दहलीज के पार का अपनापन

पंखुड़ी की बातों ने अर्णव के जमीर को झकझोर कर रख दिया। पंखुड़ी ने आगे कहा, “भैया, कल को जब मेरी शादी हो जाएगी और मैं सालों बाद तुम्हारे घर आऊंगी, और अगर तुम्हारे बच्चे मेरे साथ ऐसा ही अजनबियों जैसा बर्ताव करेंगे, तो सोचो मेरी रूह पर क्या गुजरेगी? क्या मायके का रिश्ता सिर्फ एक पीढ़ी का होता है? क्या भाई के जाने के साथ ही बुआ का मायके पर हक खत्म हो जाता है?”

रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर भागते पेड़ों को देखते हुए जानकी देवी की नजरें बार-बार अपनी गोद में रखे छोटे से बटुए और पैर के पास टिके पुराने सूटकेस पर चली जाती थीं। उस सूटकेस में कुछ साड़ियां, मायके के लिए बनाई गई खास मिठाइयां और ढेरों उम्मीदें बंद थीं। जानकी देवी की उम्र अब बहत्तर को छू रही थी। सिर के चांदी जैसे सफेद बाल और चेहरे की झुर्रियां इस बात की गवाही देती थीं कि वक्त का पहिया कितनी तेजी से घूमा है। करीब पचास साल पहले इसी रेलवे स्टेशन से विदा होकर वे ससुराल गई थीं। तब माता-पिता जीवित थे, बड़ा भाई केशव स्टेशन तक छोड़ने आया था और उसकी आंखों में बहन के बिछड़ने का दर्द साफ झलकता था। फिर धीरे-धीरे जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही। माता-पिता चले गए, और कुछ बरस पहले भाई केशव भी संसार छोड़ गया। अब उस पुश्तैनी हवेली में भतीजा माधव, उसकी पत्नी सुमित्रा और उनके दो बच्चे—अर्णव और पंखुड़ी—रहते थे।

स्टेशन से ऑटो लेकर जब जानकी देवी उस हवेली के लोहे के बड़े फाटक पर पहुंचीं, तो उनका दिल किसी अल्हड़ बच्ची की तरह धड़क उठा। यह वही हवेली थी, जिसकी चौखट पर कभी उनका बचपन हंसा-खेला करता था। सामने आंगन में लगा आम का पेड़ अब काफी बड़ा और घना हो चुका था।

जैसे ही उन्होंने हवेली के भीतर कदम रखा, सामने से भतीजा माधव बाहर निकल रहा था। अपने सामने बुआ को अचानक खड़े देखकर माधव का चेहरा खिल उठा। वह दौड़कर आगे आया और झुककर पूरी श्रद्धा से जानकी देवी के चरण स्पर्श किए।

“अरे बुआ जी! आप अचानक? हमें पहले बताया क्यों नहीं, मैं खुद स्टेशन गाड़ी लेकर आ जाता,” माधव ने बड़े आदर और गर्मजोशी से उनका बैग हाथ में लेते हुए कहा।

माधव के इस अपनत्व ने जानकी देवी के बूढ़े चेहरे पर एक सुकून भरी चमक ला दी। भाई के जाने के बाद एक बुआ अपने भतीजे में ही अपने भाई की छवि और वही पुराना मायके वाला दुलार खोजती है। जानकी देवी के मन का एक कोना हमेशा इस डर से कांपता था कि कहीं भाई के बाद यह मायका उनसे पूरी तरह छूट न जाए। माधव का यह स्नेह देखकर उन्हें लगा कि उनका मायका अभी जिंदा है।

माधव ने आवाज लगाई, “सुमित्रा, अरे देखो तो कौन आया है! और अर्णव, जरा इधर आओ बेटा।”

भीतर से सुमित्रा हाथ पोंछते हुए बाहर आई और मुस्कुराते हुए जानकी देवी के पैर छूकर उनका स्वागत किया। तभी कमरे से माधव का बेटा अर्णव बाहर निकला। अर्णव दिल्ली के एक बड़े कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी करके छुट्टियों में घर आया हुआ था। उसके हाथ में लैपटॉप का बैग था और कानों में ईयरफोन लटक रहे थे।

“अर्णव बेटा, आगे आओ और पैर छुओ। ये तुम्हारी बड़ी बुआ दादी हैं,” माधव ने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

