स्वाभिमान की दहलीज

वंदना ने आगे बढ़कर तुरंत अपने पिता के कंधे थामे और उन्हें जबरन सीधा खड़ा किया। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक असीम गरिमा और दृढ़ता थी। उसने अपने आंचल से पिता के आंसू पोंछे और कहा, “पिताजी, जिन पैरों ने मुझे सीधे खड़े होकर सच की राह पर चलना सिखाया, वे पैर आज … Read more

देहरी की छाँव

 ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मयंक की उँगलियाँ लगातार अपनी हथेलियों को मसल रही थीं। बाहर तेजी से पीछे छूटते हरे-भरे खेत, आम की अमराइयां और धूल उड़ाती पगडंडियाँ गवाह थीं कि उसका पैतृक कस्बा अब बस चंद मिनटों की दूरी पर था। पूरे आठ साल बीत चुके थे इस रास्ते से गुजरे … Read more

ढलती उम्र का हिसाब

वकील के भेजे हुए उस भारी-भरकम लीगल लिफाफे को हाथ में थामे मालती के चेहरे पर न तो कोई शिकन थी और न ही आंखों में आंसुओं की नमी। छब्बीस पन्नों के उस कानूनी मसौदे पर अंग्रेजी के बेजान अक्षरों में वैवाहिक अलगाव, भरण-पोषण और चल-अचल संपत्ति के अधिकारों की लंबी-चौड़ी दलीलें दर्ज थीं। जिंदगी … Read more

चौखट की लकीरें

 “वही रीत तो अब बदलनी है, भाई साहब,” कल्याणी ने हाथ में थामी एक पर्ची मेज पर रख दी। “यह उन चीजों की सूची है जो अनन्या को पसंद हैं। अनन्या पढ़ी-लिखी लड़की है, कॉलेज में पढ़ाती है। वह इस घर में किसी की मर्जी का खिलौना बनकर नहीं, बल्कि एक इंसान बनकर कदम रखेगी। … Read more

रेत पर खिली धूप

विनीता पहले तो झिझकी, पर अंदर से उसका मन भी इस घुटन भरी जिंदगी से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलने को मचल रहा था। वह कैफे में एक कोने की मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अपूर्व ने कॉफी का ऑर्डर दिया। उसने विनीता के चेहरे को ध्यान से देखा और बहुत ही संवेदनशील लहजे … Read more

पूर्णता की तलाश और मन का दर्पण

“मम्मी जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, अगर आप बुरा न मानें तो,” अवनि ने बहुत आदर के साथ बात शुरू की। “जब से मेरी शादी हुई है, मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं इस घर के नियमों और आपकी प्राथमिकताओं को समझूँ। मैं आपकी उम्र और आपके तजुर्बे का दिल से … Read more

दहलीज के पार का अपनापन

पंखुड़ी की बातों ने अर्णव के जमीर को झकझोर कर रख दिया। पंखुड़ी ने आगे कहा, “भैया, कल को जब मेरी शादी हो जाएगी और मैं सालों बाद तुम्हारे घर आऊंगी, और अगर तुम्हारे बच्चे मेरे साथ ऐसा ही अजनबियों जैसा बर्ताव करेंगे, तो सोचो मेरी रूह पर क्या गुजरेगी? क्या मायके का रिश्ता सिर्फ … Read more

बरगद की छाँव और महुआ की महक

“लल्ली, मुझे कभी-कभी डर लगता था कि कहीं ये नई पीढ़ी हमारे इन रिश्तों की अहमियत भूल न जाए। पर आज जब मैंने देखा कि तेरी बहू जानकी ने कितनी श्रद्धा से मेरे पैर छुए, हेमंत ने स्टेशन पर मुझे देखते ही कैसे गले लगा लिया… मेरा सारा डर काफूर हो गया। हमारे संस्कार मरे … Read more

गुड़ की डली और सोने की थाली

उस दिन मालती के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी। जिस मालती ने बचपन में भाई के हिस्से की रोटी कभी नहीं छीनी थी, आज उसी पर चोरी का इल्जाम था! उसने रो-रोकर अपने भाइयों की तरफ देखा, पर दोनों खामोश रहे। भाभी के पीछे खड़े बड़े भाई ने अपनी नजरें फेर लीं क्योंकि … Read more

परिष्कृत सोच

     निर्मला को चक्कर आ रहे थे, वह निढाल सी कुर्सी पर बैठ गई | तौलिये से पसीना पोछा ,और राकेश से बोली ‘जरा पंखे का बटन दबा दो,घबराहट हो रही है |’ निर्मला की उम्र ६० साल की थी, उसे ब्लड प्रेशर की शिकायत थी, अस्थमा भी था | राकेश ने पंखा चालू किया, और … Read more

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