“रघु, तूने आज मेरी आंखें खोल दीं। पिछले कुछ सालों से मैं भी खुद को लाचार और फालतू समझने लगा था। मुझे लगता था कि जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद जिंदगी का मकसद खत्म हो गया है। जोड़ों के दर्द और बीपी की गोलियों के बीच मैं हंसना ही भूल गया था। लेकिन आज तेरे इस ठहाके ने मुझे याद दिला दिया कि सांसें चलना ही जिंदगी नहीं है, बल्कि हर सांस में मुस्कुराना ही असली जीना है।”
शहर की उस पुरानी और शांत कॉलोनी के नुक्कड़ पर बनी चाय की दुकान पर शाम के वक्त हल्की चहल-पहल थी। पतझड़ के दिन थे और सूखी पत्तियां हवा के झोंके के साथ सड़क पर सरसरा रही थीं। हल्की ठंडक हवा में घुलने लगी थी। लकड़ी की एक पुरानी बेंच पर बैठे रघुवीर जी अपने कांपते हाथों से गर्म कुल्हड़ को थामे हुए थे। चेहरे पर वक्त ने अनगिनत लकीरें खींच दी थीं, सफेद बाल माथे पर बिखरे थे और आंखों पर चढ़ा मोटा चश्मा उनकी कमजोर होती नजर की गवाही दे रहा था। उम्र के तिहत्तरवें पड़ाव पर आकर इंसान अक्सर अतीत की गलियों में भटकने लगता है, और रघुवीर जी भी अपनी जवानी के उन दिनों को याद कर रहे थे जब कदम बिना थके मीलों नाप दिया करते थे।
तभी एक धीमी, खनकती हुई आवाज उनके कानों में पड़ी, “मास्टर साहब! क्या इस बेंच पर किसी पुराने मुसाफिर के बैठने की जगह बची है?”
रघुवीर जी ने चौंक कर सिर उठाया। सामने एक दुबला-पतला, सफेद दाढ़ी वाला बुजुर्ग खड़ा था, जिसके हाथ में एक मजबूत शीशम की लाठी थी। उसने साधारण सा कुर्ता-पायजामा पहन रखा था और चेहरे पर एक पहचानी सी शरारती मुस्कान तैर रही थी। रघुवीर जी ने अपनी आंखों को सिकोड़ा, चश्मे को उंगली से थोड़ा ऊपर खिसकाया और कुछ सेकंड तक उस चेहरे को घूरते रहे। फिर अचानक उनके चेहरे पर पहचान की एक अनोखी चमक दौड़ी और उनकी आंखें भर आईं।
“दीनानाथ? अरे दीना! तू… सचमुच तू ही है?” रघुवीर जी अपनी जगह से उठने की कोशिश करने लगे, लेकिन घुटनों के दर्द ने उन्हें हल्का सा झटका दिया।
दीनानाथ जी ने झट से आगे बढ़कर अपनी लाठी एक तरफ रखी और रघुवीर जी को बाहों में भर लिया। दोनों बुजुर्ग देर तक एक-दूसरे के गले लगे रहे। दो दशक से भी ज्यादा का फासला उन कुछ पलों के आलिंगन में जैसे पिघल कर बह गया। बचपन के वे दिन, जब दोनों एक ही तख्ती पर स्लेट-पेंसिल से लिखते थे, एक ही साइकिल के डंडे पर बैठकर कॉलेज जाया करते थे और घंटों एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते थे, सब कुछ एक पल में जीवंत हो उठा।
“अरे यार दीना, बैठ पहले! बैठ जा भाई,” रघुवीर जी ने बेंच पर हाथ मारकर जगह बनाते हुए कहा। उनकी आवाज में वही पुराना लड़कपन लौट आया था जो कहीं गृहस्थी और जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया था।
दीनानाथ जी धीरे से मुस्कुराते हुए बैठ गए और अपनी लाठी को दोनों पैरों के बीच टिका लिया। उन्होंने कुल्हड़ वाली चाय का एक और ऑर्डर दिया और फिर रघुवीर जी के कंधे पर हाथ मारकर बोले, “अबे बता, क्या हाल-चाल हैं तेरे? पूरे बाइस साल बाद आमने-सामने बैठे हैं हम। कहां गायब था तू?”