अर्णव एक पल के लिए ठिठका। उसने अचरज भरी और कुछ असहज नजरों से सामने खड़ी बुजुर्ग महिला को देखा। फिर वह आगे बढ़ा और उसने बहुत ही बेमन से, लगभग औपचारिकता निभाते हुए जानकी देवी के घुटनों को हल्का सा छुआ और तुरंत पीछे हट गया। उसके चेहरे पर न तो कोई मुस्कान थी और न ही उस रिश्ते के प्रति कोई आदर या भावुकता। वह बस एक सामाजिक औपचारिकता पूरी कर रहा था।

उस ठंडे स्पर्श ने जानकी देवी के सीने में एक अजीब सी टीस जगा दी। उनके चेहरे की वह खिलखिलाती चमक एक पल में फीकी पड़ गई। उन्हें लगा कि जिस पीढ़ी के सहारे वे अपने मायके की डोर को थामे रखना चाहती थीं, उस पीढ़ी के लिए वे महज एक अजनबी थीं। आज फिर से उन्हें लगा कि उनका मायका रेत की तरह उनकी मुट्ठी से फिसल रहा है।

अर्णव ने अपनी मां सुमित्रा की तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए पूछा, “मम्मी, ये कौन हैं? मतलब, मैंने इन्हें पहले कभी देखा नहीं।”

सुमित्रा ने प्यार से बेटे को समझाते हुए कहा, “बेटा, ये तुम्हारे पापा की सगी बुआ जी हैं। तुम्हारे दादाजी की सबसे छोटी और लाडली बहन। बहुत साल पहले, जब यह घर बना था, तब बुआ जी भी इसी घर में तुम्हारी छोटी बहन पंखुड़ी की तरह रहा करती थीं। यह इनका अपना मायका है, यहीं इनका पूरा बचपन बीता है।”

कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ी पंखुड़ी यह सब बड़े ध्यान से सुन रही थी। पंखुड़ी अभी कॉलेज के पहले साल में थी और बेहद संवेदनशील लड़की थी। जब उसने अपनी मां की बात सुनी, तो उसका ध्यान बुआ दादी पर गया। उसने देखा कि जिस औरत का बचपन इस विशाल आंगन में उछलते-कूदते बीता था, जो इस हवेली की एक-एक ईंट, एक-एक खिड़की और हर कोने से वाकिफ थीं, वे आज उसी बैठक की लकड़ी की कुर्सी पर बड़ी असहज होकर बैठी थीं। उनकी नजरें दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीरों पर तैर रही थीं। और सबसे ज्यादा दर्दनाक दृश्य वह था, जो कुर्सी के ठीक नीचे रखा हुआ था—उनका वह छोटा सा पुराना सूटकेस।

पंखुड़ी ने महसूस किया कि वह सूटकेस किसी खामोश पहरेदार की तरह जानकी देवी के पैरों के पास रखा हुआ था, मानो हर सेकंड उन्हें यह याद दिला रहा हो कि—”तुम अब इस घर की बेटी नहीं, चंद दिनों की मेहमान हो… और तुम्हें जल्द ही लौटकर वापस जाना है।”

पंखुड़ी का दिल भर आया। उसने सोचा, क्या सचमुच लड़कियां इतनी पराई हो जाती हैं? जिस घर में इंसान जन्म लेता है, जहां उसकी पहली हंसी गूंजती है, जहां के आंगन की मिट्टी में खेलकर वह बड़ा होता है, शादी के कुछ दशकों बाद उसी घर में आने पर उसे एक कोने में सिमटकर बैठना पड़ता है? क्या यही हर लड़की का मुकद्दर है? कल को जब वह खुद विदा होकर जाएगी और बरसों बाद अपने भतीजों के घर लौटेगी, तो क्या उसके साथ भी ऐसा ही बेगानापन बरता जाएगा? यह सोचकर पंखुड़ी की आंखों में आंसू छलक आए।

दोपहर के भोजन के बाद घर में सन्नाटा छा गया। माधव अपने दफ्तर के काम से बाहर चला गया था और सुमित्रा रसोई समेटने में लगी थी। जानकी देवी बैठक में उसी कुर्सी पर बैठी खिड़की से बाहर आंगन को देख रही थीं। तभी पंखुड़ी चुपचाप उनके पास आकर बैठ गई।

