पूर्णता की तलाश और मन का दर्पण

“मम्मी जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, अगर आप बुरा न मानें तो,” अवनि ने बहुत आदर के साथ बात शुरू की। “जब से मेरी शादी हुई है, मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं इस घर के नियमों और आपकी प्राथमिकताओं को समझूँ। मैं आपकी उम्र और आपके तजुर्बे का दिल से सम्मान करती हूँ। लेकिन पिछले कुछ महीनों में मुझे ऐसा महसूस होने लगा है कि मैं चाहे जो भी कर लूँ, आपके लिए कभी सही नहीं हो सकता।”

सुबह की पहली किरण अभी रसोई की खिड़की पर ठीक से उतरी भी नहीं थी कि अवनि ने कुकर की सीटी की आवाज़ पर चौंक कर हाथ पीछे खींच लिया। वह गैस स्टोव के सामने पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी, उसकी नज़रें लगातार आंच पर रखी दाल के कुकर पर टिकी हुई थीं। पिछले हफ्ते ही दो बार दाल का पानी ढक्कन से बाहर आकर पूरे चूल्हे पर फैल गया था, जिसके बाद घर भर में जो बवंडर उठा था, उसकी गूँज अब भी उसके कानों में ताज़ा थी। उसने तय कर लिया था कि जब तक दो सीटियाँ नहीं आ जातीं, वह यहाँ से एक इंच भी नहीं हिलेगी, चाहे पैरों में दर्द से ऐंठन ही क्यों न होने लगे।

“अरे बहु! सुबह-सुबह रसोई के बीचों-बीच खंभे की तरह क्यों खड़ी हो? क्या झाड़ू-पोंछा अपने आप चलकर कमरे साफ़ कर देगा?”

पीछे से आई भारी और तीखी आवाज़ ने अवनि के भीतर तक सिहरन दौड़ा दी। उसने झटपट मुड़कर देखा। उसकी सास, सरोज जी, माथे पर शिकन लिए और दोनों हाथ कमर पर टिकाए दरवाज़े पर खड़ी थीं।

“जी… मम्मी जी, बस दाल में सीटी आने ही वाली है, कुकर का ढक्कन पिछले हफ्ते ख़राब हो गया था न, तो कहीं पानी बाहर न आ जाए… इसलिए देख रही थी,” अवनि ने अपनी आवाज़ में भरसक विनम्रता और थोड़ा संकोच घोलते हुए सफाई दी।

सरोज जी ने होंठ भींचते हुए अपनी गर्दन हिलाई और व्यंग्य से मुस्कुराईं, “सीटी देखने के लिए वहाँ पहरेदारी करने की ज़रूरत नहीं होती। गैस धीमी करो, ढक्कन पर थोड़ा घी लगा दिया करो, इतनी बुनियादी समझ तो होनी चाहिए। जाओ, बाहर बरामदे में कपड़े सूख रहे हैं, उन्हें तह करो और पौधों में पानी डालो। पूरा दिन रसोई में ही बिताने का इरादा है क्या?”

“जी, मम्मी जी,” अवनि ने सिर झुका लिया और धीमी गति से गैस की नॉब घुमाकर रसोई से बाहर निकल आई।

उसके पीठ पीछे सरोज जी की बड़बड़ाहट की आवाज़ साफ़ आ रही थी, “आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों को किताबों के अलावा कुछ नहीं आता। घर संभालने की न कोई तमीज़, न कोई सलीका। ज़रा सी चुस्ती-फुर्ती नहीं है इनमें!”

