बहू को आराम क्यों नहीं…..!! – अमिता कुचया

बहू, 20 लोगों के लिए पूरियां तुम्हें ही तलनी होंगी… और हाँ, जल्दी करना! मेहमान आते ही होंगे।” मैंने ज़ोर से आवाज़ लगाई। वो अभी तीन दिन पहले ही ट्रेन से आई थी। रास्ते भर लेटी-लेटी आई थी, क्योंकि उसका अभी-अभी ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने साफ कहा था – “कम से कम एक महीना … Read more

नियति का रंग – बालेश्वर गुप्ता

“देखो मनीष, कुसुम मेरी बहू है, पर जब वह वंश बढ़ाने में सक्षम नही है, मुझे पोता नही दे सकती, मां ही नही बन सकती तो कुछ तो सोचना पड़ेगा ना। वह घर मे रहे मुझे आपत्ति नही, पर तुझे दूसरा ब्याह करना ही पड़ेगा। समझ रहा है ना तू?” मनीष की आँखों में दर्द … Read more

“कर्म का हिसाब” – प्रतिभा भारद्वाज ’प्रभा’

“अब क्या हुआ, अब क्यों रो रहे हो आप… निकाल लीजिए अपने बेटे के सभी अंग और बेच दीजिए अच्छी कीमतों पर…आप तो बहुत होशियार सर्जन हैं… कोई तकलीफ भी नहीं होगी आपको…” अपने 10 वर्षीय बेटे के शव पर विलाप करती मधु चीख-चीखकर अपने पति डॉ. मयंक से कह रही थी। वह शब्द नहीं … Read more

मुझे माफ़ कर दो – करुणा मलिक

“दीदी, चल पड़ी हो क्या?”“हाँ भाभी, ट्रेन चल पड़ी है।”“सीट तो ठीक मिल गई? बच्चों के साथ कोई परेशानी तो नहीं होगी? जीजाजी भी आ जाते तो अच्छा रहता।” “नहीं-नहीं भाभी, कोई दिक्कत नहीं। आराम से पहुँच जाएँगे… चलिए रखती हूँ। मिलने पर बात करेंगे।” “ठीक है। जल्दी से आ जाइए।” फोन रखते ही विभा … Read more

 आत्मसम्मान सर्वोपरि  –  कविता भड़ाना

सुबह से चाय के इंतजार में बैठे “रामदयाल जी” आज खुद को बेहद लाचार सा महसूस कर रहे हैं। बरामदे की वही कुर्सी, वही मेज, वही चाय का प्याला—जो कभी बिना बोले उनके सामने आ जाया करता था—आज जैसे उनसे रूठ गया हो। घड़ी की टिक-टिक तेज़ लग रही थी और समय का हर पल … Read more

माफ करने वाले का दिल बहुत बड़ा होता है – पूजा शर्मा

अभी रमन को दिल्ली आये एक महीना ही हुआ था। पिछले दो साल से रमन लन्दन में रह रहा था और दिल्ली की एक मल्टी नेशन कम्पनी में कुछ दिन पहले ही उसकी जॉइनिंग हुई थी। सब कुछ नए सिरे से शुरू करने की कोशिश थी—नई नौकरी, नया शहर, नया फ्लैट और नई दिनचर्या। उसने … Read more

“नियति क्या ना कराए” – हेमलता गुप्ता

  आज जो मैं कहानी आपको बताने जा रही हूं, वह एक ऐसी मासूम लड़की की है, जो कारावास में उम्र कैद की सजा काट रही है! जेलर के पद पर मेरी पोस्टिंग कुछ दिनों पहले महाराष्ट्र की महिला कारावास एवं पुनर्वास केंद्र में हुई थी! मेरे सेवाकाल पूर्ण होने में अभी 4 वर्ष शेष थे! … Read more

क्या अकेली माँ कन्यादान नहीं कर सकती – रश्मि प्रकाश

सुहानी बेटा देख ये साड़ियां कैसी है? कहती हुई उसकी मॉं ने चार पांच साड़ियां उसके सामने फैला दी। एक-एक साड़ी को हाथ से सहलाते हुए मां की आंखों में उम्मीद भी थी और थकान भी। शादी घर में थी, कामों की लिस्ट खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी—कभी हलवाई को फोन, कभी … Read more

ये तेरा घर ये मेरा घर – अंजना ठाकुर

मां राहुल दस दिनों के लिए काम के सिलसिले मै बाहर जा रहे है तो मैं रहने के लिए आ रही हूं—मीनू की आवाज में मायके जाने की अलग ही खुशी थी। फोन पर उसकी हँसी सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी से अपने बचपन वाले आँगन में दौड़ रही हो। कभी-कभी लड़की … Read more

अधूरा खत – एम. पी. सिंह

कुलदीप सिंह अपने गावं का जाना माना ट्रैक्टर कारीगर था ओर ठीक ठाक कमा लेता था, पर अपनी पत्नी बाला की बीमारी के कारण आर्थिक तंगी से परेशान था. कुलदीप का बेटा करतार सिंह पढ़ने में कुछ ख़ास नहीं था. 10वी तक पढ़ने के बाद अपने पिता के साथ काम करने लगा. करतार कुछ साल … Read more

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