दीनानाथ जी ने एक लंबी सांस ली और चाय की चुस्की लेते हुए बोले, “बस भाई, जिंदगी की गाड़ी अपने ढर्रे पर चलती रही। बैंक की नौकरी से रिटायर हुए भी अब तेरह साल बीत गए। दोनों बेटियों के हाथ पीले कर दिए, वे अपने-अपने ससुराल में खुश हैं। बड़ा बेटा कनाडा बस गया और छोटा शहर में ही एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में है। सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं। घर-परिवार की जो जिम्मेदारियां सिर पर थीं, ईश्वर की कृपा से सब निपट गईं। अब तो पूरी तरह आजाद पंछी हूं, जहां मर्जी उड़ूं, जो मर्जी करूं।”
दीनानाथ जी ने बात खत्म की और फिर तिरछी नजरों से रघुवीर जी को देखते हुए छेड़खानी भरे लहजे में पूछा, “चल, मेरी गाथा तो तूने सुन ली। अब अपना तो बता, ओ मस्तराम! तू तो कॉलेज के दिनों में भी बेपरवाह रहता था, हर बात पर ठहाके लगाता था। सुना है तू भी बड़े पद से रिटायर हुआ था, तो अब ठाठ से जिंदगी कट रही होगी? रोज सुबह सैर, शाम को आराम और पोते-पोतियों के साथ मौज-मस्ती? खूब मजे में होगा तू तो!”
रघुवीर जी ने अपने दोस्त की बात सुनी और कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से घुटनों को सहलाया, फिर अचानक उनके चेहरे पर वही जानी-पहचानी, बेबाक मुस्कान खिल उठी।
वे हंसते हुए बोले, “हाँ भाई दीना, तूने बिल्कुल सही फरमाया! जिंदगी इतने मजे में कट रही है कि क्या ही बताऊं! जिस शरीर को कभी जिम में कसरत करके फौलाद बनाया था, अब वो कमर नहीं रहा, पूरा कमरा बन चुका है। पहले एक दिन में दस किलोमीटर पैदल चल लेते थे, अब नुक्कड़ तक आते-आते चप्पलें घिस जाती हैं और सांस फूलने लगती है।”
दीनानाथ जी रघुवीर का यह अंदाज देखकर मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।
रघुवीर जी ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अपने सिर पर हाथ फेरा, “सर के ये घने काले बाल, जिन पर कभी कॉलेज की लड़कियां फिदा हुआ करती थीं, अब वे बर्फ की तरह सफेद हो चुके हैं और आधे तो मैदान छोड़ चुके हैं। चेहरे पर वक्त ने इतने नक्शे उकेर दिए हैं कि झुर्रियों की गिनती भूल गया हूं। मुंह का हाल मत पूछ, बत्तीस दांतों की जो फौज थी, वो अब घटकर महज सत्रह-अठारह की बटालियन रह गई है, वो भी कब साथ छोड़ दे कुछ भरोसा नहीं। जो सेब कभी दांतों से काटकर खा लेते थे, अब उसे मिक्सी में पीसकर दलिया बनाकर खाना पड़ता है।”
दीनानाथ जी खिलखिलाकर हंस पड़े, “अरे बस कर यार, तू तो आज भी वैसा ही है!”
