विनीता पहले तो झिझकी, पर अंदर से उसका मन भी इस घुटन भरी जिंदगी से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलने को मचल रहा था। वह कैफे में एक कोने की मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अपूर्व ने कॉफी का ऑर्डर दिया। उसने विनीता के चेहरे को ध्यान से देखा और बहुत ही संवेदनशील लहजे में कहा, “विनीता, तुम्हारी आँखों की वो चमक कहाँ खो गई? मुझे याद है, गौरव के घर जब तुम गाती थीं, तो लगता था कि तुम्हारे पास जिंदगी जीने की एक अलग ही ऊर्जा है। आज तुम इतनी बुझी-बुझी सी क्यों लग रही हो?”
शाम के धुंधलके में जब सूरज की आखिरी किरणें बालकनी के सूखे तुलसी के पौधे पर पड़ रही थीं, तब विनीता ने हाथ में पकड़े चाय के कप को रेलिंग पर रख दिया। सामने शीशे की खिड़की पर उसका अपना अक्स उभर आया था। आँखें अंदर धँसी हुई, चेहरे पर महीन लकीरें और बालों में असमय सफेदी के अनगिनत तार। उसने अपनी उंगलियों से गालों को छुआ, जहाँ कभी खिलती हुई मुस्कान और एक अनोखा नूर हुआ करता था। आज उस चेहरे पर केवल एक थकी हुई औरत की परछाईं बाकी थी, जो अपने ही घर में एक चलती-फिरती मशीन बनकर रह गई थी।
जिंदगी के बयालीस साल कब बीत गए, इसका कोई सटीक हिसाब उसके पास नहीं था। यादें जब पीछे मुड़तीं, तो बचपन की वही घुटन भरी चारदीवारी सामने आ जाती। एक छोटे से कस्बे में तीन भाइयों के बीच पली-बढ़ी विनीता को हमेशा यही सिखाया गया था कि बेटियों की आवाज़ घर की दहलीज से बाहर नहीं जानी चाहिए। हँसो तो आहिस्ता, चलो तो नजरें नीची रखकर, और सपनें देखो ही मत, क्योंकि वो कभी अपने नहीं होते। माँ-बाबूजी के सख्त पहरे में उसने कब अपनी इच्छाओं का गला घोंटा, उसे खुद खबर न हुई।
शादी हुई तो लगा कि शायद एक नई दुनिया मिलेगी जहाँ खुली हवा में सांस लेने की आज़ादी होगी। सुमित एक सीधे-सादे, नौकरीपेशा इंसान थे। शुरुआत के कुछ महीने तो सब कुछ परियों की कहानी जैसा लगा। परिवार के लोग नई बहू को सिर-आँखों पर बिठाते थे। लेकिन वक्त बीतने के साथ ही रिश्तों के रंग बदलने लगे। विनीता स्वभाव से बेहद संकोची और सीधी थी, वह किसी को पलटकर जवाब नहीं दे पाती थी। उसकी इसी सादगी को ससुराल वालों ने उसकी कमजोरी समझ लिया। सुमित की छोटी बहनें और छोटे भाई, जो उम्र में उससे काफी छोटे थे, वे भी धीरे-धीरे विनीता की हर बात में मीन-मेख निकालने लगे। कभी खाने में नमक कम होने पर ताने, तो कभी घर के रखरखाव पर व्यंग्य। सुमित काम के सिलसिले में अक्सर देर से लौटते और घर की इन खामोश तल्खियों से अनजान ही रहते। विनीता ने भी कभी शिकायत नहीं की। उसे लगा कि चुप रहना ही अच्छे संस्कार हैं।
पर इस निरंतर मौन और सहनशीलता की कीमत उसके शरीर और मन को चुकानी पड़ी। शादी के महज कुछ सालों के भीतर ही जब कभी मायके या किसी रिश्तेदारी में जाना होता, तो परिचित लोग उसे देखकर चौंक जाते। कोई कहता, “विनीता, तुम इतनी ढल कैसे गई?” तो कोई सवालिया नजरों से देखकर बात बदल लेता। उन सवालों की चुभन विनीता के सीने में खंजर की तरह उतर जाती। वह किसी से कुछ न कहती, बस मुस्कुराकर बात टाल देती। पर अंदर ही अंदर वह घुटती रही।
एक रोज़ जब उसने अपने आपको ड्रेसिंग टेबल के बड़े आईने में निहारा, तो उसके कदम वहीं जम गए। उसने देखा कि वह बयालीस की होकर भी साठ की वृद्ध महिला जैसी नजर आ रही थी। कंधों का झुकाव, आँखों के नीचे काले घेरे और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव। कहाँ गई वो विनीता जो कभी कॉलेज के दिनों में अपने सुरीले गले से सबको मंत्रमुग्ध कर देती थी? जिसे पेंटिंग ब्रश थामकर कैनवास पर रंग बिखेरने का जुनून था?
