शादी के महज़ दो महीने ही बीते थे। नए घर की आबोहवा, नए लोग और हर कदम पर एक अनजानी परीक्षा। जब मैं विदा होकर इस घर में आई थी, तो मेरे ससुर पंडित दीनानाथ जी ने बड़े गर्व से पूरे मोहल्ले में मिठाई बाँटी थी। जब भी कोई रिश्तेदार या मिलने-जुलने वाला आता, बाबूजी की छाती चौड़ी हो जाती। वे बड़े फक्र से कहते, “अरे भाई, हमारी बहू दृष्टि तो एम.एससी. गोल्ड मेडलिस्ट है! कॉलेज में पढ़ाने की तैयारी कर रही है। घर में साक्षात सरस्वती पधारी हैं।”
बाबूजी का यह अपनापन मेरे भीतर हौसला भर देता, लेकिन घर के भीतर का माहौल बाहर की तारीफों से बिल्कुल उलट था। मेरी सासु माँ, जानकी देवी, जिन्हें मोहल्ले भर में उनके कड़े स्वभाव के लिए जाना जाता था, उन्हें मेरी डिग्रियों से कोई सरोकार नहीं था। उनके लिए बहू की काबिलियत केवल इस बात से तय होती थी कि वह रसोई में कितनी खटती है और उनकी हर हाँ में हाँ कितनी कुशलता से मिलाती है। सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक, उनका एक ही राग रहता, “इसे यह सलीका नहीं आता, इसे वह कायदा नहीं मालूम… आजकल की लड़कियाँ किताबों में मुँह गड़ाए रहती हैं, गृहस्थी के अलिफ़-बे का भी ज्ञान नहीं होता।”
बाबूजी जब भी सासु माँ को टोकते, वे और भड़क जातीं। इसलिए बाबूजी अक्सर खामोश हो जाते, और मैं अपने आँसू पीकर खुद को समझाती, “कोई बात नहीं दृष्टि, नया घर है, नई आदतें हैं। अगली बार और ध्यान से करूँगी, एक दिन माँ जी का दिल ज़रूर जीत लूँगी।”
दीपावली का पावन त्योहार सिर पर था। पूरे घर में सफेदी की गंध और उत्सव की चहल-पहल थी। हमारे ससुराल का एक पक्का नियम था कि त्योहार पर बाज़ार की बनी कोई भी मिठाई या नमकीन नहीं खरीदी जाती थी। शुद्धता और परंपरा के नाम पर सब कुछ घर के भीतर ही तैयार होता था। मठरी, बेसन के लड्डू, शकरपारे और सबसे खास—’मावा गुझिया’ और ‘खस्ता समोसे’। गुझिया और लड्डू बनाने में तो मैंने मायके में माँ का पूरा हाथ बँटाया था, लेकिन खस्ता समोसे और खस्ता कचौरी हमेशा हमारे यहाँ बाज़ार की मशहूर दुकान से ही आते थे। यहाँ सब कुछ घर पर ही बनना था, और इसकी मुख्य ज़िम्मेदारी सासु माँ के आदेशानुसार मेरे कंधों पर आ टिकी।
सुबह के दस बज रहे थे। कड़ाही में तेल चढ़ चुका था। सासु माँ ने मैदे का कड़ा आटा गूँथकर मुझे थमा दिया और बोलीं, “चलो बहू, अपनी पढ़ाई-लिखाई की समझ ज़रा यहाँ भी दिखाओ। आज शाम के जलपान के लिए खस्ता समोसे तैयार करने हैं। ज़रा बेलने बैठो।”
मैं बड़े उत्साह और आदर के साथ रसोई के पाटे पर बैठ गई। मैंने लोई तोड़ी और उसे गोल बेलकर बीच से काटकर त्रिकोण बनाने लगी। मैं पूरी सावधानी बरत रही थी कि कहीं से कोई खोट न निकले। अभी मैंने दो ही समोसे भरकर किनारे रखे थे कि पास खड़ी सासु माँ ने दोनों हाथ कमर पर टिकाए और इतने कर्कश स्वर में बोलीं मानो मैंने कोई गुनाह कर दिया हो।
“अरे भगवान! यह क्या बना रही हो? मैंने समोसे बनाने को कहा था या हाथी के कान? इतनी मोटी और बड़ी-बड़ी पट्टियाँ बेलोगी तो यह समोसा बनेगा या पत्थर? अक्ल नाम की चीज़ छूकर भी नहीं गई है क्या?”
