कुणाल का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने अंजलि से कहा, “अंजलि, तुम्हें हो क्या गया है? पिछले पाँच सालों में तो तुमने कभी ऐसा नहीं सोचा। आज अचानक तुम्हारे मन में यह ज़हर कहाँ से भर गया? बाबूजी और माँ ने कभी हमसे एक पैसा नहीं माँगा, भैया और भाभी ने हमेशा हमें अपने बच्चों जैसा माना है। तुम बिना बात का बतंगड़ बना रही हो और अपने ही बनाए हुए प्यार के रिश्ते पर कालिख पोत रही हो।”
चंडीगढ़ के सेक्टर-17 के इस बड़े से पैतृक आँगन में इस बार की दीवाली की रौनक ही कुछ अलग थी। छत की मुंडेरों से लेकर आँगन की तुलसी के चौबारे तक नन्हीं-नन्हीं दीपमालाएँ झिलमिला रही थीं। पूरे घर में ताज़े गेंदे के फूलों और देशी घी के पकवानों की मीठी महक रची-बसी हुई थी। घर के मुख्य द्वार पर रंगोली सजाती हुई अंजलि के चेहरे पर एक अलग ही सुकून और चमक तैर रही थी। मोरपंखी हरे और सुनहरे ज़री के बॉर्डर वाली सिल्क की साड़ी उसके गोरे रंग पर बेहद खिल रही थी।
तभी दरवाज़े पर घंटी बजी और अंजलि की कॉलेज की पुरानी सहेली शालिनी भीतर दाखिल हुई। शालिनी पास के ही एक मोहल्ले में ब्याही थी और दीवाली के पूजन के बाद अंजलि से मिलने आई थी। आँगन में खड़े परिवार के सभी लोगों को देखकर शालिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“अरे वाह अंजलि! क्या बात है! पूरा घर तो किसी शाही जलसे जैसा सज रखा है। और ज़रा देखो तो, तुम्हारे पति कुणाल, उनके बड़े भाई अमित भैया, छोटे देवर वरुण और यहाँ तक कि बाबूजी भी… सब के सब बिल्कुल एक जैसी राजसी नीली सिल्क की शेरवानी में दिख रहे हैं! ऐसा लग रहा है जैसे किसी बड़े डिज़ाइनर ने पूरे परिवार के लिए एक ही थीम पर कपड़े तैयार किए हों!” शालिनी ने आश्चर्य से अपनी भौंहें चढ़ाते हुए कहा।
अंजलि खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसके हाथ में आरती की थाली थी, जिसे उसने पास की मेज़ पर रखा और बोली, “हाँ शालिनी, ये सारी तैयारियाँ खास दीवाली के लिए ही तो हैं। सिर्फ पुरुष ही नहीं, ज़रा अंदर आकर माँजी, बड़ी भाभी नीतू और छोटी देवरानी पूजा को तो देखो! उन तीनों ने भी मेरी लाई हुई कांजीवरम और बनारसी साड़ियाँ ही पहनी हैं। हर साल जब भी मैं और कुणाल हैदराबाद से दीवाली की छुट्टियों में घर आते हैं, तो पूरे परिवार के लिए कपड़े, तोहफ़े और ज़रूरत की चीज़ें मैं वहीं से चुनकर लाती हूँ।”
शालिनी के चेहरे पर एक अजीब सी हैरानी थी। उसने कमरे में कदम रखते हुए पूछा, “हैदराबाद से? इतना सारा सामान? तुम्हें क्या ज़रूरत पड़ी है इतनी सिरदर्दी मोल लेने की? यहाँ पंजाब में क्या कपड़ों की कोई कमी है जो तुम वहाँ से इतना बोझ ढोकर लाती हो?”