उसी शाम उसे अपने अतीत का एक भूला-बिसरा पन्ना याद आया। जब वह सत्रह साल की थी, उसके ममेरे भाई गौरव के साथ उसका एक कॉलेज फ्रेंड घर आया था—अपूर्व। अपूर्व की गहरी, संजीदा आँखें और उसकी सादगी भरी मुस्कान विनीता के दिल में पहली नजर में ही उतर गई थी। अपूर्व ने भी जब उसे देखा था, तो दोनों के बीच एक अनकहा, पावन सा खिंचाव महसूस हुआ था। पर उस दौर में अपनी पसंद जाहिर करना किसी गुनाह से कम नहीं था। अगर घर में किसी को भनक भी लग जाती, तो तूफान खड़ा हो जाता, परिवार की इज्जत पर आंच आ जाती और उसका बाहर निकलना बंद हो जाता। इसलिए विनीता ने उस पहली मोहब्बत को अपने दिल के किसी सुदूर कोने में दफन कर दिया। फिर एक दिन बाबूजी ने सुमित का हाथ उसके हाथ में थमा दिया और वह सिर झुकाए अपनी ससुराल चली आई।
दिन, महीने और साल बीतते चले गए। बेटा आरव और बेटी रिया अब बड़े हो गए थे। दोनों शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ने लगे थे। सुमित एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर थे, जो सुबह आठ बजे निकलते और रात को नौ बजे से पहले कभी घर नहीं लौटते थे। बच्चे सुबह अपनी क्लास के लिए निकल जाते और दिनभर अपनी पढ़ाई व दोस्तों में मशगूल रहते। घर में अब पहले जैसा शोर-शराबा या काम का भारी दबाव नहीं था।
उस दोपहर जब विनीता आईने के सामने से हटी, तो उसने महसूस किया कि बच्चे अब आत्मनिर्भर हो चुके हैं, उन्हें चौबीसों घंटे उसकी जरूरत नहीं है। सुमित अपनी दुनिया में मग्न हैं। तो फिर वह क्यों अपने आप को इस बेजान दिनचर्या में खपा रही है? क्या उसकी अपनी कोई हस्ती नहीं? उसने फोन उठाया और इंटरनेट पर त्वचा की देखभाल, घरेलू उबटन और खुद को स्वस्थ रखने के आसान नुस्खे खोजने लगी।
नुस्खों की लिस्ट देखकर उसे याद आया कि घर में गुलाब जल, बादाम का तेल और मुल्तानी मिट्टी जैसी चीजें खत्म हैं। मन में अचानक एक अजीब सी उमंग जागी। उसने एक सादी सूती साड़ी पहनी, बालों को सलीके से बांधा और घर का ताला लगाकर मुख्य सड़क की ओर चल पड़ी। दोपहर ढल चुकी थी और हल्की सर्द हवा चल रही थी। वह सड़क किनारे खड़ी होकर ई-रिक्शा का इंतजार कर रही थी।
तभी एक काली मोटरसाइकिल उसके पास आकर धीमी हुई और ठीक उसके कदमों से कुछ दूरी पर रुक गई। विनीता सहम गई। आजकल के माहौल को देखते हुए किसी अजनबी का इस तरह पास आकर रुकना उसे असहज कर गया। उसने घबराकर अपनी नजरें नीची कर लीं और दो कदम पीछे हट गई। उसे लगा कि शायद कोई शोहदा है।
तभी बाइक सवार ने हेलमेट का शीशा ऊपर उठाया और बाइक स्टैंड पर लगाते हुए पूरी तरह हेलमेट उतार दिया। उसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी, आँखों पर फ्रेम वाला चश्मा और चेहरे पर वही पुरानी, जानी-पहचानी मुस्कुराहट।
“विनीता? तुम विनीता ही हो ना?” उस शख्स की आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन और अचरज था।
विनीता ने चौंककर नजर उठाई। सामने खड़े चेहरे को ध्यान से देखा, और पलभर में वक्त जैसे पच्चीस साल पीछे चला गया।
“अपूर्व?” उसके मुँह से अनायास ही निकला।
“अरे वाह! तुमने पहचान लिया। मुझे तो लगा था शायद तुम भूल गई होगी,” अपूर्व मुस्कुराया। वह आज भी बेहद फिट, शालीन और गरिमामय लग रहा था। उम्र का असर उस पर भी था, पर उसने खुद को बहुत करीने से संभाला हुआ था।
विनीता का चेहरा शर्म और संकोच से लाल हो गया। वह अपनी हथेलियाँ मलते हुए बोली, “आप… आप यहाँ कैसे?”