अवनि के क़दम भारी हो गए। वह बालकनी की ओर बढ़ी, जहाँ ताज़ी हवा चल रही थी, लेकिन उसका दम घुट रहा था। आँखों के कोरों से दो गर्म बूँदें ढुलक कर उसके गालों पर फिसल गईं। ऐसा कोई पहला दिन नहीं था। पिछले सात महीनों से, जब से उसकी शादी इस घर में हुई थी, हर दिन किसी न किसी बात पर उसकी कार्यशैली, उसके तौर-तरीकों और यहाँ तक कि उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े किए जाते रहे थे। कभी सब्ज़ी में नमक का ज़रा सा ऊपर-नीचे होना, कभी चाय की पत्ती की मात्रा, तो कभी कपड़ों को सुखाने का ढंग—हर बात पर टोकना, डांटना और फिर एक लंबा भाषण देना कि कैसे पुरानी पीढ़ी की औरतें सब कुछ संभालती थीं और आज की लड़कियाँ कितनी लापरवाह हैं।

इन रोज़-रोज़ के तानों ने अवनि के भीतर के आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया था। कभी-कभार तो वह बाथरूम के आईने के सामने खड़े होकर अपनी ही आँखों में देखती और सोचती—क्या वह वाकई इतनी बेपरवाह, नासमझ और अयोग्य है?

उसका मन अतीत की गलियों में भटक गया। वह अपने कॉलेज की टॉपर रही थी। अर्थशास्त्र में मास्टर्स करते हुए उसने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में अनगिनत ट्रॉफियां जीती थीं। वह अपने पिता की आँखों का तारा और माँ का सबसे बड़ा सहारा थी। जब भी घर में कोई बड़ा आर्थिक या पारिवारिक फैसला लेना होता, उसके पिता हमेशा कहते, “मेरी अवनि सिर्फ बेटी नहीं, इस घर की रीढ़ है। सुलझी हुई, ज़िम्मेदार और विवेकशील। जिस भी घर जाएगी, अपनी समझदारी से उसे खुशियों से महका देगी।”

पिता के वे शब्द याद आते ही अवनि का दिल भर आया। कहाँ गया वह आत्मविश्वास? कहाँ खो गई वह बेबाक और निडर अवनि? यहाँ इस घर में तो उसे एक कप चाय बनाने से पहले भी दस बार सोचना पड़ता था कि कहीं अदरक ज़्यादा तो नहीं कूट दी!

“अवनि, मेरी नीली टाई कहाँ रखी है? मुझे मीटिंग के लिए निकलना है, देर हो रही है!”

अचानक बेडरूम से उसके पति राघव की आवाज़ गूँजी। अवनि ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और तेज़ी से कमरे की ओर भागी। अलमारी के तीसरे रैक से टाई निकालकर उसने चुपचाप राघव के हाथ में थमा दी।

राघव ने टाई का नॉट बांधते हुए शीशे में अवनि का उतरा हुआ चेहरा देखा। उसकी आँखें लाल थीं और पलकें अभी भी भीगी हुई थीं।

“अरे, फिर से रोना-धोना शुरू हो गया? सुबह-सुबह क्या हो गया अब? मम्मी ने फिर कुछ कह दिया क्या?” राघव ने घड़ी बाँधते हुए बिना किसी विशेष संवेदना के पूछा।

अवनि ने नज़रें नीचे झुकाए रखीं, “नहीं, कुछ नहीं… बस आँख में कुछ चला गया था।”

“रहने दो अवनि, मैं सब समझता हूँ,” राघव ने अपने बालों में कंघी फेरते हुए कहा, “तुम मम्मी की बातों को दिल से क्यों लगा लेती हो? वो तुम्हारी भलाई के लिए ही तो टोकती हैं। उनका तजुर्बा तुमसे बहुत ज़्यादा है। वो बस यही चाहती हैं कि तुम इस घर के तौर-तरीके सीखकर एकदम परफेक्ट बन जाओ ताकि कल को कोई रिश्तेदार तुम्हारी या इस घर की कोई कमी न निकाल सके। अब इस छोटी सी बात का बतंगड़ मत बनाओ, प्लीज़। मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ, शाम को बात करते हैं। बाय!”

