“कटे पंखों की परवाज ” – राशि सिंह

“कुछ सपने हमेशा सपने ही रह जाते हैं… कभी मुकम्मल या कहिए हकीकत का जामा नहीं पहन पाते।” रोशनी ने नितारा से मुस्कराते हुए कहा, लेकिन उसकी मुस्कान हजारों आँसुओं में लिपटी हुई थी। शाम अपने पूरे शबाब पर थी। सूरज विदा होने से पहले आकाश पर अपनी आखिरी सुनहरी लकीरें खींच रहा था।

सामने फैले गुलमोहर के पेड़ से लाल फूल धीरे-धीरे झर रहे थे और हवा उन्हें आँगन में बिखेरकर जैसे किसी अधूरी कविता की पंक्तियाँ बना रही थी।

रोशनी की हथेली में चाय का कप था, मगर चाय कब की ठंडी हो चुकी थी। नितारा ने कप की ओर देखा और मुस्कराकर कहा, “तुम्हारी चाय फिर ठंडी हो गई।” रोशनी हल्का-सा हँसी और बोली, “कुछ चीजें ठंडी होने के लिए ही तो रखी होती हैं।” नितारा ने पूछा, “चाय?” रोशनी ने दूर देखते हुए कहा, “नहीं… उम्मीदें।”

नितारा के भीतर जैसे कुछ टूटकर गिरा। वह रोशनी को बचपन से जानती थी। दोनों की दोस्ती उस छोटे-से गाँव की सँकरी गलियों में पली थी, जहाँ शाम होते ही घरों की खिड़कियों से छनकर आती रोशनी और चूल्हों से उठता धुआँ मिलकर एक अजीब-सी आत्मीय खुशबू पैदा करते थे। उन दिनों रोशनी की आँखों में पूरा आकाश बसा करता था।

उसके पास सपनों की कोई कमी नहीं थी। कभी वह कहती कि वह बहुत पढ़ेगी, शहर जाएगी और अपना काम करेगी। कभी कहती कि वह अपनी माँ के लिए एक बड़ा-सा घर बनाएगी, जिसकी खिड़कियों पर सफेद परदे होंगे और आँगन में रातरानी की बेल लहराएगी।

नितारा जब उससे पूछती कि शादी कब करेगी, तो वह मुँह बनाकर कहती कि शादी तो सबसे आखिर में करेगी, क्योंकि उससे पहले उसे खुद को ढूँढ़ना है। तब नितारा उसकी बात पर हँस दिया करती थी। उसे क्या मालूम था कि एक दिन यही वाक्य रोशनी की जिंदगी का सबसे बड़ा अधूरा सवाल बन जाएगा।

रोशनी का घर गांव के आखिरी छोर पर था। कच्ची दीवारों वाला वह घर बाहर से जितना साधारण था, भीतर से उतना ही सपनों से भरा हुआ था। उसकी माँ सुमित्रा सिलाई करती थीं। दिन भर मशीन की चर्र-चर्र घर में गूँजती रहती और रोशनी उसी आवाज के बीच किताबों में अपना भविष्य तलाशती रहती। पिता बहुत पहले गुजर चुके थे। उस समय रोशनी केवल दस साल की थी। उसे पिता की बहुत-सी बातें याद नहीं थीं, बस इतना याद था कि एक बार उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा था, “मेरी बेटी बहुत आगे जाएगी।” शायद यही एक वाक्य था जिसने रोशनी को वर्षों तक थामे रखा। वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और उसकी अध्यापिकाएँ अक्सर कहतीं कि यदि वह चाहे तो शहर के किसी बड़े कॉलेज में पढ़ सकती है। रोशनी हर बार घर लौटकर माँ से कहती, “माँ, मैं शहर जाऊँगी।” सुमित्रा उसके बाल सहलाकर मुस्करा देतीं और कहतीं, “जाएगी मेरी बिटिया।”

बारहवीं के बाद रोशनी का चयन शहर के एक अच्छे कॉलेज में हो गया। उस दिन घर में जैसे दीपावली उतर आई थी। नितारा मिठाई लेकर उसके घर पहुँची और खुशी से उसे गले लगा लिया। रोशनी की आँखों में चमक थी। वह सचमुच शहर जाने वाली थी। मगर प्रवेश-पत्र पर लिखी फीस की रकम ने सुमित्रा की आँखों में चिंता भर दी। रोशनी ने वह चिंता पढ़ ली, लेकिन माँ ने उसकी ओर देखकर केवल इतना कहा, “पैसे से बड़ा सपना है क्या?” रोशनी ने माँ को गले लगा लिया और वादा किया कि वह पढ़कर नौकरी करेगी और सब कुछ लौटा देगी। सुमित्रा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मुझे कुछ लौटाना मत बेटी, बस अपने हिस्से की जिंदगी जी लेना।” उस समय रोशनी ने उस वाक्य को केवल माँ की ममता समझा था। उसका गहरा अर्थ उसे वर्षों बाद समझ में आया।