“अरे, मैं तो पिछले साल ही इस शहर में शिफ्ट हुआ हूँ। यहाँ एक आर्किटेक्चर फर्म संभालता हूँ। पर तुम… तुम कितनी बदल गई हो विनीता? सच कहूँ तो अगर तुम्हारी वो खास चाल न होती, तो शायद मैं भी धोखा खा जाता। सब ठीक तो है ना? कहाँ जा रही हो? चलो, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।”
“नहीं, नहीं, शुक्रिया। मैं रिक्शे से चली जाऊँगी, पास ही मार्केट जाना है,” विनीता ने हिचकिचाते हुए मना किया।
पर अपूर्व ने सहजता से कहा, “इतने बरसों बाद मिले हैं, क्या इतनी पुरानी जान-पहचान में दो मिनट की लिफ्ट भी नहीं मिल सकती? चलो बैठो, कोई अजनबी नहीं हूँ।”
विनीता का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने संकोच के साथ बाइक की पिछली सीट पर किनारा पकड़कर बैठने का फैसला किया। हवा के झोंके उसके चेहरे से टकरा रहे थे। इतने बरसों बाद किसी ने उससे इतने अपनेपन से बात की थी।
रास्ते में अपूर्व ने पूछा, “घर में सब कैसे हैं? बच्चे क्या कर रहे हैं? और तुम्हारे पति?”
चलती बाइक पर इतने सवालों के जवाब देना मुश्किल था। विनीता ने संक्षेप में कहा, “सब अच्छे हैं।”
अपूर्व ने एक शांत कैफे के बाहर बाइक रोक दी। “चलो, एक कप कॉफी पीते हैं। बहुत साल हो गए, कम से कम हालचाल तो ठीक से जान लूँ।”
विनीता पहले तो झिझकी, पर अंदर से उसका मन भी इस घुटन भरी जिंदगी से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलने को मचल रहा था। वह कैफे में एक कोने की मेज पर आमने-सामने बैठ गए। अपूर्व ने कॉफी का ऑर्डर दिया। उसने विनीता के चेहरे को ध्यान से देखा और बहुत ही संवेदनशील लहजे में कहा, “विनीता, तुम्हारी आँखों की वो चमक कहाँ खो गई? मुझे याद है, गौरव के घर जब तुम गाती थीं, तो लगता था कि तुम्हारे पास जिंदगी जीने की एक अलग ही ऊर्जा है। आज तुम इतनी बुझी-बुझी सी क्यों लग रही हो?”
अपूर्व के इन चंद लफ्जों ने विनीता के सीने पर बरसों से रखे पत्थर को जैसे हटा दिया। उसने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों, खुद की उपेक्षा और उस अकेलेपन के बारे में बताया जो भीड़ में रहकर भी उसे सालता था। अपूर्व ने बिना किसी फैसले के, एक सच्चे दोस्त की तरह उसकी पूरी बात सुनी। बातों-बातों में शाम ढल गई। अचानक विनीता ने घड़ी देखी तो चौंक गई। शाम के छह बजने वाले थे, बच्चों के लौटने का समय हो गया था।
“मुझे अब चलना होगा, देर हो गई तो सब परेशान होंगे,” विनीता घबराकर उठी।
अपूर्व ने बिल चुकाया और बाहर आकर बोला, “मैं समझता हूँ। मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूँ।”
“नहीं, प्लीज़, कॉलोनी के मोड़ पर कोई देख लेगा तो बिना वजह बातें बनेंगी। मैं यहाँ से ऑटो ले लूँगी,” विनीता ने सच्चाई बयां कर दी।
अपूर्व मुस्कुराया, उसकी आँखों में सम्मान था। उसने कहा, “मैं तुम्हारी मजबूरी समझ सकता हूँ विनीता। पर क्या हम कभी बात कर सकते हैं? अगर तुम्हें एतराज न हो, तो क्या मुझे तुम्हारा नंबर मिल सकता है? सिर्फ एक दोस्त के नाते।”
विनीता ने एक पल सोचा। इस बार उसके अंतर्मन ने कोई पाबंदी नहीं लगाई। उसने बिना हिचकिचाहट के अपना फोन नंबर दे दिया।
शुरुआत में हफ़्ते में एक आध बार मैसेज या छोटी-मोटी बात होती थी। अपूर्व जब भी बात करता, वह केवल विनीता के हालचाल और उसकी रुचियों के बारे में पूछता। उसने कभी विनीता की पारिवारिक सीमा का अतिक्रमण नहीं किया। एक दिन अपूर्व ने उससे कहा, “विनीता, बच्चे अपनी जिंदगी जिएंगे, सुमित जी अपने काम में व्यस्त हैं। तुमने पूरी जिंदगी सबको दी, अब जो वक्त बचा है, उसमें से थोड़ा सा वक्त खुद को दो। तुम गाती बहुत अच्छा थीं, तुमने रियाज़ क्यों छोड़ दिया? तुम्हारी पेंटिंग्स में जान होती थी, ब्रश क्यों रख दिया?”
