राघव मन ही मन सोच रहा था कि शायद कल रात मां से फोन पर की गई उसकी बातचीत ऊपर वाले ने सुन ली। कल रात जब वह मायूस होकर दुकान बंद कर रहा था, तो उसकी आंखों से बेबसी के आंसू टपक पड़े थे। उसने फोन पर अपनी मां से कहा था, “मां, बड़े भैया और मौसा जी बिल्कुल सच कहते थे कि बिजनेस करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। मुझे कोई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी ही कर लेनी चाहिए थी। आपके कंगन भी बिकवा दिए और यह दुकान भी ऐसी सुनसान गली में मिली जहां कोई परिंदा भी पर नहीं मारता। सारा ग्राहक तो चौराहे वाली बड़ी दुकान पर चला जाता है। दुकान का किराया तक जेब से देना पड़ रहा है। अब घर का खर्च कैसे चलेगा मां? बिटिया के स्कूल की फीस भरनी है, राशन वाले के पैसे बाकी हैं… मुझसे यह सब और नहीं झेला जाता।”
बाजार में रात के नौ बज चुके थे और मद्धिम होती रोशनी के बीच इक्का-दुक्का लोग ही गलियों में नजर आ रहे थे। दुकानें एक-एक करके बंद हो रही थीं और शटर गिरने की तेज खड़खड़ाहट से पूरा बाजार गूंज रहा था। राघव भी अपनी छोटी सी बर्तन और क्रॉकरी की दुकान का सामान भीतर समेटने लगा था। बदन दिन भर की थकान से चूर था, लेकिन आज उसके चेहरे पर महीनों बाद एक ऐसी चमक थी जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था।
तभी दुकान की दहलीज पर चूड़ियों की खनक और कदमों की आहट सुनाई दी। दो महिलाएं अंदर कदम रखते हुए बोलीं, “भैया, दुकान मंगल तो नहीं कर रहे? जरा पीतल के नक्काशीदार दीये और तांबे के कलश दिखा दीजिए, पूजा के लिए चाहिए थे।”
राघव ने चेहरे पर एक थकी हुई मगर बेहद आत्मीय मुस्कान लाते हुए दोनों हाथ जोड़कर कहा, “अरे नहीं-नहीं बहन जी, आप पधारिए। आपके लिए दुकान खुली है। अभी दिखाता हूँ।”
उसने फौरन शोकेस से चमचमाते हुए पीतल के सुंदर दीये और तांबे के कलश निकाल कर काउंटर पर सजा दिए। उसके हाथों में आज एक अलग ही फुरती थी। आज राघव के दिल में जो सुकून था, वह पिछले छह महीनों में कभी महसूस नहीं हुआ था। अपनी जमा-पूंजी और मां के बचे-खुचे जेवर गिरवी रखकर उसने इस छोटे से कस्बे में ‘श्री गणेश बर्तन भंडार’ नाम से यह दुकान खोली थी। लेकिन बीते छह महीने किसी बुरे सपने जैसे गुजरे थे। शहर के मुख्य बाजार की चकाचौंध से काफी हटकर, एक बेहद संकरी और घुमावदार सी गली के मुहाने पर उसे यह छोटी सी दुकान किराए पर मिली थी। मुख्य सड़क से आने-जाने वाले ग्राहकों को तो यह गली नजर भी नहीं आती थी। हालांकि उसने मुख्य सड़क के मोड़ पर एक छोटा सा लोहे का बोर्ड टंगवा रखा था, पर तेज भागती जिंदगी में किसी के पास इतना वक्त कहाँ था कि वह बोर्ड पढ़कर तंग गलियों में दाखिल हो।
हालत यह हो गई थी कि रोज सुबह दुकान का शटर उठाकर वह भगवान की तस्वीर के सामने अगरबत्ती जलाता और दिन भर टकटकी बांधे गली की ओर देखता रहता। कभी दिन भर में एक छोटा सा चम्मच या कटोरी बिकती, कभी कोई सिर्फ स्टील की थाली का भाव पूछकर आगे बढ़ जाता, और कभी-कभी तो बोहनी तक नहीं होती थी। दुकान का किराया सात हजार रुपये महीना था, जिसे निकालना भी उसके लिए पहाड़ जैसा भारी काम बन गया था।
