“लल्ली, मुझे कभी-कभी डर लगता था कि कहीं ये नई पीढ़ी हमारे इन रिश्तों की अहमियत भूल न जाए। पर आज जब मैंने देखा कि तेरी बहू जानकी ने कितनी श्रद्धा से मेरे पैर छुए, हेमंत ने स्टेशन पर मुझे देखते ही कैसे गले लगा लिया… मेरा सारा डर काफूर हो गया। हमारे संस्कार मरे नहीं हैं, वे आज भी ज़िंदा हैं।”
हेमंत ने आगे बढ़कर अपने मामा के पैर दबाने शुरू किए। “मामा जी, हम नई पीढ़ी के लोग भले ही आधुनिक दुनिया में जीते हों, पर हम यह कभी नहीं भूल सकते कि हमारी जड़ें कहाँ हैं। आपने माँ के लिए, इस पूरे परिवार के लिए जो किया, वो हमारे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। अब हम आपको अकेला नहीं रहने देंगे। हर दो महीने में हम गाँव आएंगे और छुट्टियों में आपको यहाँ हमारे पास आकर रहना होगा।”
साँझ ढलने को आई थी और आकाश में सिंदूरी रंग धीरे-धीरे गहराने लगा था। पश्चिमी हवा के झोंके जब दालान में लगे पुराने तुलसी के बिरवे को छूकर निकलते, तो एक सोंधी सी महक पूरे घर में बिखर जाती। कौशल्या देवी दालान की चौखट पर बैठी देर से सूती धागे में पिरोई जा रही सुई को देख रही थीं, पर उनका ध्यान धागे पर कम और सदर दरवाज़े की कुंडी पर ज़्यादा था। उनका हाथ बार-बार रुक जाता और कान बाहर गली में होने वाली हर आहट को पकड़ने की कोशिश करते।
रसोई से खटपट की आवाज़ आ रही थी। उनकी छोटी बहू, जानकी, चूल्हे की आँच धीमी करके बाहर आई और सासू माँ के चेहरे के भाव देखकर मुस्कुरा दी।
“अम्मा, काहे इतनी बेचैन हो रही हो? लल्ला स्टेशन पहुँच गए हैं, बस आते ही होंगे। आप तब से देहरी पर ही आँखें गड़ाए बैठी हो, ठंड लग जाएगी,” जानकी ने कौशल्या के कंधों पर शॉल को ठीक करते हुए सहजता से कहा।
कौशल्या देवी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आँखों की झुर्रियों में एक अजब सी चमक तैर गई। “बहू, तू नहीं समझेगी। जब सगा भाई बरसों बाद चौखट लांघता है न, तो कलेजा भीतर ही भीतर कुलांचे मारने लगता है। बचपन में जिस आँचल की छाँव में हम बड़े भए, आज उस छाँव का सबसे बड़ा हिस्सा हमारे इस छोटे से आँगन में कदम रखेगा। पूरे बारह साल बाद रघु भैया हमारे घर आ रहे हैं।”
जानकी ने सास के हाथ पर अपना हाथ रखा। “अम्मा, जब से मैं इस घर में ब्याह कर आई हूँ, मैंने हमेशा आपके मुंह से बड़े ताऊजी के ही किस्से सुने हैं। आज पहली बार उन्हें साक्षात देखूंगी।”
कौशल्या की आँखें भर आईं। “किस्से नहीं हैं बहू, वो तो साक्षात त्याग की मूरत हैं। हम सात भाई-बहन थे। जब बापू जी का साया हमारे सिर से उठा, तब रघु भैया बमुश्किल उन्नीस साल के रहे होंगे। अपनी पढ़ाई, अपने सारे सपने एक किनारे धर दिए उन्होंने। हम छोटों को कभी अनाथ होने का अहसास नहीं होने दिया। खुद फटी धोती पहनते रहे, पर त्योहार पर हम सबकी नई पोशाकें कभी नहीं छूटीं। मैं सबकी लाडली ‘लल्ली’ थी। मेरी ज़रा सी छींक पर आधी रात को तीन कोस पैदल चलकर वैद्य जी को ले आते थे।”
कहते-कहते कौशल्या का गला रुंध गया। पुरानी स्मृतियाँ किसी चलचित्र की भाँति उनकी आँखों के सामने तैरने लगीं। वह गाँव का बड़ा सा खपरैल वाला घर, दालान में बंधे मवेशी, चूल्हे से उठता धुआँ और माँ की हाथ की बनी बाजरे की रोटियाँ।
तभी बाहर दरवाज़े पर एक ऑटो रिक्शा आकर रुका। आवाज़ सुनते ही कौशल्या अपनी लाठी भूलकर लगभग दौड़ते हुए बाहर की ओर लपकीं। जानकी भी पीछे-पीछे भागी।