शहर जाने का दिन आया तो स्टेशन पर हल्की धुंध थी। रोशनी के पास एक छोटा-सा सूटकेस, किताबों से भरा बैग और आँखों में पूरा आसमान था। सुमित्रा बार-बार उसे समझा रही थीं कि समय पर खाना खा लेना, पैसे सोच-समझकर खर्च करना और किसी पर जल्दी भरोसा न करना। अंत में उन्होंने बस इतना कहा, “खुश रहना।” ट्रेन चली तो रोशनी खिड़की से हाथ हिलाती रही और माँ प्लेटफॉर्म पर खड़ी उसे देखती रहीं। बाद में नितारा ने बताया था कि ट्रेन के आँखों से ओझल हो जाने तक सुमित्रा वहीं खड़ी थीं। उस दिन रोशनी ने पहली बार जाना था कि सपनों की कीमत केवल पैसे नहीं होते, कुछ सपनों की कीमत घर से दूर होना भी होती है।

शहर ने रोशनी का स्वागत नहीं किया, बल्कि उसे परखा। कमरे का किराया, कॉलेज की फीस, किताबें, खाने का खर्च और सबसे ऊपर अकेलापन—सब कुछ एक साथ उसके सामने था। वह हर रात माँ को फोन करती और दिन भर की थकान, परेशानियाँ और छोटी-छोटी खुशियाँ उनसे साझा करती। जब कभी वह पूछती कि क्या वह यह सब कर पाएगी, तो सुमित्रा का एक ही जवाब होता, “तू मेरी बेटी है, कर पाएगी।” उन्हीं शब्दों के सहारे रोशनी आगे बढ़ती रही। कॉलेज के बाद वह बच्चों को पढ़ाने लगी, रात में खुद पढ़ती और कई बार अपनी जरूरतें टालकर पैसे बचाती। उसके कमरे की दीवार पर एक कागज चिपका था—“मैं हारूँगी नहीं।” हर सुबह वह उसे पढ़ती और फिर अपने दिन की शुरुआत करती।

उसी कॉलेज में उसकी मुलाकात कार्तिक से हुई। कार्तिक बहुत शांत स्वभाव का था। वह ज्यादा बोलता नहीं था, मगर जब बोलता तो उसकी बातें रोशनी के भीतर उतर जातीं। दोनों के बीच धीरे-धीरे एक ऐसा रिश्ता बनने लगा जिसका कोई नाम नहीं था। वे साथ बैठते, किताबों पर चर्चा करते, भविष्य के बारे में बातें करते और कभी-कभी बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे के पास बैठे रहते। एक दिन कार्तिक ने उससे पूछा कि यदि उसे अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जीने का अवसर मिले तो वह क्या करेगी। रोशनी ने कहा कि वह पेड़ों के बीच एक छोटा-सा घर बनाएगी, जिसमें एक कमरा किताबों का होगा और एक कमरा उसकी माँ का। कार्तिक ने पूछा कि उसका कमरा कहाँ होगा। रोशनी हँसकर बोली कि उसका कमरा सबसे छोटा होगा, क्योंकि उसे जगह से ज्यादा अपने लोग चाहिए। दोनों कुछ देर चुप रहे। शायद उसी खामोशी में उनके बीच वह सब कह दिया गया था जिसे शब्दों में कहने की हिम्मत दोनों में नहीं थी।

कॉलेज खत्म हुआ और रोशनी को एक अच्छी नौकरी मिल गई। पहली तनख्वाह हाथ में आते ही उसने सबसे पहले अपनी माँ के लिए एक लाल साड़ी खरीदी। उसे लगा कि उसकी मेहनत का पहला फल माँ के हिस्से में जाना चाहिए। नितारा ने जब उससे पूछा कि उसने अपने लिए क्या खरीदा, तो वह हँसकर बोली, “मेरे सपनों का पहला हिस्सा तो माँ हैं।” नितारा उस दिन कुछ नहीं कह सकी। उसे महसूस हुआ कि रोशनी पहले से कहीं अधिक समझदार हो चुकी थी, मगर उसकी आँखों में अब बचपन के सपनों के साथ जिम्मेदारियों की परछाइयाँ भी उतर आई थीं।

