स्मृतियों की दरार

तान्या ने आगे बढ़कर उर्मिला देवी के हाथ थाम लिए और बहुत कोमलता से कहा, “मां जी, यह घर आपका था, आपका है और हमेशा आपका ही रहेगा। हम तो बस इस छांव को और मजबूत करना चाहते थे ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसमें सुकून से रह सकें। अगर आपको लगता है कि इस … Read more

सात फेरों का सच

 नैना ने नज़रें चुराते हुए कहा, “नहीं दीदी… समर बहुत अच्छे हैं। वो मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। लेकिन समस्या वो नहीं, उनका परिवार है। मैं शादी के बाद अपनी तरह से जीना चाहती थी। मैं क्यों किसी के खाने-पीने, दवाइयों और तौर-तरीकों के हिसाब से अपनी ज़िंदगी ढालूं? सलोनी का हर वक्त घर में … Read more

धूप की छांव में खिलते रिश्ते

कविता मन ही मन सोचने लगी कि आज के दौर में जहां लोग छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, अपनों से शिकायतें करने लगते हैं और अकेलेपन का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं यह दोनों बुजुर्ग कितने आत्मविश्वासी और संतुष्ट हैं। वे अपनी ढलती उम्र को किसी लाचारी की तरह नहीं, बल्कि एक सुंदर उत्सव की … Read more

राख से उठी मशाल

 मुझे एक दिन एक अंधेरी हवेली से यह कहकर निकाल दिया गया था कि मैं सड़क पर भीख मांगूंगी। आज मैं इस मंच से सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अगर कोई औरत अपने आत्मसम्मान से समझौता न करने की ठान ले, तो किस्मत भी उसका रास्ता नहीं रोक सकती। मर्यादा किसी खानदान की दीवारों … Read more

पंखों को मिली अपनी ज़मीं

हरिप्रसाद जी की गर्दन शर्म से झुक गई। जिस बेटी को वे बोझ समझकर जल्द से जल्द विदा कर देना चाहते थे, आज वही पूरे समाज में उनका सिर गर्व से ऊँचा कर रही थी। उनकी आँखों में पहली बार अपनी संकीर्ण सोच का पश्चाताप और बेटियों के प्रति सम्मान के आँसू थे। उन्होंने कांपते … Read more

दहलीज के इस पार

 उस दिन भी जब ड्राइंग रूम में ननदों की विदाई की बातें हो रही थीं, सौम्या चुपचाप अपने कमरे में आई और अलमारी के सामने खड़ी हो गई। उसने दोनों ननदों के लिए बहुत सुंदर और कीमती साड़ियां खरीदकर रखी थीं। उसने सोचा था कि इस बार जब वे जाएंगी, तो वह खुद अपने हाथों … Read more

महँगे खिलौने और सूनी आँखें

 न्यायाधीश महोदय ने दोनों पक्षों के वकीलों की लंबी बहस सुनी। दोनों ही पक्ष बच्ची को अपने साथ रखने के लिए पूरी तरह सक्षम साबित हो रहे थे। दोनों के पास पैसा था, घर था और सामाजिक रुतबा था। तब न्यायाधीश महोदय ने एक गहरा विचार करते हुए कहा, “कागज़ और दौलत किसी बच्चे के … Read more

सिंदूरी उम्मीद की वापसी

अवंतिका को अपनी ओर देखते पाकर समर की आंखें झुक गईं। एक वीर सिपाही, जो दुश्मनों के सामने कभी नहीं झुका, आज अपनी पत्नी के सामने हीनभावना और अपराधबोध से गड़ गया। उसके कांपते होठों से सिर्फ इतना निकला, “अवंतिका… मैं पूरा नहीं लौट सका। मैं आधा होकर लौटा हूँ। मुझे कई महीनों तक दुश्मन … Read more

शीशमहल की दीवारें

अनुराधा ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आंखों में एक अपूर्व तेज था, “मंदोदरी विवश थी, उसने आगाह ज़रूर किया था पर रोक नहीं सकी। लेकिन मैं आज की स्त्री हूँ। मंदोदरी की लाचारी मेरे हिस्से नहीं आएगी। मुझमें असत्य को असत्य कहने और अन्याय के सामने सीना तानकर खड़े होने की पूरी हिम्मत है। … Read more

पंखों पर बंधी डोर

 फोन के उस पार प्रणय ने बेहद संयम से उत्तर दिया, “पिताजी, अवनी कोई गलत काम नहीं कर रही है। वह अपनी मेहनत, अपने हुनर और अपनी लगन से अपने पैरों पर खड़ी हो रही है। उसने परिवार के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाई, बल्कि शास्त्री नाम को एक नई प्रतिष्ठा दी है। मैं उसका … Read more

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