अपूर्व की इन बातों ने विनीता के भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर कर रख दिया। उसे लगा कि वह किसी की पत्नी, किसी की माँ या बहू होने से पहले एक इंसान है। उसने खुद से प्यार करना शुरू किया।
उसने घर के पास ही एक क्लासिकल संगीत और रियाज़ केंद्र में शाम के एक घंटे का दाखिला ले लिया। सुबह जब सब अपने-अपने काम पर चले जाते, तो वह घर का काम निपटाकर कैनवास और रंगों के साथ बैठ जाती। उसने घर की छत पर एक छोटा सा खूबसूरत बगीचा तैयार किया। उसने अपने खान-पान पर ध्यान देना शुरू किया, सुबह की सैर और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया।
कुछ ही महीनों के भीतर विनीता का कायाकल्प होने लगा। उसके चेहरे की वो बुझी हुई उदासी गायब हो गई और उसकी जगह एक शांत, गरिमामय आत्मविश्वास ने ले ली। अब वह आईने के सामने खड़ी होती, तो उसे साठ साल की कोई बेबस औरत नहीं, बल्कि बयालीस साल की एक सुलझी हुई, खूबसूरत और आत्मनिर्भर सोच वाली महिला दिखाई देती।
एक दिन शहर की एक प्रतिष्ठित आर्ट गैलरी में स्थानीय कलाकारों की प्रदर्शनी लगी। अपूर्व के प्रोत्साहन से विनीता ने भी अपनी दो पेंटिंग्स वहाँ भेजी थीं। शाम को जब प्रदर्शनी शुरू हुई, तो विनीता की बनाई ‘उड़ान’ शीर्षक वाली पेंटिंग को खूब सराहना मिली। उस पेंटिंग में एक पिंजरे से निकलकर खुले आसमान की ओर परवाज़ भरती एक चिड़िया दिखाई गई थी।
उसी शाम विनीता ने सुमित और अपने दोनों बच्चों को भी गैलरी में बुलाया था। जब सुमित और बच्चों ने विनीता के नाम के आगे ‘प्रथम पुरस्कार’ की पट्टिका देखी, तो वे अवाक रह गए। सुमित ने अपनी पत्नी को एक नए नजरिए से देखा। उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी सिर्फ एक कुशल गृहिणी ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत कलाकार भी है। बच्चों की आँखें अपनी माँ के लिए गर्व से चमक उठीं।
भीड़ में एक तरफ खड़ा अपूर्व चुपचाप मुस्कुरा रहा था। उसने दूर से ही विनीता को हाथ जोड़कर बधाई दी। विनीता ने भी आँखों ही आँखों में उस दोस्त का आभार व्यक्त किया, जिसने उसे किसी गलत रास्ते पर ले जाने के बजाय, उसकी अपनी खोई हुई पहचान से मिला दिया था। अपूर्व उसकी जिंदगी में कोई तूफान बनकर नहीं, बल्कि उस ठंडी हवा के झोंके की तरह आया था जिसने बंद खिड़कियों को खोल दिया था।
घर लौटते हुए कार में सुमित ने पहली बार विनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, “विनीता, मुझे माफ करना। मैं काम में इतना उलझ गया कि कभी देख ही नहीं पाया कि तुम्हारे भीतर कितना बड़ा हुनर छुपा था। मुझे तुम पर गर्व है।”
विनीता ने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ रात के अंधेरे में भी शहर की बत्तियाँ जगमगा रही थीं। आज वह किसी पर निर्भर नहीं थी, न ही किसी की उपेक्षा से दुखी थी। उसने सीख लिया था कि चालीस या बयालीस की उम्र जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि अपने सपनों को नए पंख देने की एक परिपक्व शुरुआत होती है। एक औरत जब खुद का सम्मान करना सीख जाती है, तो पूरी दुनिया उसके आगे झुक जाती है।
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