उधर मुख्य चौराहे पर कस्बे का सबसे पुराना और विशालकाय प्रतिष्ठान था—’महालक्ष्मी बर्तन एंड होम अप्लायंसेज’। उस दुकान के मालिक थे बुजुर्ग शंभू दयाल जी। दो मंजिला आलीशान दुकान, कांच के बड़े-बड़े डिस्प्ले, दर्जनों नौकर और हर समय ग्राहकों का लगा मेला। पूरा कस्बा और आसपास के बीसियों गांवों के लोग आंख मूंदकर शंभू दयाल जी की दुकान पर जाते थे। राघव जब भी चाय पीने बाहर निकलता और चौराहे की तरफ देखता, तो शंभू दयाल जी की दुकान पर उमड़ी भीड़ को देखकर उसका कलेजा बैठ जाता। उसे लगता कि इस विशाल वटवृक्ष के सामने उसकी यह नन्ही सी पौध कभी पनप ही नहीं पाएगी।
लेकिन आज का दिन बिल्कुल अलग था। आज सुबह जब से उसने दुकान खोली थी, ग्राहकों का आना लगा हुआ था। कोई डिनर सेट खरीद रहा था, तो कोई नॉन-स्टिक तवा। दोपहर तक तो उसे चाय पीने की भी फुर्सत नहीं मिली थी। गल्ले में आज इतने नोट जमा हो चुके थे कि वह दो महीने का अटका हुआ किराया आराम से चुका सकता था।
राघव मन ही मन सोच रहा था कि शायद कल रात मां से फोन पर की गई उसकी बातचीत ऊपर वाले ने सुन ली। कल रात जब वह मायूस होकर दुकान बंद कर रहा था, तो उसकी आंखों से बेबसी के आंसू टपक पड़े थे। उसने फोन पर अपनी मां से कहा था, “मां, बड़े भैया और मौसा जी बिल्कुल सच कहते थे कि बिजनेस करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। मुझे कोई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी ही कर लेनी चाहिए थी। आपके कंगन भी बिकवा दिए और यह दुकान भी ऐसी सुनसान गली में मिली जहां कोई परिंदा भी पर नहीं मारता। सारा ग्राहक तो चौराहे वाली बड़ी दुकान पर चला जाता है। दुकान का किराया तक जेब से देना पड़ रहा है। अब घर का खर्च कैसे चलेगा मां? बिटिया के स्कूल की फीस भरनी है, राशन वाले के पैसे बाकी हैं… मुझसे यह सब और नहीं झेला जाता।”
तब उसकी मां ने फोन के उस पार से कांपती आवाज में बड़े दुलार से कहा था, “हिम्मत मत हार मेरे बच्चे। मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। नया काम जमने में वक्त लगता है। तू बस अपने व्यवहार और ईमानदारी को थामे रख, धैर्य रख। जब नियत साफ होती है तो भगवान खुद कोई न कोई रास्ता निकाल ही देते हैं। देखना, सब ठीक हो जाएगा।”
मां की बातें याद करते हुए राघव की आंखें भर आईं। सचमुच, मां के आशीर्वाद में कितनी शक्ति होती है! कल रात मां ने ढांढस बंधाया और आज सुबह से ही दुकान पर ग्राहकों की कतार लग गई। राघव के मन में एक अजीब सा अहसास भी तैर रहा था—उसे लगा कि शायद अब उसकी किस्मत का पहिया घूम गया है और चौराहे वाली उस बड़ी दुकान की रौनक अब धीरे-धीरे उसकी छोटी सी दुकान में खिंचकर आने लगी है। एक छोटी सी मानवीय ईर्ष्या या जीत का भाव उसके दिल के किसी कोने में दस्तक दे ही गया था।
“भैया, ये दोनों दीये और एक कलश पैक कर दीजिए। बहुत खूबसूरत नक्काशी है इनकी,” महिला की आवाज ने राघव का ध्यान तोड़ा।
“जी, बिल्कुल बहन जी। अभी बढ़िया से डिब्बे में रख देता हूँ,” राघव ने चहकते हुए कहा और सामान पैक करने लगा।
पैसे निकालते हुए दूसरी महिला ने अपनी साथी से कहा, “देखा, मैंने कहा था ना कि शंभू दयाल जी कभी गलत नहीं बोलते। उन्होंने बिल्कुल सही कहा था कि उस संकरी गली में एक नौजवान लड़के की नई दुकान खुली है, उसके पास बहुत ही उम्दा और शुद्ध पीतल का सामान मिल जाएगा और वह दाम भी वाजिब लगाएगा।”
राघव के हाथ वहीं ठिठक गए। उसने चौंककर सिर उठाया और हैरानी से पूछा, “बहन जी… माफ कीजिएगा, क्या आप चौराहे वाले शंभू दयाल जी की बात कर रही हैं?”
