अम्माजी की बात सुनते ही कमिश्नर साहब और सांसद महोदय ने भी खाना शुरू किया। देखते ही देखते सन्नाटा प्रशंसा के शोर में बदल गया। जो हाई-सोसायटी महिलाएं हमेशा डाइट और विदेशी व्यंजनों की बातें करती थीं, वे एक के बाद एक खस्ता पूरियां और रबड़ी-मालपुआ मांग-मांग कर खाने लगीं। श्रीमती सिंघानिया भी चुपचाप दो बार कटोरी भरवा चुकी थीं। हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा था, “सुमित्रा जी, सच बताइए, यह किस राजघराने का खानसामा है? हमें उसका नंबर चाहिए!”
भोपाल की पुरानी और पॉश कही जाने वाली अरेरा कॉलोनी के सबसे बड़े बंगले ‘आनंद विलास’ में आज सुबह से ही अजब सी हड़बड़ाहट फैली हुई थी। घर की मालकिन, श्रीमती सुमित्रा देवी अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू बार-बार कंधे पर संभालती हुई ड्राइंग रूम से लेकर लॉबी तक चक्कर काट रही थीं। उनकी आवाज़ में हुकूमत और बेचैनी दोनों घुली हुई थीं। आज शाम उनके दिवंगत पति के नाम पर चलने वाले चैरिटेबल ट्रस्ट की रजत जयंती थी। शहर के सांसद, उद्योगपति, कमिश्नर और उनके परिवारों का जमावड़ा आज इसी बंगले के विशाल प्रांगण में होने वाला था। सुमित्रा देवी के लिए यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर के संभ्रांत वर्ग में अपनी साख और नवाबी खानदानी रुतबे का सबसे बड़ा इम्तिहान था।
लॉबी के एक कोने में हल्की सूती साड़ी पहने उनकी बहू गरिमा शांत भाव से गुलदस्तों में ताजे फूल सजा रही थी। गरिमा एक छोटे से कस्बे होशंगाबाद के सीधे-सादे शिक्षक की बेटी थी। चेहरे पर भोलापन, आँखों में धैर्य और स्वभाव में ऐसी ठहराव भरी विनम्रता थी जो आजकल की भागदौड़ में कम ही दिखती है। लेकिन सुमित्रा देवी की नज़रों में यह सादगी कोई गुण नहीं, बल्कि एक भारी कमी थी। उनके इकलौते बेटे निशांत ने जब गरिमा को पसंद किया था, तब सुमित्रा देवी ने सिर्फ खानदान की इज़्ज़त के वास्ते हाँ कह दी थी, मगर दिल से वह कभी इस रिश्ते को अपना नहीं पाईं। उन्हें हमेशा लगता था कि गरिमा उनकी हाई-सोसायटी पार्टियों के लायक नहीं है; वह न तो फर्राटेदार अंग्रेज़ी में गपशप कर सकती है और न ही शहर की रईस औरतों की तरह बनावटी मुस्कान ओढ़ना जानती है।
सुमित्रा देवी गरिमा के पास आकर तीखे स्वर में बोलीं, “गरिमा, ये फूल लगाने के बाद तुम अंदर जाकर अपने कमरे में ही रहना। बाहर निकलने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं है। आज शाम जो मेहमान आ रहे हैं, वो बड़े-बड़े घरानों के लोग हैं। तुम्हारा यह संकोची स्वभाव, तुम्हारी यह देहाती चाल-ढाल और धीरे-धीरे बात करने का ढंग मेरे स्टैंडर्ड से मेल नहीं खाता। कहीं ऐसा न हो कि कोई तुमसे बात शुरू करे और तुम बगलें झांकने लगो। मुझे अपनी नाक नहीं कटवानी। निशांत तो तुम्हारे भोलेपन पर रीझ गया था, पर दुनियादारी अलग चीज़ होती है। सब कुछ मैंने देख लिया है। शहर के सबसे महंगे फाइव-स्टार होटल ‘द ग्रैंड पैलेस’ से इंटरनेशनल कुजीन और डिज़ाइनर मोमेंटोज़ ऑर्डर किए हैं। तुम बस अपनी मौजूदगी समेट कर अंदर ही रखना।”
गरिमा के सीने में एक टीस उठी। शादी के दो साल बीत जाने के बाद भी सास के दिल में वह अपने लिए ज़रा सा भी आदर नहीं कमा पाई थी। उसने हमेशा उनकी हर कड़वी बात को बड़ों का आशीर्वाद समझकर पी लिया था। गरिमा ने पलकें झुका लीं, अपने भीगते आंसुओं को होठों की हल्की सी मुस्कान में छुपाया और आहिस्ता से बोली, “जी माँजी, जैसा आप कहें। मैं अंदर ही रहूंगी।”
