मैली नहीं होगी रेवा: एक मासूम का संकल्प

शादी के बारह बसंत बीत जाने के बाद भी जब सुमित्रा और देवेश के घर की देहरी पर किसी नन्हे पाँव की आहट नहीं गूँजी थी, तो मोहल्ले और कुल-कुटुंब की निगाहें पथराने लगी थीं। कभी इस सिद्ध पीठ की परिक्रमा, कभी उस दरगाह की मन्नत, तो कभी नर्मदा किनारे खड़े वटवृक्ष पर बंधे धागों … Read more

ममता की तराजू

 कल्याणी देवी ने जोर-जोर से हंसते हुए कहा, “अरे जरा इधर तो देखो सब लोग! इसे देखो, यह है हमारे बड़े घर की बड़ी बहू का बायना! पुराने अखबार में लपेटकर भेजा है जैसे किसी भिखारी को दान दे रहे हों। यह पत्थर जैसे काले तिल के लड्डू और यह दो कौड़ी की सूती साड़ी! … Read more

रिश्तों की चौखट और वो थाल

सुहासिनी ने संयम से मयंक का हाथ अपने हाथों में थामते हुए कहा, “मयंक, आप दोनों भाइयों का झगड़ा व्यापार की नीतियों को लेकर है, दिलों को लेकर नहीं। व्यापार में नफे-नुकसान के गणित में आप दोनों एक-दूसरे पर चिल्लाए, कागज़ात अलग कर लिए, लेकिन इसका खामियाजा हम दोनों औरतें क्यों भुगतें? मालिनी भाभी ने … Read more

दो घरों का आंगन

 अवंतिका की बंद आंखों के कोरों से आंसू बह निकले। उसे लगा जैसे उसकी अपनी मां उसके सिरहाने बैठी हो। वही स्पर्श, वही ममता, वही बेकरारी जो केवल एक मां के सीने में अपनी औलाद के दर्द को देखकर उठती है। शाम को जब डॉक्टर आए और उन्होंने दवाइयां दीं, तब जाकर बुखार थोड़ा कम … Read more

दहलीज का आईना

समर की वह हंसी मेघना के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह चुभ गई। वह उस इंसान को अवाक होकर देख रही थी जिसे उसने अब तक बहुत सुलझा हुआ, संवेदनशील और अपने प्यार में डूबा हुआ समझा था। समर जिस आसानी से अपनी ही पत्नी की आंखों में धूल झोंक रहा था, जिस … Read more

वो दिल कहाँ से लाऊँ

मेरी माँ अस्सी साल की हो गई हैं। उनका हमारे नए वातावरण में, नए घर में कतई जी नहीं लगता। अगर उनका बस चले तो वे हमें छोड़कर वापस अपने पुराने मकान में चली जाएँ। लेकिन मजबूरी है। इस उम्र में वे अकेली कैसे रहेंगी? खाना, झाड़ू-पोंछा तो फिर भी कोई कामवाली कर भी दे, … Read more

समर्पण की धूप

 सास-ससुर भी अपनी इस समझदार बहू पर जान छिड़कते थे। वे अक्सर कहते कि अनिका हमारे घर की बेटी बनकर आई है। कुछ सालों बाद उनके घर में किलकारी गूंजी और अनिका ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने आरव रखा। अब अनिका की व्यस्तता और अधिक बढ़ गई। बच्चे का … Read more

अंश

 आलोक ने आसमान में चमकते अनगिनत तारों की ओर देखा, फिर नीचे आंगन में बैठी अपनी दोनों बेटियों को देखा जो आपस में खिलखिला रही थीं। आलोक ने गहरी सांस ली और कहा, “माधवी, बेटा केवल एक कुल का नाम चला सकता है, लेकिन अगर बेटियों को पंख और हौसला दिया जाए, तो वे पूरे … Read more

टूटे धागे, मजबूत इरादे

नौ साल एक लंबा अरसा होता है, इतना लंबा कि किसी गहरे घाव पर वक्त की चमड़ी चढ़ जाए, पर अंदर की कसक पूरी तरह कभी खत्म नहीं होती। जब अवंतिका की गाड़ी “शांति कुंज” के बड़े से लोहे के फाटक के सामने रुकी, तो उसके हाथ खुद-ब-खुद स्टीयरिंग व्हील पर कस गए। पतझड़ के … Read more

ममता की धूप और भोर की नई किरण

 आज राघव के बत्तीसवें जन्मदिन पर जब वे लड्डू बाँट रही थीं, तभी आश्रम के बाहर एक चमचमाती बड़ी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और उसमें से राघव उतरा। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आँखों में गहरा पछतावा था। आश्रम के लोगों में कानाफूसी शुरू हो गई। … Read more

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