अंजलि ने बड़े लाड़ और अपनेपन से शालिनी का हाथ थामा और उसे अपने कमरे में ले जाते हुए कहने लगी, “शालिनी, तुम नहीं समझोगी। बात कपड़ों की कमी की नहीं है, बात अपनेपन की है। जब भी मैं और कुणाल हैदराबाद के बड़े-बड़े बाज़ारों या मॉल्स में खरीदारी के लिए निकलते हैं, तो हमें अपने से ज़्यादा घर के बड़ों और छोटों का ख्याल रहता है। बाबूजी को किस सूती कुर्ते में आराम मिलेगा, माँजी को पूजा के लिए कौन सा हल्का रंग भाएगा, भाभी को कौन सी ज़री पसंद आएगी और पूजा को आजकल के ट्रैंड के हिसाब से क्या जँचेगा… यह सब सोचते-सोचते हम अपनी शॉपिंग भूल जाते हैं और पहले उनके लिए झोले भर लेते हैं। सच कहूँ तो मेरे पूरे परिवार को मेरी पसंद पर अटूट भरोसा है। वे आँख बंद करके मेरे लाए हुए कपड़े पहनते हैं और उनकी आँखों में जो खुशी दिखती है, उससे मेरी सारी थकान उतर जाती है।”
अंजलि बिस्तर पर बैठते हुए तकिए का सहारा लेकर मुस्कुराई, “तुम यकीन नहीं करोगी शालिनी, जब हम हैदराबाद में सबके लिए नाप और रंग पसंद करने के लिए चार-चार घंटे लगातार घूमते हैं, तो पैरों में छाले पड़ने को आ जाते हैं। एक-एक दुकान छाननी पड़ती है ताकि किसी के कपड़े में कोई खोट न रहे। घर लौटते-लौटते बदन टूट रहा होता है, लेकिन जब यहाँ आकर सबको ये कपड़े पहनकर मुस्कुराते देखती हूँ, तो लगता है कि सारी मेहनत वसूल हो गई।”
शालिनी ने कमरे का दरवाज़ा धीरे से सटा दिया और अंजलि के बिल्कुल करीब आकर बैठ गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी चुभन और होठों पर कुटिल मुस्कान थी। उसने फुसफुसाते हुए पूछा, “एक बात बताओ अंजलि, तुम पूरे ससुराल के सात-आठ लोगों के लिए इतने महंगे-महंगे ब्रांडेड कपड़े और साड़ियाँ लाती हो, लाखों रुपये खर्च कर देती हो… तो क्या ये सब तुम्हें इन चीज़ों के पैसे वापस देते हैं?”
अंजलि चौंक पड़ी। उसने सहजता से कहा, “अरे कैसी बात करती हो शालिनी! पैसे क्यों देंगे? क्या कोई अपने ही परिवार से अपनों के लिए लाए तोहफ़ों के पैसे लेता है? जब भी मैं कपड़े निकालती हूँ, बाबूजी तुरंत अपना बटुआ निकाल लेते हैं, भैया और वरुण भी कुणाल की जेब में पैसे डालने की ज़िद करते हैं, माँजी तो हाथ जोड़कर कहती हैं कि बहू इतना खर्चा मत कर, अपने पैसे ले ले। लेकिन हम कभी पैसे नहीं लेते। भला अपने ही घर वालों को दीवाली पर कुछ उपहार देना भी कोई गुनाह है क्या? क्या परिवार में भी लेन-देन का हिसाब रखा जाता है?”
शालिनी ने ज़ोर से माथा पीटा और तल्ख आवाज़ में बोली, “हाय री मेरी भोली अंजलि! तू बचपन में जितनी अक्ल की कच्ची थी, आज भी वैसी ही बुद्धू है। मुझे तो तरस आता है तेरी इस सादगी पर!”
अंजलि असहज हो गई, “मतलब? मैं समझी नहीं तुम कहना क्या चाह रही हो शालिनी?”