दोपहर ढलते ही घर के लॉन में मखमली शामियाने, जर्मन हैंगर और झूमरों की रोशनी सज गई। वेटर अपनी सफेद पोशाकों में तैयार खड़े थे। सुमित्रा देवी अपनी सहेलियों के सामने इतराते हुए फोन पर बात कर रही थीं। तभी शाम के सवा पाँच बजे उनके मोबाइल की घंटी घनघनाने लगी। स्क्रीन पर ‘ग्रैंड पैलेस होटल – जनरल मैनेजर’ चमक रहा था।
सुमित्रा देवी ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए फोन उठाया, “हाँ जी मिस्टर कपूर, गाड़ियाँ निकल गईं क्या? मेहमान छह बजे से आने शुरू हो जाएंगे।”
लेकिन दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, उसने सुमित्रा देवी के पैरों तले से ज़मीन ही खींच ली।
“मैडम, बेहद अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि बहुत बड़ा हादसा हो गया है,” मैनेजर की आवाज़ घबराई हुई थी। “हमारे सेंट्रल किचन के बेसमेंट में ट्रांसफार्मर फटने से भीषण आग लग गई है। पूरा किचन जल चुका है और हमारी कोल्ड स्टोरेज वैन भी उसी में घिर गई। आपकी पार्टी के लिए तैयार किया गया सारा खाना, ऐपेटाइज़र और डेज़र्ट जलकर खाक हो गए हैं। फायर ब्रिगेड लगी हुई है, हम चाहकर भी अगले छह घंटे तक पानी की एक बूंद तक नहीं दे सकते।”
“क्या बकवास कर रहे हो तुम?” सुमित्रा देवी की चीख निकल गई। उनका चेहरा पीला पड़ गया और हाथ कांपने लगे। “मेरी पूरी पार्टी है! कमिश्नर, सांसद, उद्योगपति… अस्सी वीआईपी मेहमान आ रहे हैं! मैं उन्हें क्या खिलाऊँगी? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगी!”
“मैम, जो कानूनी कार्रवाई करनी है कर लीजिएगा, लेकिन इस वक्त हम असहाय हैं,” कहकर मैनेजर ने फोन काट दिया।
सुमित्रा देवी का सिर चकरा गया। वह सोफे पर बदहवास होकर गिर पड़ीं। उनका पूरा बदन पसीने से भीग चुका था। निशांत अभी एयरपोर्ट गया हुआ था कुछ खास अतिथियों को रिसीव करने, उसका फोन नेटवर्क क्षेत्र से बाहर आ रहा था। शहर का कोई भी दूसरा बड़ा कैटरर महज़ पैंतालीस मिनट में अस्सी लोगों का फाइव-स्टार स्तर का खाना तैयार नहीं कर सकता था।
“हे भगवान! आज तो मेरी ज़िंदगी भर की कमाई इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी,” सुमित्रा देवी अपने दोनों हाथों से सिर पकड़कर रोने लगीं। “श्रीमती सिंघानिया तो बरसों से इसी ताक में बैठी हैं कि कब मेरा मज़ाक उड़ाएं। कल अखबारों में थू-थू होगी कि सुमित्रा देवी ने लोगों को बुलाकर भूखा लौटा दिया। खानदान की साख खाक में मिल जाएगी।”
तभी एक शांत और कोमल स्पर्श ने उनके कंधे को छुआ। सुमित्रा देवी ने सिर उठाकर देखा। सामने गरिमा पानी का गिलास लिए खड़ी थी।
“माँजी, पहले घूंट भर पानी पी लीजिए। घबराने से तबियत बिगड़ जाएगी,” गरिमा ने सहज स्वर में कहा।
सुमित्रा देवी ने झुंझलाकर उसका हाथ झटक दिया, “हटो गरिमा! तुम क्या जानो इज़्ज़त क्या होती है! आज मेरे खानदान का तमाशा बनने वाला है। शहर के सबसे बड़े रईस भूखे पेट मेरे दरवाज़े से लौटेंगे। काश मेरे पास कोई समझदार, सुलझी हुई बहू होती जो इस आफत में कुछ रास्ता निकाल पाती, तुम्हारे बस का तो कुछ है ही नहीं!”