दरवाज़ा खुला। सामने सफेद कुर्ते-धोती में लिपटे, सिर पर साफा बांधे, सफेद घनी मूँछों वाले रघुनाथ जी खड़े थे। उम्र ने उनके शरीर को थोड़ा झुका दिया था और चेहरे पर जीवन के संघर्षों की गहरी लकीरें खिंच आई थीं, लेकिन उनकी आँखों का वात्सल्य आज भी वैसा ही अक्षुण्ण था। उनके पीछे कौशल्या का बेटा, हेमंत, दोनों हाथों में भारी झोले लिए मुस्कुराता हुआ खड़ा था।
“भैया!” कौशल्या के मुँह से केवल इतना ही निकला और वे बच्चों की तरह बिलख पड़ीं।
रघुनाथ जी ने अपनी बूढ़ी बाहें फैला दीं। कौशल्या उनके सीने से लग गईं। साठ साल की उम्र पार कर चुकी बहन आज फिर से वही सात साल की छोटी ‘लल्ली’ बन गई थी। रघुनाथ जी ने कांपते हाथों से अपनी बहन का सिर सहलाया।
“अरे पगली, रोती काहे को है? देख, तेरा भैया आ गया। जीते-जी अपनी लल्ली के आँगन में न आता, तो भगवान को क्या मुँह दिखाता?” रघुनाथ जी का स्वर भी भीग गया था।
जानकी ने आगे बढ़कर ताऊजी के चरण स्पर्श किए। रघुनाथ जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, “सदा सुहागन रहो बिटिया, दूधो नहाओ पूतो फलो। घर-आँगन को हमेशा खुशियों से भर कर रखो।”
हेमंत ने झोले ज़मीन पर रखे और हँसते हुए कहा, “माँ, अब मामा जी को भीतर तो आने दो, या सारी बातें देहरी पर ही कर लोगी?”
सबके चेहरे पर हँसी तैर गई। रघुनाथ जी को दालान में बिछी तख्तपोश पर बैठाया गया। घर का माहौल, जो कुछ देर पहले तक शांत और ठहरा हुआ था, अचानक एक उत्सव में बदल गया। रघुनाथ जी अपने साथ गाँव से बहुत कुछ लाए थे—पेड़ों से तोड़े गए ताजे आँवले, महुए का सूखा फूल, घर के गाय के दूध का बना मावा और कौशल्या की पसंद के तिल के लड्डू।
“यह सब काहे को बाँध लाए भैया? इस उम्र में इतना बोझ उठाने की क्या ज़रूरत थी?” कौशल्या ने झोले टटोलते हुए उलाहना दिया।
“अरे लल्ली, जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, तब तक अपनी बहन के लिए गाँव की माटी की खुशबू कैसे न लाऊं? जब शहर की इस सीमेंट-कंक्रीट की हवा में दम घुटने लगे, तो ये लड्डू खा लेना, अपने गाँव के खेत खलिहान याद आ जाएंगे,” रघुनाथ जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
रसोई में जाकर कौशल्या ने खुद चूल्हा संभाला। जानकी के बार-बार मना करने पर भी वे नहीं मानीं। “बहू, आज तू सिर्फ मेरी मदद कर। भैया को मेरे हाथ की बनी कढ़ी-चावल और उड़द की दाल के भरवां परांठे बहुत भाते हैं। माँ भी बिल्कुल ऐसे ही बनाती थीं।”
चूल्हे पर कढ़ी खौलने लगी। मेथी और हींग के छौंक की सुगंध जब पूरे घर में फैली, तो बाहर बैठे रघुनाथ जी की नासिका तक जा पहुँची। उन्होंने आँखें मूँद लीं।
थोड़ी देर बाद, पीतल की थालियों में भोजन परोसा गया। रघुनाथ जी तख्त पर पालथी मारकर बैठे। कौशल्या पास ही हाथ का पंखा लेकर बैठ गईं और धीरे-धीरे हवा झलने लगीं।
“अरे लल्ली, अब पंखा रख दे। अब कहाँ वो पहले जैसी उमस है,” रघुनाथ जी ने पहला निवाला मुँह में लेते हुए कहा। लेकिन निवाला हलक से नीचे उतरते ही वे ठिठक गए। उनके हाथ वहीं रुक गए।
“का भयो भैया? नमक कम है का?” कौशल्या ने घबराकर पूछा।
रघुनाथ जी ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं, उनमें आँसू छलक रहे थे। “नमक नहीं लल्ली… इसमें तो अम्मा के हाथों का वही पुराना स्वाद है। वही हींग की खुशबू, वही मट्ठे की खटास। पैंतालीस साल हो गए अम्मा को गुजरे, पर आज एक पल को लगा जैसे अम्मा ही मेरे सामने थाली परोसकर बैठी हैं।”