उनकी तेज़ आवाज़ सीधे बाहर बरामदे तक पहुँची, जहाँ बाबूजी चश्मा लगाए अखबार पढ़ रहे थे। बाबूजी तुरंत अखबार रखकर रसोई के दरवाज़े पर आ खड़े हुए। उन्होंने देखा कि मेरी आँखें नीचे झुकी हैं और होठ काँप रहे हैं।
बाबूजी ने बड़े ही शांत स्वर में सासु माँ से कहा, “अरे जानकी, इतना क्यों चिल्ला रही हो? बच्ची पहली बार बना रही है। प्यार से बता दो न कि खस्ता समोसों की पट्टी थोड़ी पतली और मध्यम आकार की बेली जाती है। सीखने से ही तो सब सीखते हैं।”
सासु माँ का पारा और चढ़ गया। उन्होंने तीखी नज़रों से बाबूजी को देखा और ताना मारा, “हाँ-हाँ, आप तो वकालत करने चले ही आएँगे! हर बात हम ही सिखाएँगे क्या बैठकर? ब्याह कर लाई हूँ तो क्या अब पाठशाला खोलूँ? कुछ इसकी माँ ने भी सिखाया-पढ़ाया है या सिर्फ डिग्रियों का पुलिंदा थमा कर विदा कर दिया?”
‘माँ’ का नाम आते ही मेरे सीने में एक हूक सी उठी। आँखों से आँसू छलक कर गालों पर बह निकले। अगर मेरा अपना मायका होता, तो मैं उसी पल बेलन पटककर अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लेती, और फिर माँ मुझे पुचकार कर मनाती। लेकिन यह ससुराल था। यहाँ नाराज़ होने का हक सिर्फ बड़ों को था, सहने की ज़िम्मेदारी बहू की थी। मैंने चुपचाप अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं। बाबूजी ने मेरी तरफ एक बेबस और सांत्वना भरी नज़र डाली।
मैंने गहरी साँस ली, मन को शांत किया और समोसों की पट्टियों का आकार छोटा और पतला रखते हुए बेलना शुरू किया। मसाले की सटीक भराई करके मैंने एक-एक करके करीब तीस समोसे तैयार कर लिए। धीमी आँच पर जब समोसे तेल में तैरने लगे, तो उनकी सोंधी, हींग और गरम मसाले की महक पूरे घर में फैलने लगी।
खुशबू इतनी लाजवाब थी कि बाबूजी से रहा नहीं गया। वे अपनी छड़ी टेकते हुए फिर से रसोई में आ गए। पहला समोसा जो एकदम सुनहरा और कुरकुरा सिककर निकला था, मैंने प्लेट में टिशू पेपर बिछाकर बाबूजी को दिया।
बाबूजी ने एक टुकड़ा मुँह में रखा। उनकी आँखों में तृप्ति का भाव तैर गया। वे गरदन हिलाते हुए बोले, “वाह भाई वाह! क्या खस्तापन है और क्या स्वाद है! देखा जानकी, बस ज़रा सा बताने की देर थी। बहू इतनी होनहार है कि एक ही बार में सब समझ गई। हलवाई भी इसके आगे फेल हैं।”
सासु माँ वहीं कोने में खड़ी यह सब देख रही थीं। उन्हें शायद बाबूजी की यह तारीफ हज़म नहीं हुई। वे मुँह बिचकाते हुए आगे आईं। उन्होंने कड़ाही से एक समोसा निकाला, उसका कोना तोड़ा और चखते हुए तपाक से बोलीं, “हुहं! तारीफ के पुल बांधने से स्वाद नहीं बढ़ता। बहुत ज़्यादा लाल कर दिया है तुमने, जलने की बू आ रही है। इन्हें तो कुछ पता नहीं रहता। समोसों को थोड़ा कम सेंको, हल्का बादामी रंग आना चाहिए बस। सफेद-सफेद सा रहेगा तभी तो खस्ता कहलाएगा। गैस धीमी करो और जल्दी बाहर निकालो।”