गरिमा ने सास के इस अपमानजनक ताने का बुरा नहीं माना। संकट की घड़ी में अपनों की कड़वाहट पर ध्यान देने के बजाय समाधान खोजना उसने अपने सीधे-सादे पिता से सीखा था। उसने घड़ी देखी। पौने छह बज रहे थे। मेहमानों का पहला जत्था सवा छह तक पहुँचना शुरू होगा और खाने का समय आठ बजे के करीब होगा। उनके पास लगभग सवा दो घंटे का समय था।
गरिमा ने बहुत ही दृढ़ता और विनम्रता से कहा, “माँजी, रोने से वक्त निकल जाएगा। अगर आप मुझे इजाज़त दें और घर के तीनों पुराने नौकरों—रामू काका, लखन और तुलसी मौसी को मेरे साथ लगा दें, तो मैं कुछ कर सकती हूँ।”
सुमित्रा देवी ने लाल आँखों से अविश्वास के साथ गरिमा को घूरा, “तू? तू क्या करेगी? दाल-रोटी बनाएगी उन लोगों के लिए? वो लोग इटालियन, फ्रेंच और थाई खाना खाने के आदी हैं। तेरे हाथ का खाना देखकर वो प्लेट फेंक देंगे!”
गरिमा ने पहली बार अपनी नज़रें उठाकर सीधे सास की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा अटूट आत्मविश्वास था, जो सुमित्रा देवी ने पहले कभी नहीं देखा था।
“माँजी, बड़े होटलों का बेस्वाद, बासी सॉस वाला खाना तो वो रोज़ ही पार्टियों में खाते हैं। आज उन्हें मालवा और बुंदेलखंड की शुद्ध, शाही रिवायत का ज़ायका चखने दीजिए। हमारे पैतृक स्टोर रूम में कल ही गांव से आया बासमती चावल, शुद्ध चक्की का आटा, मथनी का देसी घी, ताज़ा खोया और जाफरान पड़ा है। बगीचे में ताज़ी सब्जियाँ हैं। आप बस मुझे रसोई सौंप दीजिए और मुझे रोकिएगा मत। अगर बात बिगड़ी तो सारी ज़िम्मेदारी मेरी, और अगर संभल गई तो इज़्ज़त आपके खानदान की।”
सुमित्रा देवी के पास कोई दूसरा चारा नहीं था। डूबते को तिनके का सहारा भी गनीमत लगता है। उन्होंने बेबसी में हाथ हिला दिया, “जा, जो करना है कर। वैसे भी आज मेरी बर्बादी तय है।”
गरिमा मुड़ी और किसी कुशल सेनापति की तरह रसोई में दाखिल हुई। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर कमर में खोंसा। अगले ही पल ‘आनंद विलास’ की विशाल रसोई एक कर्मभूमि में तब्दील हो गई। उसने रामू काका को भारी पीतल के पतीले निकालने को कहा, लखन को ताज़ा पनीर और केसर घोटने पर लगाया, और तुलसी मौसी को हरी मटर और मेवे छीलने का काम सौंपा। गरिमा ने खुद तीन बड़े चूल्हों की कमान संभाल ली।
रसोई से बाहर अब तक केवल तानों और उदासी का धुआं निकलता था, लेकिन अब वहां से शुद्ध गाय के घी में तड़कते दालचीनी, जावित्री, लौंग और बड़ी इलायची की सम्मोहक खुशबू उठने लगी। गरिमा के हाथ किसी सिद्ध कलाकार की तरह चल रहे थे। एक तरफ मखमली ग्रेवी में जाफरानी पनीर पक रहा था, तो दूसरी तरफ भुने हुए मेवों और देसी घी से लबरेज दम पुलाव की भाप महक रही थी। उसने झटपट कच्चे आम और पुदीने की चटनी सिली पर पिसवाई, अनारदाने का रायता तैयार किया और साथ ही खस्ता बेडमी पूरियों के लिए दाल की भरावन गूंथ दी। मीठे के लिए उसने ताज़ा खोया, पिस्ता और इलायची कूटकर गर्म-गर्म ‘शाही शीर-मालपुआ’ और केसरिया रबड़ी का ऐसा मेल बैठाया जिसकी खुशबू लॉबी तक तैरने लगी।