कौशल्या का मन भी भर आया। उन्होंने आँचल के छोर से अपनी आँखें पोंछीं। “अम्मा तो चली गईं भैया, पर उनके दिए संस्कार और उनके हाथों की रसोई की यह सीख हम बहनों के संग रह गई। जब भी चूल्हा जलाती हूँ, अम्मा की सूरत सामने आ जाती है।”
“सच कहती है तू,” रघुनाथ जी ने पानी पीते हुए कहा, “कुछ चीज़ें समय के साथ कभी पुरानी नहीं होतीं। रिश्तों की मिठास और माँ के हाथ का स्वाद… ये उम्र भर रूह में समाए रहते हैं।”
भोजन के बाद आँगन में चारपाइयाँ डाल दी गईं। रात गहराती जा रही थी। शहर के इस पुराने मोहल्ले में आकाश पर तारे साफ नज़र आ रहे थे और चाँदनी दूध की तरह आँगन में फैल गई थी। हेमंत अपनी माँ और मामा जी के पास आकर बैठ गया। जानकी सबके लिए मिट्टी के कुल्हड़ों में इलायची वाली चाय लेकर आई।
“मामा जी, गाँव अब कैसा है? जब हम छोटे थे, तब गर्मियों की छुट्टियों में आते थे। वो आम का बगीचा, वो नहर का किनारा… अब भी वैसा ही है क्या?” हेमंत ने चाय की चुस्की लेते हुए उत्सुकता से पूछा।
रघुनाथ जी ने एक गहरी और ठंडी साँस भरी। उनकी दृष्टि आकाश में दूर किसी तारे पर टिक गई।
“नहीं बेटा, अब वो गाँव नहीं रहा। सब बदल गया। ईंट-गारे के पक्के मकान तो बन गए, सड़कें भी चौड़ी हो गईं, पर लोगों के दिल सकरे हो गए। अब कोई किसी की चौखट पर बिना बुलाए नहीं बैठता। ऊ आम का बगीचा कट गया, वहाँ किसी ने राइस मिल लगा दी है। नहर भी अब सूखी पड़ी रहती है।”
“ऐसा क्यों हो गया मामा जी?” हेमंत ने हैरान होकर पूछा।
“बेटा, पहले लोगों के पास सुविधाएँ कम थीं, पर समय बहुत था। सुख-दुख साझा करने का चलन था। एक के घर शादी होती, तो पूरा गाँव अपनी बेटी मानकर विदा करता था। अब सबके पास बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं, हाथ में मोबाइल हैं, पर किसी के पास दो घड़ी बैठकर बतियाने का धीरज नहीं है। अपने-अपने स्वार्थ की दीवारें इतनी ऊँची हो गई हैं कि पड़ोस में कौन भूखा सोया, किसी को खबर नहीं होती,” रघुनाथ जी की आवाज़ में एक गहरा दर्द था।
कौशल्या चुपचाप सुन रही थीं। उन्हें याद आया कि जब वे छोटी थीं, तो पूरे गाँव में किसी के भी घर कोई विपत्ति आती, तो रघुनाथ जी सबसे पहले दौड़ते थे। पूरा मोहल्ला एक बड़े परिवार जैसा था।
जानकी ने खाली कुल्हड़ समेटते हुए धीरे से कहा, “ताऊजी, आप थक गए होंगे। सफर बहुत लंबा था, अब आराम कर लीजिए।”
“हाँ भैया, सो जाओ। सुबह इत्मीनान से बातें करेंगे,” कौशल्या ने तकिया ठीक करते हुए कहा।
रघुनाथ जी ने बहन की ओर देखा और मंद सा मुस्कुराए, “अरे लल्ली, इस उम्र में नींद कहाँ आती है? नींद तो उस बचपन में थी, जब तू मेरे कंधे पर सिर रखकर सो जाती थी और मुझे डर रहता था कि कहीं मेरी ज़रा सी हरकत से तेरी नींद न टूट जाए। अब तो बस स्मृतियों के सहारे रातें कटती हैं।”
चारपाई पर लेटे-लेते रघुनाथ जी ने आकाश की ओर हाथ उठाया। “तू जानती है लल्ली, जब मैं अकेला अपने दालान में बैठता हूँ, तो मुझे तुम सब बहुत याद आते हो। माधव शहर जाकर बस गया, अपनी गृहस्थी में व्यस्त है। कमला और विमला अपने-अपने ससुराल में नाती-पोतों वाली हो गईं। सबका अपना संसार है। कभी-कभी लगता है कि जिस बरगद की डालियों को मैंने अपने खून-पसीने से सींचा था, हवा के झोंकों ने उनके पत्तों को दूर-दूर बिखेर दिया।”
