधों पर लादकर दो किलोमीटर दूर डॉक्टर के पास ले गए थे। उसे याद आया कि कैसे जब भी घर में कोई अच्छा फल आता था, तो रेवती हमेशा यह कहकर उसे खिला देती थी कि उसे वह फल पसंद नहीं है। क्या इन्हीं माँ-बाप को छोड़कर वह सात समंदर पार पैसा कमाने चला जाए? क्या उस पैसे की चमक इन बूढ़ी आँखों के अकेलेपन को दूर कर पाएगी? जब बाबूजी के घुटनों में दर्द होगा, तो क्या अमेरिका से भेजे गए डॉलर उनके पैर दबाएंगे? जब माँ को रात में घबराहट होगी, तो क्या उसका मोटा बैंक बैलेंस उन्हें पानी का गिलास थमाएगा?
अंशुल रात भर करवटें बदलता रहा। एक तरफ उसका शानदार करियर, ऐशो-आराम और दुनिया की हर सुख-सुविधा थी। दूसरी तरफ वे झुर्रियों वाले हाथ थे जिन्होंने उसे चलना सिखाया था। सुबह की पहली किरण के साथ उसके दिल में चल रहा द्वंद्व शांत हो गया। उसने एक बहुत गहरा और अडिग फैसला ले लिया था।
सुबह जब सुधाकर बाबू चाय पी रहे थे और रेवती उनके लिए नाश्ता ला रही थी, अंशुल अपने कमरे से बाहर आया। उसके हाथ में सिर्फ एक लिफाफा था। वह सीधा आकर अपने पिता के सामने ज़मीन पर बैठ गया।
“बाबूजी, मैंने फैसला कर लिया है,” अंशुल ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा।
सुधाकर बाबू ने उत्साह से कहा, “शाबाश मेरे शेर! तो कब की टिकट बुक करनी है अमेरिका की? मुझे पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया पता करनी पड़ेगी, आखिर हम भी तो तुझसे मिलने आएँगे कभी-कभी।”
अंशुल ने पिता के घुटनों पर हाथ रखते हुए कहा, “बाबूजी, मुझे कहीं का पासपोर्ट नहीं बनवाना है। परसों मेरी पुणे की ट्रेन है। मैं पुणे वाली कंपनी जॉइन कर रहा हूँ।”
सुधाकर बाबू के हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। उनका चेहरा गुस्से और निराशा से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रहा है तू? तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? अमेरिका जैसे मौके को लात मारकर तू पुणे जाएगा? उन चंद रुपयों के लिए? मैंने तुझे इसलिए पढ़ाया था कि तू ज़िंदगी भर साधारण बनकर रह जाए?”
रेवती भी हैरान होकर अंशुल को देखने लगी।
अंशुल ने बहुत शांति से अपने पिता की आँखों में देखा और बोला, “बाबूजी, साधारण बनकर नहीं रहूँगा, बहुत मेहनत करूँगा और पुणे में ही अपना नाम बनाऊँगा। लेकिन अमेरिका नहीं जा सकता। आपने कहा कि देश में कुछ नहीं रखा है। आपने गलत कहा बाबूजी। मेरे देश में, मेरी इस ज़मीन पर मेरे भगवान रहते हैं… आप और माँ। पैसा बहुत कमा लूँगा, शायद अमेरिका से भी ज्यादा कमा लूँगा एक दिन, पर अगर उस पैसे को खर्च करते समय आपके चेहरे की मुस्कान देखने के लिए मुझे वीडियो कॉल का इंतज़ार करना पड़े, तो वो पैसा मेरे किस काम का?”
सुधाकर बाबू अवाक रह गए। उनका गुस्सा थोड़ा कम हुआ, पर आवाज़ में अब भी तल्खी थी, “तू जज़्बाती हो रहा है अंशुल। ये दुनिया जज़्बातों से नहीं, पैसों से चलती है। हम बूढ़ों का क्या है, आज हैं कल नहीं। हमारी वजह से अपना भविष्य मत बिगाड़।”
अंशुल मुस्कुराया, उसकी आँखों में नमी थी। “बाबूजी, आपने मुझे उड़ना ज़रूर सिखाया है, लेकिन मेरे आसमान का चाँद आप दोनों ही हो। जब मैं छोटा था, तो क्या आपने मुझे छोड़कर किसी और शहर में वो नौकरी जॉइन की थी जहाँ आपको ज्यादा पैसे मिल रहे थे? नहीं ना? क्योंकि आप मुझे अपने से दूर नहीं करना चाहते थे। तो आज आप मुझसे यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि मैं अपनी तरक्की के लिए आपको इस बुढ़ापे में अकेला छोड़ दूँ? पुणे यहाँ से बस एक रात का सफर है। जब चाहूँगा, वीकेंड पर घर आ जाऊँगा। जब आप बीमार होंगे, तो मैं आपके पास होऊँगा। अमेरिका में रहकर मैं एक सफल आर्किटेक्ट तो बन जाऊँगा, लेकिन एक असफल बेटा बनकर मैं वो सफलता नहीं जी पाऊँगा बाबूजी।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सिर्फ बाहर गिरती बारिश की बूंदों की आवाज़ आ रही थी। सुधाकर बाबू, जो दुनिया के सामने हमेशा सख्त बने रहते थे, उनका बाँध अचानक टूट गया। उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उन्होंने अपने बेटे को खींचकर सीने से लगा लिया।
रेवती भी फूट-फूट कर रोते हुए उन दोनों से लिपट गई। आज सुधाकर बाबू को एहसास हुआ कि उन्होंने सिर्फ एक होनहार बेटा ही नहीं पाला, बल्कि एक ऐसा इंसान गढ़ा है जिसकी जड़ें ज़मीन में इतनी गहरी हैं कि कोई भी विदेशी आंधी उसे अपने संस्कारों से उखाड़ नहीं सकती। उन्हें लगा जैसे दुनिया की सारी दौलत आज उनके इस छोटे से पुश्तैनी आँगन में आकर सिमट गई है। सच ही है, पैसा इंसान को बहुत कुछ दे सकता है, लेकिन अपनों के स्पर्श का सुकून और बुढ़ापे की लाठी, किसी बाज़ार में नहीं बिकती। अंशुल ने पुणे जाने का फैसला करके न सिर्फ अपना भविष्य चुना था, बल्कि अपने माता-पिता को उनकी ज़िंदगी वापस लौटा दी थी।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या अंशुल ने अपना शानदार करियर छोड़कर सही किया? या उसे अमेरिका जाकर अपने माता-पिता के लिए और ज्यादा पैसे कमाने चाहिए थे? अगर आप अंशुल की जगह होते तो आपका क्या फैसला होता? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएँ।
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