मैं जानती थी कि अगर समोसा पूरा सुनहरा नहीं सिंका, तो अंदर का मैदा कच्चा रह जाएगा और वह खस्ता होने के बजाय रबड़ जैसा खिंचेगा। लेकिन सासु माँ के हुक्म के आगे मेरी क्या बिसात थी? मैंने अपना सिर झुकाया और कहा, “जी माँ जी।”
सासु माँ के कहे अनुसार, मैंने बची हुई लगभग एक-चौथाई समोसों की खेप को बहुत कम सेंका। वे समोसे हल्के पीले और अधपके से दिख रहे थे। जैसे ही वे हल्के से कड़े हुए, मैंने उन्हें निकाल लिया।
शाम के करीब पाँच बजे, मेरे पति राघव और देवर अमित दफ्तर से लौटे। दिन भर की थकान के बाद दोनों सीधे डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गए। अमित ने हँसते हुए आवाज़ लगाई, “भाभी! पूरे मोहल्ले में आपके समोसों की खुशबू उड़ रही है। जल्दी से चाय और समोसे लाइए, भूख से बुरा हाल है!”
मैं रसोई में गई। सासु माँ वहीं बैठी थीं। उन्होंने खुद प्लेट उठाई और उन कम सिंके, हल्के पीले समोसों को प्लेट में सजाकर राघव और अमित के सामने रख दिया। मैं चुपचाप चाय की ट्रे लेकर पीछे-पीछे आई।
राघव ने बड़े चाव से समोसा उठाया और पहला निवाला लिया। लेते ही उसका चेहरा उतर गया। “अरे… यह क्या है? समोसा बाहर से तो नरम है और अंदर से मैदा बिल्कुल कच्चा लग रहा है। चबाया भी नहीं जा रहा।”
अमित ने भी आधा समोसा प्लेट में वापस पटक दिया और मुँह बनाते हुए बोला, “अरे यार, यह तो बिल्कुल बेस्वाद है। ऐसा लग रहा है जैसे उबला हुआ मैदा खा रहे हों। किसने बनाए हैं ये समोसे?”
सासु माँ ने तुरंत अपना पल्ला झाड़ते हुए नज़रें फेरीं और सपाट आवाज़ में बोलीं, “और कौन बनाएगा? तुम्हारी भाभी ने ही तो बनाए हैं। हम तो बस बता ही सकते हैं, अब हाथ की सफाई तो अपनी-अपनी होती है। पढ़ाई-लिखाई में ही सारा ध्यान रहा, तो रसोई कहाँ से सधती।”
राघव ने मेरी तरफ एक हल्की सी नाराज़गी भरी नज़र डाली। मेरा दिल चाहा कि मैं चीख कर कह दूँ कि माँ जी ने ही मुझे ज़बरदस्ती कम सेंकने के लिए कहा था। लेकिन मैंने अपने संस्कार याद रखे। मैंने होंठ सी लिए और अपनी नज़रें नीची कर लीं।
तभी अमित उठा और रसोई की तरफ गया। “मुझे नहीं लगता कि भाभी के हाथ में स्वाद नहीं है। मैं खुद देखकर आता हूँ।” रसोई में जाकर उसने उस परात में देखा जहाँ बाबूजी के कहने पर अच्छी तरह सिंके हुए सुनहरे समोसे रखे थे। अमित ने उसमें से एक समोसा उठाया, खाया और चिल्लाया, “अरे वाह भैया! यहाँ तो असली खजाना छिपा है! यह समोसा खाकर देखो, क्या गज़ब का क्रिस्पी बना है!”
राघव ने भी रसोई से सुनहरा समोसा मँगवाकर खाया और उसकी आँखें चमक उठीं। “अरे सच में! यह तो बाज़ार से भी सौ गुना बेहतर है। फिर वो पहले वाले समोसे ऐसे क्यों थे?”