शालिनी ने अंजलि का हाथ पकड़कर झटके से दबाया और ज़हर बुझे लहज़े में कहा, “अंजलि, तेरी आँखों पर जो इस आदर्श बहू का चश्मा चढ़ा है न, उसे उतारकर ज़रा दुनियादारी की नज़र से देख। तेरे पूरे ससुराल वालों ने मिलकर तुझे बहुत सलीके से मूर्ख बना रखा है! तुझे क्या लगता है कि वे सचमुच तेरी पसंद की कद्र करते हैं? अरे पगली, यह सब तो मुफ्त का माल बटोरने का एक खूबसूरत बहाना है! वो सब जानते हैं कि बस इतना कह दो कि ‘अंजलि बहू, तुम्हारी पसंद तो लाजवाब है’, और तुम फूलकर कुप्पा हो जाओगी और हज़ारों-लाखों के महंगे कपड़े लाकर उनके कदमों में डाल दोगी! उन्हें पता है कि तुम एक धेला भी वापस नहीं लोगी।”
अंजलि का दिल जैसे एक पल के लिए थम सा गया। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “नहीं शालिनी, वे ऐसे लोग नहीं हैं… वे मुझे बहुत प्यार करते हैं।”
“अरे काहे का प्यार!” शालिनी ने बात काटते हुए चिढ़कर कहा, “दुनिया में कौन सा ऐसा ससुराल है जो बहू को सिर पर बिठाकर रखता है? वे सिर्फ इसलिए तेरी आरती उतारते हैं क्योंकि तू उनके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन चुकी है। हैदराबाद में तू और कुणाल दिन-रात गधे की तरह नौकरी करते हो, खून-पसीना बहाते हो, और यहाँ आकर वो सारी गाढ़ी कमाई इन पर लुटा देती हो! ज़रा सोच, अगर तू कल खाली हाथ आ जाए और कहे कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो कोई पानी का घूँट भी नहीं पूछेगा। ऐसे तो तुम दोनों पाई-पाई के मोहताज हो जाओगे। तुम्हारा अपना कोई भविष्य नहीं है क्या? कोई बच्चा होगा, उसकी परवरिश, कल को कोई बीमारी आ गई तो क्या ये जेठ-देवर तुम्हारी मदद करेंगे? देखना, एक दिन तुम सबका भला करते-करते खुद सड़क पर आ जाओगी, और तब यही लोग कहेंगे कि हमने थोड़ी कहा था कि हमारे लिए इतना सब खरीदो!”
शालिनी अपनी कड़वाहट का ज़हर घोलकर और अंजलि के मन में एक गहरा अविश्वास बोकर अपनी राह चली गई। लेकिन उसके जाने के बाद कमरे में जो सन्नाटा पसरा, वह अंजलि की छाती पर भारी पत्थर की तरह बैठ गया।
अंजलि पूरी रात करवटें बदलती रही। पंखे की घुरघुराहट के बीच शालिनी के एक-एक शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे। ‘क्या सच में सब मेरा इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या माँजी का मुझे रसोई में जाने से रोकना और कहना कि तू थक कर आई है, सिर्फ एक दिखावा है? क्या बाबूजी का यह कहना कि अंजलि के आने से घर में लक्ष्मी आती है, सिर्फ इसलिए है क्योंकि मैं कपड़े लाती हूँ?’ विचारों के इस भंवरजाल ने अंजलि के दिल को छलनी कर दिया। पिछले पाँच सालों का उसका निस्वार्थ प्रेम, उसकी भावनाएँ, उसकी मेहनत—सब कुछ उसे एक पल में खोखला और झूठा लगने लगा।
अगली सुबह जब अंजलि उठी, तो उसके चेहरे से मुस्कान गायब थी। उसने किसी से सीधे मुँह बात नहीं की। जब कुणाल कमरे में आया, तो अंजलि ने भारी मन और तनी हुई आवाज़ में उससे कहा, “कुणाल, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है। हम हर साल जो पूरे परिवार पर इतने पैसे पानी की तरह बहाते हैं, क्या तुमने कभी सोचा है कि इसका कोई अंत है भी या नहीं? हम अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा यहाँ लुटा देते हैं और बदले में हमें क्या मिलता है? सिर्फ खोखली तारीफें! मुझे लगता है कि हम दोनों को यहाँ सबने बस एक खरीदारी का साधन समझ रखा है।”
कुणाल ने हैरान होकर अंजलि को देखा, “अंजलि, यह तुम क्या कह रही हो? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? सुबह-सुबह यह कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो?”