“अरे अभी पूरी दास्तान तो सुन ले!” रघुवीर जी ने अपनी आंखों के चश्मे को हिलाते हुए कहा, “आंखों का यह हाल है कि बिना इस मोटे चश्मे के अपनी ही थाली में रोटी और सब्जी का फर्क समझ नहीं आता। नंबर इतना बढ़ गया है कि चश्मा हटा लूं तो सामने तू बैठा है या कोई खंभा, पहचानना मुश्किल हो जाए। और सबसे बड़ा बदलाव तो यह देख, जिस हाथ में कभी बैडमिंटन और टेनिस का रैकेट हुआ करता था, शाम को कोर्ट में जब मैं स्मैश मारता था तो लोग तालियां बजाते थे, आज उसी हाथ में यह छड़ी आ गई है। यह छड़ी न हो तो लगता है कि जमीन पैर खींच लेगी।”
कहते-कहते रघुवीर जी ने ऐसा जोरदार ठहाका लगाया कि चाय की दुकान पर बैठे दूसरे लोग भी मुड़कर उन्हें देखने लगे। उनका वह ठहाका सिर्फ हंसी नहीं था, बल्कि बढ़ती उम्र और कमजोर होते जिस्म के खिलाफ एक जिंदादिल बगावत थी।
रघुवीर जी ने दीनानाथ का हाथ थामते हुए नम आंखों से कहा, “दोस्त, सच कहूं तो शरीर का हर पुर्जा पुराना हो चुका है, मरम्मत मांग रहा है। लेकिन ऊपर वाले का शुक्र है कि उसने इस बूढ़े सीने में वही पुराना, जिंदादिल दिल महफूज रखा है। बाल सफेद हो गए, दांत गिर गए, नजर कमजोर हो गई, पर ये ठहाके… ये ठहाके वही पुराने बचे हैं मेरे यार! जब तक ये ठहाके जिंदा हैं, तब तक हम बूढ़े नहीं हो सकते।”
दीनानाथ जी ने अपने दोस्त को देखा। वे समझ गए कि रघुवीर ने अपनी शारीरिक कमजोरियों और अकेलेपन के दर्द को कितनी खूबसूरती से अपनी सकारात्मकता की चादर में लपेट दिया था। उन्होंने महसूस किया कि उम्र का बढ़ना जिस्म का नियम है, लेकिन दिल का बूढ़ा होना इंसान का अपना फैसला होता है।
दीनानाथ जी ने अपनी छड़ी को उठाया और मुस्कुराते हुए बोले, “रघु, तूने आज मेरी आंखें खोल दीं। पिछले कुछ सालों से मैं भी खुद को लाचार और फालतू समझने लगा था। मुझे लगता था कि जिम्मेदारियां खत्म होने के बाद जिंदगी का मकसद खत्म हो गया है। जोड़ों के दर्द और बीपी की गोलियों के बीच मैं हंसना ही भूल गया था। लेकिन आज तेरे इस ठहाके ने मुझे याद दिला दिया कि सांसें चलना ही जिंदगी नहीं है, बल्कि हर सांस में मुस्कुराना ही असली जीना है।”
दोनों दोस्तों ने अपनी-अपनी छड़ी को जमीन पर टिकाया, चाय का बिल चुकाया और एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर शाम की ठंडी हवा में टहलने लगे। उनके कदम धीमे थे, चाल में लड़खड़ाहट थी, लेकिन उनके चेहरों पर जो संतोष और आंखों में जो चमक थी, वह किसी नौजवान से भी ज्यादा पुरअसर थी। उन्होंने तय किया कि अब वे हर शाम इसी नुक्कड़ पर मिलेंगे, पुरानी यादों को ताजा करेंगे और हर ढलते दिन का स्वागत एक नए ठहाके के साथ करेंगे।
जीवन का यह पड़ाव हर किसी के सफर में आता है, जहां जिस्म थकने लगता है और अपने भी अपनी जिम्मेदारियों में मशगूल हो जाते हैं। ऐसे मोड़ पर खुद को लाचार समझकर खामोश हो जाना आसान है, लेकिन मुश्किल और खूबसूरत है अपने भीतर के उस जिंदादिल इंसान को बचाए रखना जो हर झुर्री और हर कमजोरी पर मुस्कुराना जानता हो। उम्र सिर्फ सालों का एक आंकड़ा है, जब तक आपके पास खुलकर हंसने की वजह और मुस्कुराते हुए दिल हैं, तब तक जिंदगी का हर लम्हा खूबसूरत है।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा पुराना दोस्त है जिससे मिलकर आपकी सारी परेशानियां और उम्र का दर्द एक पल में काफूर हो जाता है? अपने उस खास दोस्त या जीवन के इस खूबसूरत फलसफे के बारे में अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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