कौशल्या उठकर उनके सिरहाने बैठ गईं और भाई के सफेद बालों में उंगलियाँ फिराने लगीं।
“भैया, पत्ते चाहे हवा में कितने भी दूर उड़ जाएं, पर उनकी पहचान तो उसी जड़ से रहती है न। हम सब भले ही दूर हैं, पर आपके दिए संस्कार और आपका प्यार ही हमारी असली पूँजी है। आज मेरा हेमंत अगर अपनी पत्नी और माँ का आदर करता है, तो यह आपकी ही तो सीख है। जब भी मैं किसी मुश्किल में होती हूँ, आपकी सूरत याद कर लेती हूँ, हिम्मत अपने आप आ जाती है।”
रघुनाथ जी ने कौशल्या के हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आँखों से एक बूँद आँसू लुढ़ककर तकिए में समा गया।
“लल्ली, मुझे कभी-कभी डर लगता था कि कहीं ये नई पीढ़ी हमारे इन रिश्तों की अहमियत भूल न जाए। पर आज जब मैंने देखा कि तेरी बहू जानकी ने कितनी श्रद्धा से मेरे पैर छुए, हेमंत ने स्टेशन पर मुझे देखते ही कैसे गले लगा लिया… मेरा सारा डर काफूर हो गया। हमारे संस्कार मरे नहीं हैं, वे आज भी ज़िंदा हैं।”
हेमंत ने आगे बढ़कर अपने मामा के पैर दबाने शुरू किए। “मामा जी, हम नई पीढ़ी के लोग भले ही आधुनिक दुनिया में जीते हों, पर हम यह कभी नहीं भूल सकते कि हमारी जड़ें कहाँ हैं। आपने माँ के लिए, इस पूरे परिवार के लिए जो किया, वो हमारे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। अब हम आपको अकेला नहीं रहने देंगे। हर दो महीने में हम गाँव आएंगे और छुट्टियों में आपको यहाँ हमारे पास आकर रहना होगा।”
जानकी ने भी मुस्कुराते हुए हामी भरी, “हाँ ताऊजी, आपको हर साल महुए के लड्डू और घर का मावा लेकर खुद आना पड़ेगा। हम पार्सल से मंगवाने वाले नहीं हैं।”
यह सुनकर रघुनाथ जी खिलखिलाकर हँस पड़े। उनकी हँसी की गूँज से वह छोटा सा आँगन एक बार फिर से जीवंत हो उठा। रात की नीरवता में नीम के पत्तों की सरसराहट जैसे किसी मधुर संगीत की तरह गूँजने लगी। जो भारीपन शाम को हवा में था, वह अब पूरी तरह धुल चुका था। उसकी जगह एक असीम शांति और अपनापे की गर्माहट ने ले ली थी।
कौशल्या ने भाई के ऊपर चादर ठीक से ओढ़ा दी। रघुनाथ जी ने अपनी आँखें मूँद लीं। उनके चेहरे पर अब कोई थकान या अकेलापन नहीं था, बल्कि एक ऐसा संतोष था जो केवल अपनों के बीच ही मिल सकता है। कौशल्या वहीं पास में बैठ कर अपने भाई को निहारती रहीं। उन्हें महसूस हुआ कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, पीढ़ियाँ चाहे कितनी भी बदल जाएं, जब तक प्रेम, त्याग और सम्मान की डोर थमी हुई है, तब तक कोई भी परिवार कभी बिखर नहीं सकता।
सवेरा जब हुआ, तो आँगन में सुनहरी धूप खिल चुकी थी। चिड़ियों की चहचहाहट के बीच तुलसी के बिरवे पर जल चढ़ाती जानकी, ताज़ा चाय की केतली चढ़ाती कौशल्या और दालान में बैठकर अखबार पढ़ते हुए हेमंत को दुनियादारी की बातें सिखाते रघुनाथ जी—सब कुछ एक संपूर्ण, सुखद और जीवंत तस्वीर जैसा लग रहा था। रिश्तों की बगिया एक बार फिर से महक उठी थी।
पाठकों से संवाद:
आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जहाँ रिश्ते अक्सर व्यस्तताओं की भेंट चढ़ जाते हैं, क्या आपको भी लगता है कि हमारे बुजुर्गों द्वारा सींचे गए त्याग और निश्छल प्रेम की नींव ही हमारे परिवारों को आज भी जोड़े हुए है? अपने भाई-बहनों और परिवार के प्रति आपकी क्या भावनाएँ हैं? हमें अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं।
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