“हाँ भैया, उन्हीं की बात कर रहे हैं। हम पहले उन्हीं की दुकान पर गए थे। हमें पूजा के लिए विशेष पीतल के दीये चाहिए थे। उन्होंने हमसे कहा कि उनके पास अभी इस डिजाइन के दीये नहीं हैं, आप सीधी गली में मुड़ जाइए, वहां राघव बेटा की दुकान है, वह बहुत मेहनती लड़का है और सामान भी बहुत खरा रखता है।”
राघव जैसे बुत बनकर खड़ा रह गया। उसने मशीनी अंदाज में पैसे लिए, गल्ले में रखे और महिलाओं को सामान सौंप दिया। महिलाएं चली गईं, लेकिन राघव का दिमाग सुन्न हो चुका था।
शंभू दयाल जी? उन्होंने अपने बंधे-बंधाए ग्राहक उसकी दुकान पर भेजे? यह कैसे मुमकिन हो सकता है? शंभू जी के पास तो इतना बड़ा गोदाम है, कस्बे में ऐसी कोई चीज नहीं जो उनकी दुकान पर न मिलती हो। फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या केवल यही दो महिलाएं थीं, या आज सुबह से जितने भी ग्राहक आए थे…
राघव के मन में प्रश्नों का बवंडर उठने लगा। उसने झटपट दुकान का शटर गिराया, ताला लगाया और तेज कदमों से मुख्य चौराहे की ओर चल पड़ा। चौराहे पर ‘महालक्ष्मी बर्तन भंडार’ के बाहर कर्मचारी लोहे की बड़ी-बड़ी चादरें और बर्तनों के कार्टन भीतर रख रहे थे। शंभू दयाल जी, सफेद धोती-कुर्ते में, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, गद्दी पर बैठे बही-खाता समेट रहे थे।
राघव झिझकते हुए दुकान की सीढ़ियां चढ़ा और गद्दी के पास जाकर खड़ा हो गया।
शंभू दयाल जी ने चश्मे के ऊपर से देखा और एक सौम्य मुस्कान के साथ बोले, “अरे राघव बेटा! आओ, बैठो। आज इतनी रात को इधर कैसे आना हुआ? सब कुशल-मंगल तो है ना?”
राघव का गला सूख रहा था। उसने हाथ जोड़ते हुए धीमी आवाज में पूछा, “शंभू चाचा… आज मेरी दुकान पर जो ग्राहक आए थे, क्या उन्हें आपने मेरे पास भेजा था?”
शंभू जी ने बही-खाता बंद किया, चश्मा उतारकर मेज पर रखा और एक सहज हंसी हंसते हुए बोले, “अरे पगले, तो इसमें इतना हैरान होने की क्या बात है? आज एकादशी थी, बहुत से लोगों को खास पीतल और तांबे के पूजा बर्तन चाहिए थे, जो उस वक्त मेरी दुकान में सामने नहीं थे। मुझे पता था कि तूने नया-नया काम शुरू किया है और तेरे पास ताजा और बेहतरीन माल होगा, सो मैंने उन्हें तेरी दुकान का रास्ता बता दिया। ग्राहक को उसकी पसंद की चीज मिल गई, बात खत्म।”
राघव ने नजरें घुमाकर दुकान के अंदर देखा। वहां पीछे की रैक पर उसी तरह के दर्जनों पीतल के दीये और तांबे के कलश सजे हुए थे, जैसे उसने अभी-अभी बेचे थे। उसके पास जो माल था, वह तो शंभू जी की दुकान का दसवां हिस्सा भी नहीं था।
राघव की आंखें डबडबा आईं। उसने कांपते स्वर में कहा, “चाचा जी… आप झूठ बोल रहे हैं। आपके पास तो हर तरह का सामान मौजूद है। आप कस्बे के सबसे बड़े व्यापारी हैं, फिर आपने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारी? अपने खुद के ग्राहकों को एक नए और छोटे दुकानदार के पास भेजकर आपने अपना नुकसान क्यों करवाया? इस कॉम्पटीशन के जमाने में तो लोग दूसरों की दुकान बंद करवाने की ताक में रहते हैं।”
शंभू दयाल जी गद्दी से उठे। उन्होंने आगे बढ़कर राघव के दोनों कंधे अपने मजबूत और बुजुर्ग हाथों में थाम लिए। उनकी आंखों में एक पिता जैसी करुणा और वात्सल्य तैर रहा था।
वे बेहद शांत और गंभीर आवाज में बोले, “बेटा, व्यापार सिर्फ नफे और नुकसान का तराजू नहीं होता। व्यापार समाज के साथ मिलकर जीने का एक जरिया है। कल रात जब तू अपनी दुकान बंद करके गली से निकल रहा था, तो फोन पर रोते हुए अपनी मां से बात कर रहा था। उसी वक्त मैं भी अपनी दुकान की लाइट बंद करके अपनी स्कूटी की तरफ बढ़ रहा था। तेरी सारी बातें मेरे कानों में पड़ गईं। तू कह रहा था कि दुकान का किराया नहीं निकल रहा, घर कैसे चलेगा, बच्चे की पढ़ाई कैसे होगी…”