“बुआ दादी, आप क्या देख रही हैं?” पंखुड़ी ने धीमे से पूछा।

जानकी देवी चौंक पड़ीं, फिर उन्होंने पंखुड़ी के सिर पर हाथ फेरते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “कुछ नहीं बिटिया… बस देख रही थी कि उस आम के पेड़ के नीचे कभी मेरा झूला हुआ करता था। सावन के महीने में केशव भैया मेरे लिए सबसे ऊंची पेंग मारते थे। अब न वो झूले रहे, न वो भैया रहे… और हम भी अब इस घर में मुसाफिर बनकर आते हैं।”

कहते-कहते जानकी देवी का गला भर आया। पंखुड़ी ने उनका हाथ अपने हाथों में थाम लिया। उस बूढ़े, कांपते हाथ में उसने मायके की मिट्टी की खुशबू महसूस की।

उधर, अर्णव बरामदे में टहल रहा था और उसने बुआ दादी और पंखुड़ी की यह बातचीत सुन ली। उसने देखा कि कैसे एक बुजुर्ग स्त्री अपने ही बचपन के घर में इतनी सहमी हुई बैठी थी। पंखुड़ी ने जब अर्णव को वहां खड़े देखा, तो वह उठकर उसके पास आई।

पंखुड़ी ने अर्णव का हाथ पकड़ा और उसे छत की सीढ़ियों की तरफ ले गई। “भैया, तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम्हारा वह रूखा व्यवहार बुआ दादी को कितना चुभा होगा?” पंखुड़ी ने शिकायती लहजे में कहा।

अर्णव ने झेंपते हुए सफाई दी, “अरे पंखुड़ी, मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया। सच कहूं तो मैं उन्हें जानता ही नहीं था। हमारे हॉस्टल और शहर की भागदौड़ में कभी पापा ने इनका जिक्र किया भी होगा तो मुझे याद नहीं रहा। मेरे लिए तो वे एक अनजान रिश्तेदार जैसी लगीं।”

पंखुड़ी ने गहरी सांस ली और अपने भाई की आंखों में देखते हुए कहा, “यही तो हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी कमजोरी है, भैया। हम सोशल मीडिया पर सैकड़ों अजनबियों से दोस्ती का दिखावा करते हैं, लेकिन अपने ही खून के उन बुजुर्गों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमारे परिवार की नींव रखी है। सोचो ज़रा, बुआ दादी जब इस घर से विदा हुई होंगी, तब उनके मन पर क्या बीती होगी? वे जब भी यहां आती हैं, तो कोई जायदाद या पैसे मांगने नहीं आतीं। वे सिर्फ अपने भाई की खुशबू, अपना बचपन और अपने होने का अहसास ढूंढने आती हैं। और हम क्या करते हैं? एक बेमन का प्रणाम करके उन्हें यह अहसास करा देते हैं कि उनका मायका अब खत्म हो चुका है।”

पंखुड़ी की बातों ने अर्णव के जमीर को झकझोर कर रख दिया। पंखुड़ी ने आगे कहा, “भैया, कल को जब मेरी शादी हो जाएगी और मैं सालों बाद तुम्हारे घर आऊंगी, और अगर तुम्हारे बच्चे मेरे साथ ऐसा ही अजनबियों जैसा बर्ताव करेंगे, तो सोचो मेरी रूह पर क्या गुजरेगी? क्या मायके का रिश्ता सिर्फ एक पीढ़ी का होता है? क्या भाई के जाने के साथ ही बुआ का मायके पर हक खत्म हो जाता है?”

अर्णव खामोश खड़ा रहा। उसकी नजरें झुक गईं। उसे अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उसने महसूस किया कि आत्मीयता केवल खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि उस रिश्ते को सम्मान और समय देने से जिंदा रहती है। उसने तय किया कि वह इस गलती को सुधारेगा।

शाम ढल चुकी थी। आसमान में सिंदूरी रंग घुल रहा था। जानकी देवी कमरे में अपने सूटकेस की चेन ठीक कर रही थीं, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उनका यहां ज्यादा रुकना शायद नई पीढ़ी को असहज कर रहा है। तभी कमरे के दरवाजे पर आहट हुई।

अर्णव हाथ में गर्म चाय की दो प्यालियां और प्लेट में बुआ दादी की पसंद की गरमा-गरम कचौड़ियां लेकर कमरे में दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर अब वह पहले वाला रूखापन बिल्कुल नहीं था, बल्कि एक सहज और आत्मीय मुस्कान थी।