अमित और राघव दोनों प्लेट भर-भरकर बढ़िया सिंके समोसे खाने लगे और मेरी तारीफों के पुल बाँधने लगे। सासु माँ के चेहरे का रंग उड़ चुका था। वे अपनी ही चालाकी में फँस गई थीं।
शाम ढल चुकी थी। सब अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। मैंने देखा कि वे अधपके, कम सिंके समोसे डाइनिंग टेबल पर वैसे ही उपेक्षित पड़े थे। मैंने उन्हें चुपचाप उठाया। मैं जानती थी कि अन्न का अपमान नहीं होना चाहिए। हमारे घर के पीछे एक खुली बस्ती थी, जहाँ कुछ दिहाड़ी मज़दूरों के परिवार रहते थे। मैंने उन समोसों को दोबारा हल्की आँच पर तवे पर कुरकुरा किया और एक डिब्बे में पैक करके रख दिया, ताकि अगले दिन सुबह सफाई वाले भैया और उनके बच्चों को नाश्ते में चाय के साथ दे सकूँ।
रात के करीब दस बजे, जब पूरा घर सो चुका था, मुझे प्यास लगी। मैं पानी की बोतल लेने दबे पाँव रसोई की तरफ बढ़ी। रसोई का बल्ब जल रहा था। मैंने दरवाज़े की ओट से अंदर झाँका।
सामने का दृश्य देखकर मेरे कदम जहाँ के तहाँ थम गए।
सासु माँ रसोई में खड़ी थीं। वे उस खाली परात को टटोल रही थीं जहाँ शाम को बढ़िया सिंके समोसे रखे थे, पर वह खाली थी। फिर उनकी नज़र डाइनिंग टेबल की तरफ गई, जहाँ वे कम सिंके समोसे ढूँढने लगीं, पर वे भी वहाँ नहीं थे। उनके चेहरे पर गहरी भूख और अजीब सी झेंप थी। शाम को सबके सामने अपनी बात रखने के चक्कर में उन्होंने खुद एक भी समोसा नहीं खाया था, और अब उन्हें भूख सता रही थी।
तभी मेरी आहट पाकर वे चौंक कर पलटीं। मुझे सामने खड़ा देखकर उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। एक सास का अपनी ही रसोई में इस तरह रंगे हाथों पकड़े जाना उनके अहंकार पर बहुत भारी पड़ रहा था।
“तुम… तुम इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?” उन्होंने अपनी आवाज़ में वही पुरानी कड़वाहट घोलने की नाकाम कोशिश की, लेकिन उनकी आवाज़ कांप रही थी।
मैंने कोई ताना नहीं मारा, न ही उनकी उस असहजता का मज़ाक उड़ाया। मैं जानती थी कि रिश्तों में जीत किसी को हराकर नहीं, बल्कि अपना बनाकर हासिल की जाती है।
मैं शांत कदमों से आगे बढ़ी। मैंने फ्रिज खोला, शाम को बचा हुआ थोड़ा सा मसाला और दो समोसों की पट्टियाँ जो मैंने अलग रख दी थीं, उन्हें निकाला।
“माँ जी, आप बैठिए। शाम को आपने कुछ नहीं खाया था ना? मैं जानती हूँ, आपको मेरी बनाई चीज़ पसंद नहीं आई थी, लेकिन खाली पेट सोना सेहत के लिए अच्छा नहीं है। मैं अभी आपके लिए दो ताज़े और बिल्कुल आपकी पसंद के समोसे सेंक देती हूँ।”
सासु माँ अवाक होकर मुझे देखती रहीं। उनके होंठ हिले, पर शब्द नहीं निकले।
मैंने तुरंत गैस जलाई। तेल गर्म किया और दो समोसों को बड़े प्यार से, मध्यम आँच पर बादामी होने तक सेंका। फिर मैंने एक प्लेट में हरी चटनी के साथ वे गरमा-गरम समोसे और साथ में एक कप ताज़ा अदरक वाली चाय बनाकर उनके सामने रख दी।
“लीजिए माँ जी, खाकर देखिए।” मैंने बहुत ही सहजता से कहा।