राघव ने शर्मिंदगी से अपना सिर झुका लिया।
शंभू जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए आगे कहा, “बेटा, जब तू अपनी मां के सामने रो रहा था, तो मुझे आज से पैंतालीस साल पुराना अपना वक्त याद आ गया। जब मैंने इस कस्बे में अपनी पहली छोटी सी दुकान खोली थी, तब मेरे पास भी खाने के लाले पड़े थे। मेरी मां भी घर में बैठकर मेरे लिए ऐसे ही दुआएं मांगती थी। कल जब तूने कहा कि ‘मां सारा ग्राहक तो चौराहे वाली बड़ी दुकान पर चला जाता है’, तो मेरा दिल कचोट उठा। मुझे लगा कि अगर मेरे इतने बड़े कारोबार के होते हुए मेरे ही पड़ोस की गली में एक मेहनती नौजवान का चूल्हा बुझ जाए, तो मेरी इस धन-दौलत पर लानत है।”
राघव की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह फफक पड़ा, “चाचा जी… मैं तो आज मन ही मन खुश हो रहा था कि मेरी मां की दुआओं से आपकी दुकान की ग्राहकी कटकर मेरी दुकान पर आ गई। मैं कितना स्वार्थी और संकीर्ण सोच वाला निकला… मुझे माफ कर दीजिए चाचा जी!”
शंभू दयाल जी ने उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया और बोले, “ना पगले, तू गलत नहीं सोच रहा था। यह सब तेरी मां की ही तो दुआओं का असर है! फर्क सिर्फ इतना है कि ईश्वर ने तेरी मां की प्रार्थना कबूल करने के लिए इस बूढ़े शंभू को जरिया बना दिया। माएं तो सबकी एक जैसी होती हैं बेटा, चाहे तेरी हो या मेरी। मेरी मां ने मुझसे बचपन में एक बात कही थी—’शंभू, अपनी थाली में रोटी आ जाए तो खुश जरूर होना, लेकिन अगर पड़ोस की थाली खाली हो तो अपनी रोटी में से आधा टुकड़ा उधर बढ़ा देना, तभी पेट और आत्मा दोनों तृप्त होते हैं।’ मैं तो बस अपनी मां की उसी सीख को निभा रहा था।”
राघव के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे। जिस दुनिया को वह मतलबी, स्वार्थी और क्रूर समझ रहा था, उसी दुनिया में उसके ठीक सामने देवदूत बनकर एक इंसान खड़ा था। व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता की तमाम दीवारें उस बुजुर्ग व्यापारी के बड़प्पन के आगे ढह चुकी थीं।
शंभू जी ने प्यार से उसकी पीठ थपथपाई और कहा, “चल, अब आंसू पोंछ। बाजार में प्रतियोगिता अपनी जगह है, लेकिन इंसानियत उससे बहुत ऊपर है। कल से तू और मैं प्रतिद्वंद्वी नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं। जो माल तेरे पास कम पड़े, तू मेरे गोदाम से ले जाना, और जब बिक जाए तब पैसे दे देना। और हाँ… अपनी मां को फोन करके कहना कि उसका बेटा अब रोएगा नहीं, बल्कि सीना तानकर अपनी गृहस्थी चलाएगा।”
उस रात जब राघव अपने घर लौटा, तो उसके हाथ में सिर्फ पैसों का गल्ला नहीं था, बल्कि उसके दिल में एक नया जीवन-दर्शन था। उसने घर जाकर सबसे पहले अपनी मां के चरण छुए और उन्हें गले लगा लिया।
आज आसमान में चमकते तारों की छांव में कस्बा सो रहा था, लेकिन राघव के भीतर इंसानियत और उम्मीद का एक ऐसा सूरज उग चुका था, जिसकी रोशनी कभी मद्धिम नहीं पड़ने वाली थी। उसने सीख लिया था कि किसी की राह में कांटे बिछाकर कोई अपनी मंजिल नहीं पा सकता, असली सुकून तो दूसरों की राह के पत्थर हटाकर उनके साथ कदम मिलाने में ही है।
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मूल लेखक : विनय कुमार मिश्रा