उम्र का वनवास

 नेहा स्वभाव से बुरी नहीं थी, लेकिन वह बहुत ‘प्रोफेशनल’ थी। घर की हर चीज़ अपनी जगह पर होनी चाहिए, यह उसका सख्त नियम था। दीनानाथ जी अगर गलती से सोफे पर चाय का एक कतरा भी गिरा देते, तो नेहा के माथे पर सिलवटें पड़ जाती थीं। “पापा जी, आप डाइनिंग टेबल पर ही … Read more

खोई हुई पहचान: एक अनकही दास्तान

शिखा ने मीरा का हाथ पकड़कर कहा, “मीरा, एक बात हमेशा याद रखना। अगर इंजन में ही खराबी आ जाए, तो गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। तुम इस घर का इंजन हो। तुम दिन-रात सेवा कर रही हो, यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर तुम अंदर से खुश नहीं हो, तो तुम दूसरों को … Read more

रिश्तों का आईना

सुलोचना देवी टूट कर रोने लगीं। वे लड़खड़ाते कदमों से प्रेरणा के पास गईं और उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं सोने की चमक में अंधी हो गई थी। मुझे लगा कि जो पैसे वाला है, वही सच्चा है। मैं यह भूल गई कि असली जेवर सोना-चांदी नहीं, बल्कि … Read more

एक ही आँगन की दो उड़ानें

दीनानाथ जी ने आगे कहा, “एक बात हमेशा याद रखना सावित्री, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रोहन आज अगर इतनी शांति से अपना काम कर पा रहा है, तो इसलिए क्योंकि पीछे से मीरा ने घर को एक मजबूत खंभे की तरह संभाल रखा है। अगर मीरा खुश नहीं रहेगी, तो तुम यह … Read more

रिश्तों की वसीयत

कृतिका अचानक सास को वहां देखकर हक्की-बक्की रह गई। वह लड़खड़ाती जुबान से बोली, “मां… मां जी, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं तो बस यह कह रही थी कि दीदी का फायदा हो गया। आखिर उन्होंने दो साल आपकी सेवा जो की है, उसका फल तो उन्हें मिलना ही था।” “सेवा का फल?” कावेरी … Read more

समझौते की आखिरी सीमा – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका‘

सुबह के सात बज रहे थे। रसोई में चाय की महक के साथ प्रेशर कुकर की सीटी घर के सन्नाटे को तोड़ रही थी। रिया जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार कर रही थी। सामने रखे मोबाइल पर ऑफिस से लगातार संदेश आ रहे थे। आज उसकी जिंदगी का एक बड़ा दिन था। पिछले छह महीने से जिस … Read more

तकदीर का पन्ना

मीरा अपनी बेटी का दुख समझ रही थी, लेकिन वह बेबस थी। उसने अपने आंसुओं को छिपाते हुए मीना  को गले लगाया और कहा, “नहीं बेटा, ऐसा बिल्कुल नहीं है। दादी तुमसे भी बहुत प्यार करती हैं। लेकिन सार्थक अभी बहुत छोटा है ना, इसलिए उसका ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। तुम तो मेरी समझदार … Read more

समझौता – डॉ. हिमानी बंसल

निहारिका अपने मायके में माँ-बाप की लाडली और भाई-बहनों की प्यारी थी। माता-पिता ने उसे फूलों की तरह संभालकर रखा था। उसके जीवन में दुख की छाया तक नहीं पड़ी थी। दादाजी तो उसे अपनी आँखों का तारा मानते थे। जब उसके विवाह की बात चली तो दादाजी ने रायपुर के एक बड़े और प्रतिष्ठित … Read more

अनकहे रिश्ते

देवकी जी की आँखें शून्य में ठहर गईं। जो दर्द उन्होंने सालों से अपने सीने में दबा रखा था, वह अब बाहर आने के लिए तड़प रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ बेटा, तूने मुझे फिर से जीना सिखाया है। मेरा सिद्धार्थ… वह मेरा सब कुछ था। मैं तुझे सब बताऊँगी।” कबीर … Read more

प्रतीक्षा के वो सात समंदर

 खैर, आज का दिन बहुत खास है। आज मेरी वही पोती, जो कल तक मेरे कंधों पर बैठकर बनारस के घाट घूमा करती थी, खुद चलकर इस आंगन में आ रही है। लड़कियाँ जब मायके आती हैं, तो घर की दीवारें भी जैसे मुस्कुराने लगती हैं। उनकी हंसी की खनक से पूरे घर का सन्नाटा … Read more

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