कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा है – चित्रलेखा व्यास ‘नीलचित्रा’

आँगन में रखी तुलसी सूखने लगी थी। सावित्री रोज उसे पानी देती, फिर भी उसकी पत्तियाँ मुरझाती जातीं। शायद पौधे को भी वही चाहिए था, जो मनुष्य को चाहिए—थोड़ी धूप, थोड़ी हवा और जीने की आज़ादी।

सावित्री की बेटी नंदिनी भी पिछले कई वर्षों से भीतर ही भीतर ऐसी ही सूख रही थी।

शादी के बाद जब नंदिनी पहली बार ससुराल आई थी, उसकी आँखों में हजारों सपने थे। माँ ने विदा करते समय कहा था—

“बेटी, ससुराल को अपना घर समझना और सबको खुश रखना।”

नंदिनी ने माँ की बात को अपने जीवन का धर्म बना लिया। वह बहू बनी, पत्नी बनी, फिर माँ बनी; मगर इन सबके बीच वह स्वयं कहीं खो गई।

सुबह की पहली किरण के साथ उठना, घर के सारे काम करना, पति की बेरुखी सहना, सास के ताने सुनना और रात को अपनी बेटी परी के सिरहाने बैठकर चुपचाप आँसू पोंछ लेना—उसकी दिनचर्या बन चुकी थी।

एक दिन परी ने स्कूल से लौटकर मासूमियत से पूछा—

“माँ, दादी कहती हैं कि अच्छी बहू वही होती है जो सब कुछ सह ले। क्या मैं भी बड़ी होकर सब कुछ सहूँगी?”

नंदिनी के हाथ से गिलास छूटकर फर्श पर गिर पड़ा।

काँच के टुकड़े बिखरे थे, मगर उससे कहीं अधिक उसके भीतर कुछ टूट चुका था।

उस रात वह देर तक सो नहीं सकी। खिड़की से आती चाँदनी में उसने स्वयं को देखा। उसे अपना चेहरा नहीं, एक ऐसी स्त्री दिखाई दी जो वर्षों से दूसरों की इच्छाओं में जीते-जीते अपनी इच्छाओं का अंतिम संस्कार कर चुकी थी।

उसे याद आया—विवाह से पहले वह अध्यापिका बनना चाहती थी। माँ ने कहा था, “पहले घर बसा ले, पढ़ाई बाद में हो जाएगी।”

वह बाद में कभी नहीं आया।

अगली सुबह नंदिनी ने अपनी बेटी का हाथ थामा और मायके पहुँच गई।

सावित्री ने दरवाजा खोला। बेटी को देखकर उसके चेहरे पर चिंता उतर आई।

“क्या हुआ नंदू?”

नंदिनी माँ से लिपटकर रो पड़ी।

“माँ, मैं घर तोड़ने नहीं आई हूँ… मैं अपनी बेटी का भविष्य बचाने आई हूँ।”

सावित्री स्तब्ध रह गई।

“लोग क्या कहेंगे?”

नंदिनी ने आँसू पोंछे और माँ की आँखों में देखते हुए कहा—

“माँ, लोग तो तब भी बोले थे जब तुमने अपने सपने छोड़ दिए थे। लोग तब भी बोले थे जब तुमने पिताजी की हर कठोर बात को चुपचाप सह लिया था। और आज भी बोलेंगे। लेकिन अगर मैंने सब सह लिया, तो मेरी बेटी भी यही सीखेगी कि औरत का जन्म सहने के लिए होता है।”

सावित्री के होंठ काँपे।

उसे पहली बार लगा कि उसने बेटी को संस्कार नहीं, शायद अपनी पीड़ा विरासत में दी थी।

उसने नंदिनी का हाथ थाम लिया।

“नहीं बेटी… अब यह विरासत यहीं खत्म होगी।”

नंदिनी ने पढ़ाई दोबारा शुरू की। दिन कठिन थे, मगर इस बार उसके साथ उसकी माँ और बेटी दोनों थीं। वर्षों की मेहनत के बाद उसे नौकरी मिल गई।

कुछ समय बाद उसने अपनी माँ के घर की उसी सूखी तुलसी के पास एक नया पौधा लगाया।

परी ने पूछा—

“माँ, यह पौधा क्यों लगाया?”

नंदिनी मुस्कुराई—

“क्योंकि कुछ चीजें तभी खिलती हैं, जब उन्हें खुला आकाश मिलता है।”

सावित्री की आँखें भर आईं।

उसने बेटी को गले लगाते हुए कहा—

“काश, मैंने भी अपने जीवन में यह बात पहले समझ ली होती।”

नंदिनी ने माँ का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

“देर हुई है माँ… लेकिन अब हमारी बेटियाँ देर नहीं करेंगी।”

हवा चली। तुलसी की पत्तियाँ सरसराईं।

जैसे कोई अदृश्य आवाज़ कह रही हो—

हर रिश्ता निभाना जरूरी नहीं,

हर परंपरा ढोना जरूरी नहीं।

जहाँ आत्मा घुटने लगे,

वहाँ ठहर जाना विवशता है—

और आगे बढ़ जाना ही जीवन।

क्योंकि कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा है।

चित्रलेखा व्यास ‘नीलचित्रा’ 

नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)

कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)

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