खून से गहरे भावना के रिश्ते

“कल तुम कह रही थी कि तुम अपने मायके जा रही हो, अपने भाई को टीका करने। लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा दुनिया में कोई नहीं है, तुम अनाथालय में बड़ी हुई हो। फिर ये भाई और मायका… मुझे कुछ समझ नहीं आया।”

मेरी बात सुनकर काव्या के चेहरे पर एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और एक हल्की सी नमी भी। उसने गहरी साँस ली और मेरे हाथ को अपने हाथों में लेते हुए बोली, “दीदी, आपने कुछ गलत नहीं सुना था और ना ही मैंने आपसे कोई झूठ बोला था। यह सच है कि जन्म देने वाले माता-पिता को मैंने बचपन में ही खो दिया था और मेरा कोई सगा भाई-बहन नहीं है। लेकिन जो मायका मुझे मिला है, वह खून के रिश्तों से भी बढ़कर है।”

दिवाली की रौनक अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि भैया दूज की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। हमारे मोहल्ले में सुबह से ही एक अलग सी चहल-पहल थी। मैं अपने घर के बरामदे में बैठी सुबह की चाय पी रही थी, तभी मेरी नज़र सामने वाले घर से बाहर निकलती हुई काव्या पर पड़ी। काव्या हमारे पड़ोस में पिछले दो साल से रह रही थी। वह पास के ही एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी और उसके पति, विकास, एक बैंक में काम करते थे। काव्या स्वभाव से बहुत ही शांत, सौम्य और बेहद सलीके से रहने वाली महिला थी। आमतौर पर वह सादे सूती कपड़ों में ही नज़र आती थी, लेकिन आज उसकी छटा बिल्कुल अलग थी। उसने एक बहुत ही खूबसूरत लाल रंग की बनारसी साड़ी पहनी हुई थी, हाथों में कांच की हरी-लाल चूड़ियाँ थीं, माथे पर बड़ी सी बिंदी और चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो शायद ही मैंने पहले कभी देखी हो।

उसके हाथ में पूजा की एक सजी हुई थाली थी और वह किसी ऑटो का इंतज़ार कर रही थी। मैं अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाई और चाय का कप वहीं मेज पर रखकर बाहर गेट तक आ गई। “अरे वाह काव्या! आज तो तुम बहुत ही खूबसूरत लग रही हो। कहीं खास जाने की तैयारी है क्या?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।

काव्या ने मेरी तरफ देखा और अपनी उसी चिर-परिचित मीठी मुस्कान के साथ बोली, “जी दीदी, आज भैया दूज है ना, तो बस अपने मायके जा रही हूँ। भैया को टीका करने। भैया ने सुबह से ही फोन पर फोन करके परेशान कर दिया है कि जल्दी आओ।”

उसकी बात सुनकर मैंने भी सहजता से कह दिया, “अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है। जाओ, त्योहार का दिन है, अच्छे से मनाकर आओ।” ऑटो आ चुका था और काव्या उसमें बैठकर चली गई। लेकिन उसके जाने के बाद मेरे दिमाग में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई।

काव्या के शब्द मेरे कानों में बार-बार गूंज रहे थे—”अपने मायके जा रही हूँ… भैया को टीका करने।” मुझे अच्छी तरह याद था कि जब काव्या और विकास इस मोहल्ले में नए-नए आए थे, तब एक दिन बातों-बातों में काव्या ने मुझे अपने अतीत के बारे में बताया था। उसने बड़ी ही नम आँखों से कहा था कि वह एक अनाथालय में पली-बढ़ी है। बचपन में ही एक भयंकर सड़क हादसे में उसने अपने माता-पिता और पूरे परिवार को खो दिया था। उसके दुनिया में अपना कहने वाला कोई नहीं था। अपनी मेहनत और लगन के बल पर उसने पढ़ाई पूरी की और नौकरी हासिल की। तो फिर आज अचानक से ये मायका और ये भाई कहाँ से आ गए? क्या उसने मुझसे झूठ बोला था? या बात कुछ और थी जो मैं नहीं जानती थी?

