नेकी की खनकती चूड़ियां

 सावित्री के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कांपती आवाज में कहा, “जब धीरज अस्पताल में थे, तो वेयरहाउस वालों ने बिना कोई मुआवजा दिए उनकी जगह किसी दूसरे नौजवान लड़के को काम पर रख लिया। पिछले डेढ़ महीने से मेरे पति बिस्तर पर लाचार पड़े हैं। उनके इलाज और दवाओं में … Read more

रोशनी की लकीर

 राघव मन ही मन सोच रहा था कि शायद कल रात मां से फोन पर की गई उसकी बातचीत ऊपर वाले ने सुन ली। कल रात जब वह मायूस होकर दुकान बंद कर रहा था, तो उसकी आंखों से बेबसी के आंसू टपक पड़े थे। उसने फोन पर अपनी मां से कहा था, “मां, बड़े … Read more

कड़वाहट में घुली मिठास

शादी के महज़ दो महीने ही बीते थे। नए घर की आबोहवा, नए लोग और हर कदम पर एक अनजानी परीक्षा। जब मैं विदा होकर इस घर में आई थी, तो मेरे ससुर पंडित दीनानाथ जी ने बड़े गर्व से पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटी थी। जब भी कोई रिश्तेदार या मिलने-जुलने वाला आता, बाबूजी … Read more

धूप-छांव का सफर और वह शाम

  “रघु, तूने आज मेरी आंखें खोल दीं। पिछले कुछ सालों से मैं भी खुद को लाचार और फालतू समझने लगा था। मुझे लगता था कि जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद जिंदगी का मकसद खत्म हो गया है। जोड़ों के दर्द और बीपी की गोलियों के बीच मैं हंसना ही भूल गया था। लेकिन आज तेरे … Read more

अहंकार की डिग्री

  “क्या हुआ पापा? आप खुश नहीं हैं क्या? इतनी बड़ी कामयाबी मिली है मुझे,” समीर ने हैरानी से पूछा। रामनाथ जी ने गहरी साँस ली और बहुत ही शांत लेकिन चुभने वाले स्वर में कहा, “मैं बहुत खुश था समीर, लेकिन अभी कुछ ही पलों में तुमने मुझे यह अहसास दिला दिया कि मेरी और … Read more

वक्त का पहिया – मधु वशिष्ठ

मुझे परसों वापस चेन्नई जाना था। मां नितांत बड़ी-बूड़ी के जैसे पड़ोस की चाची के साथ उसकी लड़की गायत्री के विवाह पर होने वाले रस्मों को समझा रही थी।  कल गायत्री की गोद भराई की रसम पर मां को गाते हुए सुना तो मैं हैरान था कि मां को अभी भी सारे लोकगीत याद हैं … Read more

खून से गहरे भावना के रिश्ते

“कल तुम कह रही थी कि तुम अपने मायके जा रही हो, अपने भाई को टीका करने। लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा दुनिया में कोई नहीं है, तुम अनाथालय में बड़ी हुई हो। फिर ये भाई और मायका… मुझे कुछ समझ नहीं आया।” मेरी बात सुनकर काव्या के चेहरे पर एक बहुत ही … Read more

बिखरे पन्नों की नई इबारत

अनिरुद्ध ने सब देखा, समझा, मगर उसने कभी आपा नहीं खोया। वह मर्यादा की डोर को थामे रहा। उसने सोचा कि शायद नई जगह, नया माहौल है, प्रज्ञा को सामंजस्य बिठाने में वक्त लगेगा। वह उसे बाहर घुमाने ले जाता, उसकी हर फरमाइश पूरी करता, उसके पसंदीदा उपहार लाता ताकि उसके मन का भटकाव थमे … Read more

मन का दर्पण: एक अनकही दास्तान

माधवी एक ऐसी लड़की थी जिसे ईश्वर ने बड़ी फुर्सत से तराशा था। उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, दूध सा गोरा रंग, घने काले बाल और चेहरे पर हमेशा खिली रहने वाली एक मीठी सी मुस्कान—जो भी उसे देखता, बस देखता ही रह जाता। सुंदरता के साथ-साथ सरस्वती की भी उस पर विशेष कृपा थी। माधवी … Read more

सुलझती डोर, महकता आशियाना

 विवेक ने मुस्कुराते हुए पूछा कि क्या बात है मयंक, आज चेहरे पर यह बारह क्यों बजे हैं, क्या प्रोजेक्ट की डेडलाइन को लेकर कोई नई समस्या आ गई है। मयंक ने एक भारी सांस छोड़ते हुए अपनी दोनों हथेलियों से चेहरे को ढंक लिया और गहरी हताशा से भरी आवाज में बोला कि काश … Read more

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