राघव ब्रीफकेस उठाकर बाहर निकल गया, दरवाज़ा खट से बंद हो गया।

अवनि खाली कमरे में स्तब्ध खड़ी रह गई। उसके अंदर एक चीख उठने को बेताब थी। उसका जी चाहा कि वह राघव को आवाज़ देकर रोके और पूछे—”परफेक्ट? तुम्हारी नज़र में परफेक्शन का क्या मतलब है, राघव? क्या तुम्हारी माँ हर बात में दूध की धुली हैं? क्या तुम खुद अपने हर काम में सौ प्रतिशत सही हो? क्या परफेक्शन का मतलब यह है कि इंसान सांस लेना भी किसी दूसरे के इशारे पर सीखे? हर इंसान का काम करने का अपना एक तरीका होता है, अपना एक स्वभाव होता है। अगर मैं किसी काम को अपने ढंग से करती हूँ, तो क्या इसका मतलब यह है कि मैं गलत हूँ?”

लेकिन वह कुछ न बोली। शब्द उसके हलक में ही घुट कर रह गए।

दिन भर अवनि यंत्रवत काम करती रही। कपड़ों की तह बनाई, घर साफ़ किया, दोपहर का खाना बनाया। सरोज जी ने खाने की मेज़ पर सब्ज़ी चखते ही नाक-भौं सिकोड़ी, “गरम मसाला बहुत ज़्यादा डाल दिया है, पेट खराब करने का इरादा है क्या?” अवनि ने सिर झुकाकर एक शब्द भी नहीं कहा। उसने बस चुपचाप अपनी थाली समेटी और कमरे में आ गई।

उस दोपहर जब सन्नाटा पसरा हुआ था, अवनि खिड़की के पास बैठी अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलट रही थी। उसमें उसके कॉलेज के दिनों के विचार, उसके लिखे लेख और प्रोफ़ेसरों द्वारा दी गई टिप्पणियाँ दर्ज थीं। एक पन्ने पर उसके प्रिय प्रोफ़ेसर ने लिखा था—”अवनि, तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त तुम्हारी संवेदनशीलता और तुम्हारा विवेक है। दुनिया तुम्हें अपनी सांचे में ढालने की कोशिश करेगी, लेकिन तुम कभी अपनी मौलिकता मत खोना।”

उन शब्दों ने अवनि के भीतर एक सोई हुई चिंगारी को हवा दे दी। उसने खिड़की से बाहर आसमान को देखा, जहाँ एक परिंदा आज़ादी से पंख फैलाए उड़ रहा था। उसने सोचा—अगर वह इसी तरह हर रोज़ अपनी आत्म-छवि को दूसरों के तानों के आईने में देखती रही, तो एक दिन उसका अस्तित्व पूरी तरह मिट जाएगा। घुट-घुट कर जीने, रोने और हर रोज़ खुद को कमतर आंकने से समस्या हल नहीं होने वाली थी। अगर उसे इस घर में अपनी जगह बनानी है, तो उसे अपनी आवाज़ को सही तरीके से, बिना किसी कड़वाहट के, पर दृढ़ता के साथ उठाना ही होगा।

शाम को जब राघव ऑफिस से थका-हारा लौटा, तो माहौल हर रोज़ जैसा नहीं था। अवनि ने उसके लिए चाय और उसका पसंदीदा पोहा बनाकर रखा था। सरोज जी भी टीवी देख रही थीं। चाय का कप हाथ में लेते ही राघव ने कहा, “वाह, आज चाय बहुत अच्छी बनी है।”

सरोज जी ने वहीं से आवाज़ दी, “हाँ, मैंने सुबह ही समझाया था कि अदरक और इलायची कितनी डालनी चाहिए, तब जाकर कुछ अक्ल आई है।”

अवनि उस समय चाय की ट्रे लेकर वहीं खड़ी थी। हर बार की तरह इस बार वह चुपचाप सिर झुकाकर रसोई में नहीं भागी। उसने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक शांत और सौम्य मुस्कान लाई और वहीं सोफे के पास आकर बैठ गई।

“मम्मी जी,” अवनि की आवाज़ में न तो कोई गुस्सा था, न ही कोई कंपन। उसकी आवाज़ बेहद शांत और स्पष्ट थी।

सरोज जी ने चौंक कर टीवी से नज़र हटाई और उसकी तरफ देखा, “क्या हुआ?”