मेरा पूरा दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। इंसानी फितरत ही ऐसी होती है कि जब तक किसी उलझन का सिरा न मिल जाए, मन को चैन नहीं पड़ता। मैंने सोचा कि जब काव्या वापस आएगी, तब उससे आराम से बैठकर बात करूँगी।

अगले दिन रविवार की छुट्टी थी। दोपहर के वक्त मेरे घर की घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने काव्या खड़ी थी। उसके हाथ में एक डिब्बा था। “दीदी, कल भैया दूज की मिठाई लेकर आई हूँ। कल तो मैं जल्दी में थी, इसलिए आपको देकर नहीं जा सकी,” उसने अंदर आते हुए कहा।

मैंने उसे सोफे पर बिठाया और खुद उसके लिए पानी लेने रसोई में चली गई। पानी का गिलास उसे देते हुए मैंने फैसला कर लिया था कि आज मैं अपने मन में उठ रहे सवालों को पूछ ही लूँगी। “काव्या, मिठाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। लेकिन एक बात पूछूँ? अगर बुरा न मानो तो…” मैंने थोड़ी झिझक के साथ शुरुआत की।

काव्या ने बड़ी सहजता से कहा, “अरे दीदी, आप कैसी बातें कर रही हैं। पूछिए ना, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है।”

“कल तुम कह रही थी कि तुम अपने मायके जा रही हो, अपने भाई को टीका करने। लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा दुनिया में कोई नहीं है, तुम अनाथालय में बड़ी हुई हो। फिर ये भाई और मायका… मुझे कुछ समझ नहीं आया।”

मेरी बात सुनकर काव्या के चेहरे पर एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और एक हल्की सी नमी भी। उसने गहरी साँस ली और मेरे हाथ को अपने हाथों में लेते हुए बोली, “दीदी, आपने कुछ गलत नहीं सुना था और ना ही मैंने आपसे कोई झूठ बोला था। यह सच है कि जन्म देने वाले माता-पिता को मैंने बचपन में ही खो दिया था और मेरा कोई सगा भाई-बहन नहीं है। लेकिन जो मायका मुझे मिला है, वह खून के रिश्तों से भी बढ़कर है।”

मैं चुपचाप उसे सुन रही थी, मेरी उत्सुकता अब और बढ़ गई थी।

काव्या ने बताना शुरू किया, “दीदी, आप जानती हैं कि मैं विकास जी की दूसरी पत्नी हूँ। उनकी पहली पत्नी, शिखा, बहुत ही अच्छी और नेक इंसान थीं। लेकिन अपनी बेटी, रिया, को जन्म देने के कुछ दिन बाद ही शिखा को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया और वो इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। विकास जी पूरी तरह से टूट चुके थे। एक तरफ पत्नी के जाने का गम और दूसरी तरफ एक छोटी सी बच्ची की ज़िम्मेदारी। शिखा के माता-पिता और उनके भाई ने उस मुश्किल वक्त में विकास जी को संभाला। जब तक रिया दो साल की नहीं हो गई, वो अपनी नानी के घर ही रही।”

काव्या कुछ पल के लिए रुकी, शायद अपने जज़्बातों को समेट रही थी। फिर उसने आगे कहा, “विकास जी के घर वालों ने और शिखा के परिवार वालों ने मिलकर विकास जी को दूसरी शादी के लिए मनाया ताकि रिया को एक माँ मिल सके। मेरे अनाथालय की संचालिका विकास जी की मौसी की परिचित थीं। जब विकास जी का रिश्ता मेरे लिए आया, तो मैंने तुरंत हाँ नहीं की। मुझे डर था कि क्या मैं एक बच्ची को सगी माँ का प्यार दे पाऊँगी? क्या मैं एक ऐसे घर में अपनी जगह बना पाऊँगी जहाँ पहले से किसी और की यादें बसी हैं? लेकिन विकास जी की सच्चाई और उनकी सादगी ने मेरा दिल जीत लिया।”

काव्या की आँखों से अब एक आँसू छलक कर उसके गालों पर आ गया था। उसने उसे पोंछते हुए कहा, “दीदी, हमारी शादी बहुत सादगी से मंदिर में तय हुई थी। मेरी तरफ से सिर्फ अनाथालय की संचालिका और कुछ सहेलियाँ थीं। मुझे अंदर ही अंदर इस बात की बहुत तकलीफ थी कि मेरी शादी में मेरा कन्यादान करने वाला कोई नहीं है। हर लड़की का सपना होता है कि उसके माता-पिता उसे विदा करें। लेकिन जब शादी वाले दिन मैं मंडप में बैठी, तो वहां कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।”

मैं अब पूरी तरह से काव्या की कहानी में खो चुकी थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ काव्या?”