सवा सात बजे से मेहमानों की चमचमाती गाड़ियाँ लॉन में रुकने लगीं। सांसद, जज, बड़े व्यापारी और उनकी सजी-धजी पत्नियां दाखिल हुईं। सुमित्रा देवी बनावटी मुस्कान चेहरे पर चिपकाए हाथ जोड़ रही थीं, लेकिन अंदर से उनका दिल किसी सूखी पत्ती की तरह कांप रहा था। निशांत भी आ चुका था और जब उसे होटल के हादसे का पता चला, तो उसके माथे पर पसीना आ गया। वह तुरंत गरिमा की तरफ दौड़ा, लेकिन गरिमा ने मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा, “आप सब संभालिए, रसोई मुझ पर छोड़ दीजिए।”
रात के ठीक आठ बजे जब डिनर का ऐलान हुआ, तो बुफे टेबल की बजाय गरिमा ने एक अलग ही नज़ाकत पेश की। उसने चांदी की भारी थालियों में मखमली सफेद रनर बिछाकर टेबल पर शाही अंदाज़ में खाना परोसने की व्यवस्था की।
श्रीमती सिंघानिया, जो सुमित्रा देवी की सबसे बड़ी आलोचक थीं, अपनी प्लेट में खाना देखकर नाक सिकोड़ते हुए बोलीं, “अरे सुमित्रा! हमें तो लगा था कि आज तुम्हारी पार्टी में कोई विदेशी शेफ होगा। यह क्या, तुमने तो बिल्कुल पारंपरिक देसी खाना रख दिया? क्या तुम्हारी वो मशहूर फाइव-स्टार चॉइस सिर्फ दिखावा थी?”
सुमित्रा देवी का गला सूख गया। वह शर्म से नज़रें झुकाने ही वाली थीं कि तभी शहर के सबसे वरिष्ठ उद्योगपति की वयोवृद्ध माताजी, जिन्हें सब ‘अम्माजी’ कहते थे, ने पहली निवाला अपने मुंह में रखा।
अम्माजी की आँखें अचानक तृप्ति से भर आईं। उन्होंने चम्मच नीचे रखा और अपने हाथ से पूरी का एक निवाला जाफरानी पनीर और आम की चटनी के साथ तोड़ा। पूरा हॉल शांत होकर उनकी तरफ देख रहा था।
अम्माजी ने एक गहरी सांस ली और भावुक होकर बोलीं, “सुमित्रा… बरसों हो गए, सच में बरसों हो गए ऐसा दैवीय स्वाद चखे हुए! आज की इन कृत्रिम पार्टियों में प्लास्टिक जैसी चीज़ें और बासी सॉस खा-खाकर ज़बान पक चुकी थी। यह खाना किसने बनाया है? मसालों का ऐसा संतुलन, घी की ऐसी भीनी सुगंध और यह मालपुआ… ऐसा लगता है जैसे साक्षात माँ अन्नपूर्णा ने अपने हाथों से परोसा हो। इस खाने में दिखावा नहीं, आत्मा की मिठास है।”
अम्माजी की बात सुनते ही कमिश्नर साहब और सांसद महोदय ने भी खाना शुरू किया। देखते ही देखते सन्नाटा प्रशंसा के शोर में बदल गया। जो हाई-सोसायटी महिलाएं हमेशा डाइट और विदेशी व्यंजनों की बातें करती थीं, वे एक के बाद एक खस्ता पूरियां और रबड़ी-मालपुआ मांग-मांग कर खाने लगीं। श्रीमती सिंघानिया भी चुपचाप दो बार कटोरी भरवा चुकी थीं। हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा था, “सुमित्रा जी, सच बताइए, यह किस राजघराने का खानसामा है? हमें उसका नंबर चाहिए!”