राघव ने भी उत्सुकता से अवनि को देखा।

“मम्मी जी, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, अगर आप बुरा न मानें तो,” अवनि ने बहुत आदर के साथ बात शुरू की। “जब से मेरी शादी हुई है, मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ कि मैं इस घर के नियमों और आपकी प्राथमिकताओं को समझूँ। मैं आपकी उम्र और आपके तजुर्बे का दिल से सम्मान करती हूँ। लेकिन पिछले कुछ महीनों में मुझे ऐसा महसूस होने लगा है कि मैं चाहे जो भी कर लूँ, आपके लिए कभी सही नहीं हो सकता।”

सरोज जी की त्योरियां चढ़ गईं, “तो क्या मैं तुम्हें सिखाऊँ भी नहीं? टोकना बंद कर दूँ? तुम बहुएँ ज़रा सी बात पर तिल का ताड़ बना लेती हो।”

“नहीं मम्मी जी, सिखाने और निरंतर नीचा दिखाने में एक बहुत बारीक फर्क होता है,” अवनि ने बिना विचलित हुए कहा। “सीखने में प्यार और प्रोत्साहन होता है, जबकि हर बात पर अयोग्यता का अहसास कराना इंसान का हौसला तोड़ देता है। आप मुझे हर रोज़ यह एहसास कराती हैं कि मुझे कुछ नहीं आता, मैं लापरवाह हूँ। राघव भी यही कहते हैं कि आप मुझे परफेक्ट बनाना चाहती हैं। लेकिन मम्मी जी, क्या दुनिया में कोई भी इंसान पूरी तरह से परफेक्ट हो सकता है? क्या गलतियाँ इंसानों से नहीं होतीं?”

राघव ने बीच में बोलने की कोशिश की, “अवनि, तुम बात को कहाँ ले जा रही हो…”

“नहीं राघव, आज मुझे अपनी बात पूरी करने दो,” अवनि ने मुड़कर राघव की आँखों में देखा। “राघव, जब तुम ऑफिस में कोई नई ज़िम्मेदारी संभालते हो और तुमसे कोई चूक होती है, तो क्या तुम्हारा बॉस हर मिनट तुम्हें डांटता है या तुम्हें सीखने का वक्त देता है? अगर वह हर रोज़ तुम्हारी काबिलियत पर सवाल उठाए, तो क्या तुम काम कर पाओगे? नहीं न? तो फिर घर में मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों जायज़ ठहराया जाता है? क्या एक बहू सिर्फ इसलिए सब कुछ सहती रहे क्योंकि वह नई है?”

राघव अवनि के इन सीधे और तार्किक सवालों के सामने निरुत्तर हो गया। उसने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। वह हमेशा यही समझता था कि अवनि बस ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील है।

अवनि फिर सरोज जी की तरफ मुड़ी, “मम्मी जी, जब आप इस घर में नई-नई बहू बनकर आई थीं, तो क्या पहले ही दिन से हर काम में माहिर थीं? क्या आपसे कभी दूध नहीं उबला? क्या आपसे कभी दाल में नमक कम या ज़्यादा नहीं हुआ? यकीनन हुआ होगा, क्योंकि हम सब इंसान हैं, रोबोट नहीं। मुझे आपकी सीख चाहिए, आपके अनुभव का मार्गदर्शन चाहिए, लेकिन आपके तानों और तिरस्कार की कीमत पर नहीं। मुझे इस घर को अपना समझने दीजिए, लेकिन मुझे अपनी पहचान खोने पर मजबूर मत कीजिए।”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल पंखे की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