“वहाँ शिखा के माता-पिता और उनका भाई, रोहन, आए हुए थे। वो लोग रिया को लेकर आए थे। जब पंडित जी ने कन्यादान के लिए मेरे माता-पिता को बुलाया और मंडप में सन्नाटा छा गया, तब अचानक शिखा के पिताजी आगे आए। उन्होंने विकास जी से कहा, ‘तुमने मेरी एक बेटी को खो दिया, लेकिन आज भगवान ने मुझे दूसरी बेटी दी है। आज से काव्या मेरी बेटी है और इसका कन्यादान मैं करूँगा।’ दीदी, उस पल मुझे लगा जैसे भगवान ने सच में धरती पर उतरकर मुझे मेरे माता-पिता लौटा दिए हों। शिखा की माँ ने मुझे गले से लगा लिया और खूब रोईं। उन्होंने रिया को मेरी गोद में देते हुए कहा, ‘मेरी बेटी को माँ मिल गई और मुझे मेरी दूसरी बेटी।'”

काव्या की आवाज़ भारी हो गई थी। “शिखा के भाई, रोहन भैया ने भी उसी मंडप में मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा कि आज से मैं अकेला नहीं हूँ, मेरी एक बहन और आ गई है। दीदी, उन्होंने सिर्फ शादी में रस्में नहीं निभाईं, बल्कि उन्होंने उस रिश्ते को आज तक दिल से जिया है। उन्होंने कभी मुझे यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं शिखा की जगह आई हूँ या मैं एक सौतेली माँ हूँ। वो आज भी मुझे हर तीज-त्योहार पर मायके का शगुन भेजते हैं। कल भैया दूज पर मैं उसी घर गई थी। रोहन भैया ने मुझे अपनी सगी बहन की तरह नेग दिया और शिखा की माँ ने मेरे लिए अपने हाथों से खाना बनाया। जिस लड़की ने अपना पूरा बचपन अनाथालय की चारदीवारी में बिना किसी रिश्ते के गुज़ारा हो, उसे भगवान ने अचानक से मायका, माँ-बाप और भाई सब कुछ दे दिया।”

काव्या खामोश हो गई थी। कमरे में एकदम शांति थी, लेकिन मेरे दिल के अंदर भावनाओं का एक सैलाब उमड़ रहा था। मेरी आँखों से भी आँसू बह रहे थे। मैंने आगे बढ़कर काव्या को गले से लगा लिया। मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे।

आज के इस दौर में, जहाँ सगे भाई-भाई ज़मीन और जायदाद के लिए एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, जहाँ लोग अपने स्वार्थ के आगे किसी को कुछ नहीं समझते, वहाँ शिखा के परिवार ने एक ऐसी मिसाल कायम की थी जो इंसानियत पर विश्वास को और भी पक्का करती है। एक सौतेली माँ को अपनी सगी बेटी का दर्जा देना, उसे मायके का पूरा सम्मान और प्यार देना, यह कोई साधारण बात नहीं थी। यह साबित करता है कि रिश्ते कभी भी सिर्फ खून से नहीं बनते, बल्कि वो दिल की गहराइयों, सम्मान, स्वीकार्यता और निस्वार्थ प्रेम से सींचे जाते हैं। शिखा का परिवार सच में उन विरले लोगों में से था जो जानते हैं कि प्यार बांटने से कम नहीं होता, बल्कि कई गुना होकर वापस लौटता है।

उस दिन काव्या तो थोड़ी देर बाद अपने घर चली गई, लेकिन मुझे ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा सबक दे गई। मैं बस यही सोचती रही कि अगर हम सब अपने दिलों में थोड़ी सी जगह दूसरों के लिए बना लें, पुरानी रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों को छोड़कर एक-दूसरे को सिर्फ इंसान के रूप में अपना लें, तो यह दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाएगी। हम अजनबियों में भी अपना परिवार ढूँढ सकते हैं, बस नज़रिया और दिल बड़ा होना चाहिए।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के ज़माने में ऐसे रिश्ते सच में निभाए जा सकते हैं? क्या शिखा के परिवार का उठाया गया यह कदम समाज के लिए एक नई प्रेरणा नहीं है? आप इस बारे में क्या सोचते हैं, अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : मोहिनी मिश्रा

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