सुमित्रा देवी बुत बनी खड़ी थीं। उनकी आँखों से बरसों का पर्दा जैसे एक झटके में उतर गया था। उन्होंने डाइनिंग हॉल के पर्दे की ओट में देखा, जहाँ गरिमा पसीने से भीगी, थकान से चूर, लेकिन होठों पर एक संतोषजनक मुस्कान लिए खाली बर्तनों को समेटने का निर्देश दे रही थी। जिस बहू को उन्होंने ‘गंवार’ और ‘कम दर्जे’ की समझकर छिपाने की कोशिश की थी, उसी ने आज पूरी महफ़िल में उनका सिर उस बुलंदी पर पहुँचा दिया था, जहाँ करोड़ों रुपये का कैटरर भी नहीं पहुँचा सकता था।
सुमित्रा देवी के कदम खुद-ब-खुद गरिमा की ओर बढ़ गए। उन्होंने गरिमा का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए डाइनिंग हॉल के ठीक बीचोबीच ले आईं। गरिमा झेंप गई और अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी, “माँजी, मेरे कपड़े खराब हैं, मैं मेहमानों के सामने…”
सुमित्रा देवी ने उसका हाथ और मज़बूती से थाम लिया। उन्होंने माइक उठाया। उनकी आँखों से आंसू बहकर उनके गालों पर आ गिरे थे।
सुमित्रा देवी ने भारी गले से कहा, “आप सब जिस हुनरमंद को ढूंढ रहे हैं, वो कोई बाहर का शेफ नहीं है। यह मेरी बहू है—गरिमा। आज शाम एक भयानक हादसे की वजह से मेरा सारा ऑर्डर जल गया था। मेरी झूठी शान, मेरा घमंड और मेरी साख सब राख होने की कगार पर थे। तब इस बच्ची ने, जिसे मैं अब तक अपनी बराबरी का भी नहीं समझती थी, अपनी निष्ठा और हुनर से मेरे पूरे परिवार के मान-सम्मान को अपनी हथेली पर उठा लिया। सिर्फ दो घंटे के भीतर इसने यह पूरा भोजन अपने हाथों से तैयार किया है।”
हॉल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, और फिर तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट गूंजी कि पूरा बैंक्वेट हॉल थरथरा उठा। अम्माजी ने आगे बढ़कर गरिमा के सिर पर हाथ रखा और अपने गले की मोतियों की माला उतारकर उसके गले में पहना दी।
रात के बारह बजे जब सारे मेहमान तृप्त होकर गरिमा के संस्कारों और हुनर के कसीदे पढ़ते हुए विदा हो गए, तब घर में एक गहरा सुकून पसर गया था। गरिमा रसोई में बर्तन तरतीब से लगवा रही थी। वह मन ही मन डर भी रही थी कि कहीं मेहमानों के सामने ले जाने की वजह से सास फिर नाराज़ न हों।
तभी सुमित्रा देवी ने रसोई की चौखट पर कदम रखा। उनके हाथ में लाल मखमल का एक भारी बक्सा था।
गरिमा ने घबराकर कहा, “माँजी, आप इस वक्त क्यों आईं? आपको कुछ चाहिए था तो आवाज़ दे देतीं, मैं ले आती।”
सुमित्रा देवी चुपचाप उसके सामने आकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में पश्चाताप का समंदर उमड़ रहा था। उन्होंने कांपते हाथों से वह बक्सा खोला। उसमें उनकी खानदानी नवरत्न जड़ी सोने की कंठी और पुश्तैनी कंगन चमक रहे थे, जो पीढ़ियों से परिवार की सबसे योग्य महारानी को सौंपे जाते थे।
सुमित्रा देवी ने गरिमा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुंधे हुए गले से बोलीं, “मुझे कुछ चाहिए नहीं गरिमा… आज मुझे तुझसे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भीख मांगनी है—माफ़ी की भीख।”
गरिमा स्तब्ध रह गई। उसने तुरंत हाथ पीछे खींचने की कोशिश की, “माँजी, यह आप क्या कह रही हैं? आप मेरी माँ समान हैं, आप मुझसे माफ़ी क्यों मांगेंगी?”
