सूने आँगन की तुलसी

विदाई के आँसुओं और सिसकियों के बीच जब तन्वी कार में बैठने लगी, तो उसकी मामी ने उसका हाथ थामकर कान में धीरे से कहा था, “देख तन्वी, लोग चाहे कुछ भी कहें, पर तू बहुत भाग्यशाली है। ससुराल में कोई सास नहीं है जो सुबह चार बजे जगाए या बात-बात पर नुक्स निकाले। बस … Read more

अनकही अनुगूंज: एक गृहणी के समर्पण की कहानी

 मालती की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। ये दुख के आंसू नहीं थे, बल्कि बरसों से मन के किसी कोने में दबी हुई उस प्यास के बुझने के आंसू थे, जो एक औरत सिर्फ अपने परिवार के प्यार और सम्मान के लिए महसूस करती है। उसने रमेश की तरफ देखा, जिनकी आँखों … Read more

पेंशन – वीणा सिंह

मायके की गलियों में विचरण करती आज मंदिर चली आई.. वर्षों बाद आज शोभा चाची मंदिर में मिल गई.. बहुत मुश्किल से पहचान पाई.. वक्त अपने साथ खूबसूरती स्वस्थ्य शरीर कमनियता और फुर्ती भी समेट के आगे बढ़ जाता है.. शोभा चाची का रहन सहन पहले और आज में जमीन आसमान का अंतर आ गया … Read more

बहन – खुशी

शारदा जी की एक ही इच्छा थी—उनके घर में एक प्यारी-सी बेटी हो। उनके चार बेटे थे। घर में बेटों की किलकारियाँ तो खूब गूँजती थीं, लेकिन बेटी का सुख उन्हें नहीं मिला था। शारदा जी को बेटियों से बहुत लगाव था। उन्हें हमेशा लगता कि काश, उनके घर में भी एक नन्ही-सी गुड़िया होती, … Read more

स्वाभिमान की महक

वक्त किसी नदी की तरह अपनी रफ़्तार से बहता चला गया। समय के साथ परिवार की डालियाँ अलग होने लगीं। ननदें अपने-अपने ससुराल चली गईं, देवर अपने परिवारों को लेकर अलग-अलग शहरों में अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकल गए। सास-ससुर ने भी अपनी लंबी उम्र पूरी करके दुनिया को अलविदा कह दिया। कुछ ही … Read more

छलावे का सिंदूर

मीरा के हाथों में वह कागज का टुकड़ा बुरी तरह से कांप रहा था। वह कोई मामूली कागज नहीं था, बल्कि समीर की कंपनी से आया हुआ ‘रिलीविंग लेटर’ था। कमरे में पसरा सन्नाटा इतना गहरा था कि मीरा को अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। सामने पलंग पर बैठा समीर नजरें झुकाए अपने … Read more

भरम का लिफ़ाफ़ा

रसोई से अदरक और इलायची वाली चाय की महक उठ रही थी, जो सीधे बरामदे तक पहुँच रही थी जहाँ रिटायर्ड मास्टर दीनानाथ जी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। पैंसठ वर्षीय दीनानाथ जी का जीवन बेहद अनुशासित और शांत था। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूंजी और अपना खून-पसीना लगाकर शहर … Read more

सुख का आंगन

“कैसी हो सुमित्रा?” निर्मला ने अपने माथे की सिलवटों को उंगलियों से सहलाते हुए फोन पर पूछा। उसकी आवाज में एक अजीब सी थकान और झुंझलाहट थी। दूसरी तरफ से सुमित्रा की खनकती हुई शांत आवाज आई, “मैं बिल्कुल ठीक हूँ दीदी, आप कैसी हैं? बहुत दिनों बाद आपने फोन किया। सब घर में कुशल … Read more

अपने ही घर में अजनबी

रोहन जैसे ही थका-हारा दफ्तर से घर लौटा, सोफे पर बैठी उसकी पत्नी रिया का पारा सातवें आसमान पर था। रोहन ने अभी अपने जूतों के फीते खोले ही थे कि रिया की तीखी आवाज पूरे ड्रॉइंग रूम में गूंज उठी, “मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती रोहन! तुम्हारी माँ से एक छोटा सा … Read more

पराया आँगन, अपनी महक

“अंजलि, बेटा… सब ठीक तो है ना? तू मुंह से तो कुछ नहीं कहती, लेकिन एक माँ अपनी बेटी की खामोशी भी पढ़ लेती है। तेरी आवाज़ में वो पुरानी वाली खनक नहीं है, एक अजीब सी उदासी झलकती है। अगर कोई बात है तो मुझे बता दे।” फोन के दूसरी तरफ से अंजलि की … Read more

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