“बुआ दादी, मां ने बताया कि आपको शाम को अदरक वाली चाय बहुत पसंद है। और ये देखिए, मैं खुद जाकर आपके लिए नुक्कड़ वाली दुकान से कचौड़ियां लेकर आया हूं,” अर्णव ने मुस्कुराते हुए कहा और चाय की प्याली उनके सामने मेज पर रख दी।

जानकी देवी ने आश्चर्य से अर्णव को देखा।

अर्णव वहीं फर्श पर, जानकी देवी के पैरों के पास बैठ गया। उसने बहुत ही आदर और कोमलता से उनके दोनों पैर छुए और अपने सिर पर उनका हाथ रख लिया। “बुआ दादी, मुझे माफ कर दीजिए। दोपहर में मैं आपको समझ नहीं पाया था। मुझे नहीं पता था कि जिस घर में मैं आज गर्व से सीना तानकर रहता हूं, उस घर की हर ईंट में आपका भी उतना ही हक और प्यार रचा-बसा है।”

जानकी देवी की आंखें फटी की फटी रह गईं। उनकी पलकों से आंसुओं की दो बूंदें ढुलककर अर्णव के सिर पर गिर पड़ीं।

अर्णव ने उठकर सबसे पहले उस पुराने सूटकेस को उठाया, जो सुबह से कुर्सी के नीचे पड़ा एक कड़वी सच्चाई बयान कर रहा था। अर्णव ने उस सूटकेस को उठाया और कमरे की बड़ी वाली अलमारी के सबसे ऊपर वाले सुरक्षित रैक में रख दिया।

“यह क्या कर रहे हो बेटा?” जानकी देवी ने रुंधे गले से पूछा।

अर्णव ने पलटकर बड़ी ही मासूमियत और दृढ़ता से कहा, “बुआ दादी, यह सूटकेस आपको बार-बार यह याद दिला रहा था कि आप मेहमान हैं और आपको जाना है। मैंने इसे बंद करके रख दिया है। आप इस घर की मेहमान नहीं हैं, यह आपका अपना घर है। जब तक आपका मन न भरे, आप यहां से कहीं नहीं जाएंगी। और हां, अब आपको मुझे अपने और दादाजी के बचपन के सारे किस्से सुनाने होंगे। मुझे जानना है कि जब आप मेरी उम्र की थीं, तो यह हवेली कैसी दिखती थी।”

उसी समय दरवाजे पर माधव, सुमित्रा और पंखुड़ी आकर खड़े हो गए। सबके चेहरों पर एक अनकहा संतोष और गर्व था।

जानकी देवी ने आगे बढ़कर अर्णव को अपने सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में पचास सालों की दूरी, भाई के बिछड़ने का गम और मायका छूटने का डर… सब कुछ एक पल में बह गया। उन्हें महसूस हुआ कि उनका केशव भैया मरा नहीं है, वह अपने पोते की इस समझदारी और संस्कारों में आज भी जिंदा है।

उस रात हवेली की बैठक में बहुत सालों बाद किसी पुराने रिकॉर्ड की तरह पुरानी यादें बजीं। जानकी देवी बोलती रहीं और अर्णव तथा पंखुड़ी मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। उस घर की दीवारों ने भी शायद राहत की सांस ली थी, क्योंकि बरसों बाद उस घर की बेटी को यह यकीन हो गया था कि पीढ़ियां बदलने से जड़ें नहीं कटतीं, और मायका कभी पराया नहीं होता अगर नई पीढ़ी के दिलों में संस्कारों का वास हो।

संवाद और विचार:

रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि हमारे दिए गए आदर और आत्मीयता से सांस लेते हैं। जब एक बेटी विदा होकर जाती है, तो वह अपना सब कुछ ससुराल को सौंप देती है, लेकिन उसके दिल का एक कोना हमेशा मायके के लिए धड़कता रहता है। नई पीढ़ी का यह दायित्व है कि वे अपने बुजुर्गों को केवल औपचारिकता न दें, बल्कि उन्हें यह अहसास कराएं कि उनका घर हमेशा उनका ही रहेगा। क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता की दौड़ में हमारी नई पीढ़ी पारिवारिक रिश्तों की इस गर्माहट को भूलती जा रही है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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