सरोज जी अवनि की आँखों में देख रही थीं। उन आँखों में कोई बदतमीज़ी या बगावत नहीं थी, बल्कि एक गहरा आत्मसम्मान, सच्चाई और थोड़ा सा दर्द था। अवनि के शब्दों ने सरोज जी के ज़हन में चालीस साल पुरानी यादों का दरवाज़ा खोल दिया। उन्हें याद आया कि जब वे ब्याह कर आई थीं, तो उनकी अपनी सास भी उन पर ऐसे ही ताने कसा करती थीं। वे घंटों रसोई में रोया करती थीं और सोचती थीं कि काश कोई उनकी बात समझे। वक्त के साथ वे खुद उस कड़वे सांचे में ढल गईं और अनजाने में वही व्यवहार अपनी बहू के साथ दोहराने लगीं, जिसे वे खुद कभी नफ़रत करती थीं।

सरोज जी का चेहरा ढीला पड़ गया। उनके पास अवनि की बातों का कोई काट नहीं था, क्योंकि हर शब्द में सच्चाई का आईना चमक रहा था।

राघव ने आगे बढ़कर अपनी माँ का हाथ पकड़ा और फिर अवनि को देखा, “मम्मी… अवनि सही कह रही है। हम दोनों ने मिलकर अनजाने में उस पर बहुत ज़्यादा दबाव बना दिया था। परफेक्शन की कोई सीमा नहीं होती, लेकिन अपनेपन की शुरुआत तो समझदारी से ही होती है।”

सरोज जी ने एक गहरी सांस ली। उन्होंने अपना हाथ अवनि के सिर पर रख दिया। उनकी आँखों में पहली बार कठोरता की जगह एक नमी थी।

“अवनि बहू…” सरोज जी की आवाज़ थोड़ी भर्राई हुई थी, “शायद तुम सही कह रही हो। उम्र और आदतों ने मुझे इतना ज़िद्दी बना दिया था कि मैं यह भूल ही गई कि प्यार से सिखाई गई बात ही दिल में उतरती है, डांट से नहीं। मुझे लगा कि मैं तुम्हें इस घर के रंग में ढाल रही हूँ, लेकिन मैं यह नहीं देख पाई कि मैं तुम्हारा रंग ही फीका कर रही थी। मुझे माफ़ कर देना बेटा।”

अवनि की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन इस बार वे बेबसी के नहीं, बल्कि सुकून और राहत के थे। उसने झुककर सरोज जी के पैर छुए। सरोज जी ने उसे गले से लगा लिया।

उस दिन के बाद से घर की हवा बदल गई। रसोई में अब तनाव की जगह हल्की-फुल्की बातचीत और हँसी ने ले ली। जब कभी दाल में सीटी आने से पहले पानी निकलता, तो सरोज जी डांटने के बजाय हँसकर कहतीं, “कोई बात नहीं, चूल्हा साफ़ हो जाएगा, तुम हाथ मत जला लेना।” अवनि ने भी अपनी पढ़ाई को दोबारा आगे बढ़ाने का फैसला किया और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी, जिसमें राघव और सरोज जी दोनों ने उसका पूरा साथ दिया।

अवनि ने समझ लिया था कि चुपचाप सहते रहना कभी समाधान नहीं होता। रिश्तों को बचाने और अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए कभी-कभी सही समय पर, सही लहजे में सच का आईना दिखाना सबसे बड़ा सकारात्मक क़दम साबित होता है।

आपकी राय हमारे लिए अनमोल है:

दोस्तों, अक्सर हमारे परिवारों में ‘बहू को परफेक्ट बनाने’ के नाम पर उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर टोका-टोकी की जाती है, जिससे उसका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है। क्या आपको लगता है कि रिश्तों में परफेक्शन से ज़्यादा ज़रूरी एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना और सम्मान देना है? क्या अवनि का अपनी बात को इस तरह शांत रहकर कहना सही था? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमसे ज़रूर साझा करें।

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