“मैं बिल्कुल होश में हूँ कुणाल!” अंजलि की आवाज़ तेज़ हो गई, “तुम अंधे हो सकते हो, लेकिन मैं नहीं। हमारे पैसे की कोई कद्र नहीं है। सब जानते हैं कि हम पैसे नहीं लेंगे, इसलिए हर बार बड़े प्यार से फरमाइशें कर दी जाती हैं। अगली बार से मैं किसी के लिए कोई सामान नहीं लाऊँगी, जिसको जो पहनना है खुद बाज़ार जाकर खरीदे।”
कुणाल का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने अंजलि से कहा, “अंजलि, तुम्हें हो क्या गया है? पिछले पाँच सालों में तो तुमने कभी ऐसा नहीं सोचा। आज अचानक तुम्हारे मन में यह ज़हर कहाँ से भर गया? बाबूजी और माँ ने कभी हमसे एक पैसा नहीं माँगा, भैया और भाभी ने हमेशा हमें अपने बच्चों जैसा माना है। तुम बिना बात का बतंगड़ बना रही हो और अपने ही बनाए हुए प्यार के रिश्ते पर कालिख पोत रही हो।”
उस दिन पहली बार अंजलि और कुणाल के बीच ससुराल के आँगन में इतनी तीखी बहस हुई। दोनों ने एक-दूसरे से मुँह फेर लिया। घर के माहौल में एक अजीब सा तनाव फैल गया, जिसे बड़ों ने भी महसूस किया, लेकिन किसी ने कुरेदने की कोशिश नहीं की।
दीवाली और भाईदूज के त्योहार बीत गए। चार दिन पलक झपकते ही गुज़र गए और अंजलि तथा कुणाल के वापस हैदराबाद लौटने की तारीख आ पहुँची। अंजलि ने बेमन से अपने बैग पैक किए। उसका मन भीतर से बहुत भारी और बुझा-बुझा सा था। एक अपराधबोध भी था कि उसने कुणाल से इतना झगड़ा किया, लेकिन शालिनी की बातें अभी भी उसके दिल पर हावी थीं।
दुपहर के समय जब कैब आने वाली थी, तभी बाबूजी ने कमरे के बाहर से आवाज़ दी, “बेटा कुणाल, बहू अंजलि… ज़रा बाहर आँगन में तो आओ।”
अंजलि और कुणाल अपने बैग लेकर बाहर आँगन में आए। पूरा परिवार—माँजी, भैया, भाभी, वरुण और छोटी देवरानी—सब के सब एक कतार में खड़े थे और उनके चेहरों पर एक रहस्यमयी, स्नेहमयी मुस्कान थी।
बाबूजी आगे बढ़े। उनके बूढ़े, कांपते हाथों में एक लाल रंग की मखमली डिब्बी और कुछ कागज़ात थे। बाबूजी ने अंजलि के सिर पर हाथ रखा। अंजलि ने देखा कि बाबूजी की आँखें नम थीं।
बाबूजी ने अत्यंत भावुक स्वर में कहा, “बहू, जब तुम इस घर में आई थी, तो हमने सोचा था कि तुम्हें एक बेटी का प्यार देंगे। लेकिन पिछले पाँच सालों में तुमने हमें जो दिया, उसका कर्ज़ हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते। तुम जब भी उस परदेस से आती हो, कभी खाली हाथ नहीं आतीं। हमारे तन पर जो कपड़ा है, वह सिर्फ कपड़ा नहीं है बहू, वह तुम्हारा मान, तुम्हारा दुलार और तुम्हारी मेहनत की कमाई है। तुम हर बार हमारे हाथ से पैसे छीनकर अपने आँचल में बाँध लेती हो और कहती हो कि अपनों से पैसे नहीं लिए जाते।”