“नहीं गरिमा, मुझे बोलने दे,” सुमित्रा देवी के आंसू गरिमा की हथेलियों पर टपक पड़े। “मैं दौलत के नशे में अंधी हो चुकी थी। मुझे लगता था कि अंग्रेज़ी बोलना, महंगे कपड़े पहनना और दिखावे की ज़िंदगी जीना ही बड़प्पन होता है। मैं अपनी खोखली रईसी के गुमान में इतनी चूर थी कि अपने ही घर में मौजूद इस अनमोल हीरे की चमक को पहचान नहीं पाई। मैंने तुझे हर मोड़ पर ज़लील किया, तेरी सादगी को तेरी कमज़ोरी समझा, और तूने… तूने उस ज़िल्लत के बदले मेरी पगड़ी को ज़मीन पर गिरने से बचा लिया। आज अगर तू न होती, तो सुमित्रा देवी समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं बचती।”
सुमित्रा देवी ने वह पुश्तैनी कंठी और कंगन गरिमा को पहना दिए।
“माँजी, यह तो आपकी खानदानी अमानत है…” गरिमा रो पड़ी।
“और इस अमानत की असली हकदार तू ही है,” सुमित्रा देवी ने गरिमा को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। “सादगी कोई पिछड़ापन नहीं होती बहू, सादगी तो वो शुद्ध सोना है जो किसी भी भट्टी में तपकर कुंदन बन जाता है। तूने आज मेरी आँखें खोल दीं। आज से तू इस घर की सिर्फ बहू नहीं, इस घर की असली मालकिन और मेरी बेटी है। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, इस घर में कोई भी फैसला तेरी मर्ज़ी के बिना नहीं होगा।”
निशांत दरवाज़े पर खड़ा यह सब देख रहा था, उसकी आँखों में भी संतोष के आंसू थे। उस रात गरिमा को महसूस हुआ कि उसके सब्र, संस्कार और निस्वार्थ सेवा ने आख़िरकार उस दीवार को गिरा दिया था, जो बरसों से उसके और उसकी सास के बीच खड़ी थी। घर की रोटियों में जब प्रेम और सम्मान का नमक घुल जाता है, तो साधारण सी झोपड़ी भी किसी महल से ज़्यादा रोशन हो जाती है।
सच्चा बड़प्पन महँगे कपड़ों या विदेशी तौर-तरीकों में नहीं, बल्कि मन की सादगी, विपरीत परिस्थितियों में अपनों के साथ खड़े होने के जज़्बे और संस्कारों की गहराई में होता है। बाहरी तड़क-भड़क चंद पलों के लिए आँखें चौंधिया सकती है, लेकिन जो दिल को छू ले और संकट में काम आए, वही असली इंसानियत और योग्यता है।
आपको गरिमा और सुमित्रा देवी के इस रिश्ते के बदलाव की कहानी कैसी लगी? क्या आपने भी कभी अपने आस-पास सादगी और दिखावे के बीच ऐसा कोई द्वंद्व देखा है, जहाँ सादगी ने अंततः सबका दिल जीत लिया हो? अपनी अनमोल राय और विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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