सासु माँ ने कांपते हाथों से समोसा उठाया। एक निवाला मुँह में रखा। बाहर से कुरकुरा और अंदर से मसालों की सौंधी महक। उन्होंने दूसरा निवाला खाया, फिर तीसरा। खाते-खाते अचानक उनकी आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू टपक कर उनकी साड़ी के पल्लू पर गिर पड़े।
उन्होंने प्लेट नीचे रखी और अपना सिर झुका लिया।
“बहू…” उनकी आवाज़ पहली बार इतनी धीमी और भीगी हुई थी। “शाम को… शाम को मैंने जानबूझकर तुमसे कहा था कि समोसों को कम सेंको। मुझे लगा था कि अगर तुम्हारी हर बात की तारीफ होगी, तो इस घर में मेरा रुतबा कम हो जाएगा। मुझे डर था कि यह पढ़ी-लिखी लड़की मेरे बरसों के राज को एक दिन में छीन लेगी। मैंने अपनी ईगो के लिए तुम्हारा दिल दुखाया, तुम्हें सबके सामने नीचा दिखाने की कोशिश की। और तुम… तुम सब कुछ जानते हुए भी मेरे लिए रात को चूल्हा जला रही हो?”
मैं आगे बढ़ी और ज़मीन पर उनके घुटनों के पास बैठ गई। मैंने उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“माँ जी, आप यह क्या कह रही हैं? यह घर आपका है, यह रसोई आपकी है, और इस परिवार की नींव आप हैं। मेरी डिग्रियाँ मुझे दुनिया से लड़ना सिखा सकती हैं, लेकिन अपनों का मान रखना तो मुझे मेरे परिवार ने ही सिखाया है। मैं यहाँ आपका रुतबा छीनने नहीं आई हूँ माँ जी, मैं तो बस आपकी छत्रछाया में इस घर की बेटी बनना चाहती हूँ। अगर बेटी से कोई भूल हो जाए, तो डाँटिएगा ज़रूर, लेकिन पराया मत समझिएगा।”
सासु माँ का सारा पाषाण रूप, सारा अहंकार उस एक पल में आंसुओं की धार बनकर बह गया। उन्होंने झुककर मुझे उठाया और अपनी छाती से भींच लिया। उस आलिंगन में कोई सास नहीं थी, कोई बहू नहीं थी; वहाँ केवल एक माँ थी और उसकी बेटी थी।
“मुझे माफ़ कर दे दृष्टि… मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची,” सासु माँ रोते हुए मेरे सिर पर हाथ फेर रही थीं। “तू सच में सिर्फ किताबों से पढ़ी-लिखी नहीं है, तेरे संस्कार सोने से भी ज्यादा खरे हैं। आज से तू इस घर की बहू नहीं, मेरी सबसे बड़ी ताकत है।”
अगले दिन सुबह जब दीपावली की तैयारियाँ फिर से शुरू हुईं, तो रसोई का नज़ारा बिल्कुल बदला हुआ था। सासु माँ पाटे पर बैठी थीं और मैं उनके बगल में। वे अपने हाथों से मुझे गुझिया के किनारों पर डिज़ाइन बनाना सिखा रही थीं, और जब बाबूजी चाय पीने आए, तो सासु माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुनिए जी, ज़रा चखकर बताइए, मेरी बेटी ने आज बेसन की बर्फी में इलायची सही डाली है या नहीं!”
बाबूजी ने हम दोनों को देखा और उनकी आँखों में संतोष के आँसू छलक आए। घर में अब कोई कड़वाहट नहीं थी, केवल प्रेम, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की वह मिठास थी, जो किसी भी त्योहार से कहीं ज्यादा पावन और खूबसूरत होती है।
प्रिय पाठकों,
आपको क्या लगता है? क्या ससुराल में सास-बहू के रिश्ते को सुधारने के लिए सिर्फ बहू को ही झुकना पड़ता है, या फिर दोनों तरफ से समझदारी और अपनेपन की एक छोटी सी पहल किसी भी घर को स्वर्ग बना सकती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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