माँजी आगे आईं और उन्होंने अंजलि के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। माँजी के गालों पर आँसू ढुलक आए, “हाँ अंजलि बेटा, तू हर बार हमारे लिए इतना कुछ लाती है, हमारी सेहत, हमारी पसंद की इतनी फिक्र करती है, लेकिन बदले में हमें कभी कुछ करने का मौका ही नहीं देती। हम बूढ़े-बुजुर्ग और तेरे ये भाई-भाभी क्या इतने पराए हैं कि हमेशा सिर्फ तुझसे लेते ही रहें और तुझे कुछ दे न सकें? तू पैसे नहीं लेती थी, इसलिए हम सबने मिलकर एक योजना बनाई थी।”
बाबूजी ने वह मखमली डिब्बी और कागज़ात अंजलि के हाथों में थमा दिए। अंजलि ने कांपते हाथों से जब कागज़ देखे, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
वह कागज़ शहर के पॉश इलाके में एक कमर्शियल दुकान की रजिस्ट्री के थे, जो सीधे अंजलि के नाम पर करवाई गई थी! साथ ही उस डिब्बी में उस दुकान की चाबियाँ और एक सोने का कंगन था।
अमित भैया ने मुस्कुराते हुए कहा, “अंजलि, तुम हमेशा कहती थी न कि जब तुम कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़कर अपना खुद का बुटीक शुरू करोगी, तो तुम्हें शहर में एक अच्छी जगह चाहिए होगी? पिछले तीन सालों से हम सब—बाबूजी की पेंशन की बचत, मेरी और वरुण की कमाई का एक हिस्सा—सब जोड़ रहे थे ताकि अपनी इस प्यारी बहुरानी के उस सपने को सच कर सकें। यह दुकान हम पूरे परिवार की तरफ से तुम्हारे आने वाले कल के लिए एक छोटा सा तोहफ़ा है।”
वरुण हँसते हुए बोला, “भाभी, आप हमें हर साल इतने महंगे सूट और शेरवानियाँ पहनाकर राजा बाबू बना देती हैं, तो क्या हम अपनी भाभी को अपने शहर की सबसे बड़ी मालकिन नहीं बना सकते? अब आप जब भी यहाँ लौटेंगी, यह दुकान आपका इंतज़ार कर रही होगी।”
अंजलि की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसके हाथ कांप रहे थे और जुबान से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर ज़ोरदार तमाचा मार दिया हो। जिस परिवार को वह कल तक शालिनी के कहने पर ‘स्वार्थी’ और ‘मुफ्तखोर’ समझ बैठी थी, वह परिवार चुपचाप अपनी गाढ़ी कमाई जोड़कर उसके सपनों का महल खड़ा कर रहा था! उनके प्रेम का विस्तार इतना विशाल था कि अंजलि की सोच उसके सामने बिल्कुल बौनी साबित हो गई थी।
“माँजी… बाबूजी… यह सब… इसकी क्या ज़रूरत थी? यह तो बहुत ज़्यादा है… मैं इस लायक नहीं हूँ,” अंजलि फफक-फफक कर रो पड़ी और सीधे बाबूजी और माँजी के चरणों में झुक गई।
माँजी ने उसे उठाकर सीने से भींच लिया, “पागल लड़की, औलाद के लिए भी कुछ करना ज़्यादा होता है क्या? तूने हमें जो निस्वार्थ प्यार और सम्मान दिया है, उसके आगे यह ईंट-पत्थर की दुकान कुछ भी नहीं है।”
पूरे परिवार से विदा लेकर जब अंजलि और कुणाल एयरपोर्ट की ओर जाने वाली टैक्सी में बैठे, तो गाड़ी में गहरा सन्नाटा था। कुणाल ने धीरे से अंजलि की तरफ देखा और एक हल्की सी चुटकी लेते हुए कहा, “क्यों अंजलि जी, अब तो खुश हो न? तुमने तो बस कुछ कुर्ते और साड़ियाँ दी थीं, बदले में करोड़ों की दुकान और सोने का कंगन लेकर जा रही हो! अब बताओ, परिवार स्वार्थी था या तुम?”
अंजलि ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया और ज़ार-ज़ार रोने लगी। उसने कुणाल का हाथ कसकर पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से बोली, “मुझे माफ कर दो कुणाल… मुझे अपने आप पर बेहद शर्मिंदगी हो रही है। मैं उस शालिनी की ज़हरीली बातों में आ गई थी। उसने मेरे मन में ऐसा अविश्वास का बीज बो दिया था कि मैं अपने ही परिवार की पवित्रता पर शक करने लगी थी। कुणाल, अगर आज बाबूजी ने मुझे यह दुकान न भी दी होती, तब भी उनका वह निस्वार्थ स्नेह मेरे लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत था।”
अंजलि की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे। उसने आगे कहा, “मुझे आज इस बात का सबसे बड़ा मलाल है कि जब शालिनी मेरे परिवार के खिलाफ ज़हर उगल रही थी, तब मैं खामोश क्यों रही? मैंने उसी वक्त उसे करारा जवाब क्यों नहीं दिया? मैं क्यों नहीं कह पाई कि रिश्तों को बाज़ार के तराजू में नहीं तोला जाता! परिवार के लिए किया गया निस्वार्थ त्याग कभी इंसान को कंगाल नहीं करता, बल्कि उसकी झोली को ऐसे आत्मिक सुख और सम्मान से भर देता है जिसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। परिवार ही इस दुनिया की सबसे बड़ी पूँजी है कुणाल, और आज मुझे समझ आ गया कि गैरों की कड़वाहट से अपने घर की मिठास को कभी कम नहीं होने देना चाहिए।”
कुणाल ने अंजलि के आँसू पोंछते हुए प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा, “देर आए दुरुस्त आए अंजलि। इंसानी फितरत है कि कभी-कभी वह भटक जाता है, लेकिन तुमने अपनी गलती को महसूस कर लिया, यही सबसे बड़ी बात है। परिवार में कभी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जब तक मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और विश्वास की जड़ें गहरी हैं, तब तक बाहर का कोई भी झोंका उस रिश्ते के पेड़ को हिला नहीं सकता।”
टैक्सी तेज़ रफ़्तार से सड़क पर दौड़ रही थी। अंजलि ने अपनी मुट्ठी में उस नई दुकान की चाबी को कसकर थाम रखा था। अब उसके मन में कोई संशय, कोई मैल नहीं था। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि अगली बार जब वह शालिनी से मिलेगी, तो उसे यह ज़रूर सिखाएगी कि परिवार सौदों पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति किए गए बेपनाह और बेहिसाब समर्पण पर टिकता है। बाहर उगता हुआ सूरज नई उम्मीदों और अटूट पारिवारिक प्रेम की एक नई सुबह का पैगाम दे रहा था।
दोस्तों, कई बार हमारे जीवन में भी ऐसे तथाकथित ‘शुभचिंतक’ आ जाते हैं जो हमारे ही अपनों के खिलाफ हमारे कानों में ज़हर घोलने का काम करते हैं। वे हमारे निस्वार्थ प्यार को बेवकूफी और परिवार के स्नेह को स्वार्थ का नाम देने की कोशिश करते हैं। क्या आपने भी कभी किसी तीसरे इंसान की बातों में आकर अपने परिवार या जीवनसाथी पर शक किया है? और जब सच सामने आया तो आपको कैसा महसूस हुआ?
अपनी राय और अनुभव हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताएं ताकि बाकी लोग भी इससे सीख ले सकें।
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