इसी बीच एक दिन माँ का फोन आया। आवाज में घबराहट थी। घर लौटने पर रोशनी को पता चला कि उसके लिए रिश्ता आया है। सुमित्रा ने पहले तो मना कर दिया था, लेकिन फिर अपनी बढ़ती उम्र और अकेलेपन की चिंता के कारण वह स्वयं भी असमंजस में थीं। रोशनी ने साफ कह दिया कि वह अभी शादी नहीं करना चाहती। वह अपने जीवन और अपने काम को लेकर बहुत कुछ करना चाहती थी। लेकिन माँ की आँखों में अपने भविष्य की चिंता देखकर वह कमजोर पड़ गई। माँ ने उससे कहा कि हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी सुरक्षित रहे। रोशनी समझती थी कि माँ उसे बाँधना नहीं चाहतीं, बल्कि अपनी तरह की जिंदगी की अनिश्चितताओं से बचाना चाहती हैं।

इसी दौरान उसने कार्तिक को फोन किया। उसके भीतर वर्षों से दबा प्रेम उस रात शब्दों में उतर आया। उसने पूछा, “कार्तिक, मुझसे शादी करोगे?” दूसरी ओर लंबी खामोशी थी। कार्तिक ने स्वीकार किया कि वह उससे शादी करना चाहता है, लेकिन उसके परिवार वाले कभी तैयार नहीं होंगे। कारण वही था जिसे दोनों जानते थे—परिवारों की सामाजिक और आर्थिक असमानता। रोशनी ने फोन रख दिया। उस रात वह बहुत देर तक छत पर बैठी रही। आकाश में चाँद था, मगर उसे पहली बार लगा कि कुछ रोशनियाँ इतनी दूर होती हैं कि उन्हें छूने की कोशिश में हाथ केवल खाली हवा पकड़ता है।

कुछ दिनों बाद रोशनी ने शादी के लिए हाँ कर दी। नितारा ने जब यह सुना तो वह दौड़ी हुई उसके पास आई। उसने पूछा कि क्या वह सचमुच खुश है। रोशनी ने मुस्कराकर कहा कि कुछ फैसले खुशी के लिए नहीं किए जाते, कभी-कभी किसी और की खुशी के लिए भी फैसले लेने पड़ते हैं। नितारा ने पूछा, “और तेरी खुशी?” रोशनी कुछ देर चुप रही और फिर बोली, “मेरी खुशी बाद में देख लेंगे।” वह जानती थी कि यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि उसकी अपनी जिंदगी को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देने की शुरुआत थी।

शादी हो गई और रोशनी दूसरे शहर चली गई। विदाई के समय उसने नितारा का हाथ पकड़कर कहा था कि यदि कभी वह भूल जाए कि वह कौन थी, तो नितारा उसे याद दिला दे। नितारा ने रोते हुए कहा था कि उसे खुद को कभी नहीं भूलना चाहिए। रोशनी ने मुस्कराकर कहा था कि वह कोशिश करेगी। मगर जिंदगी कभी-कभी इंसान को उसकी ही कही बातों के विरुद्ध खड़ा कर देती है।

शादी के बाद समीर बुरा इंसान नहीं था, लेकिन वह रोशनी को समझ नहीं पाया। वह चाहता था कि रोशनी नौकरी छोड़ दे और घर संभाले। रोशनी ने समझाने की कोशिश की कि उसने अपनी नौकरी पाने के लिए बहुत मेहनत की है और वह घर और काम दोनों संभाल सकती है। लेकिन समीर की नजर में उसका काम उतना महत्वपूर्ण नहीं था। एक दिन उसने हँसते हुए कहा, “तुम्हें बहुत बड़े सपने देखने की आदत है।” यह सुनते ही रोशनी के भीतर जैसे कोई पुराना दरवाजा खुल गया। उसे अपने कमरे की दीवार पर चिपका वह कागज याद आया—“मैं हारूँगी नहीं।” मगर उस दिन पहली बार उसे लगा कि हार केवल किसी प्रतियोगिता में नहीं होती, कभी-कभी इंसान अपनी इच्छाओं के सामने भी हार जाता है।

कुछ समय बाद माँ बीमार पड़ गईं। रोशनी सब कुछ छोड़कर उनके पास पहुँच गई। माँ बहुत कमजोर हो चुकी थीं। उन्होंने रोशनी को देखकर केवल इतना कहा, “तू आ गई।” रोशनी ने शिकायत की कि उन्होंने अपनी बीमारी के बारे में बताया क्यों नहीं। माँ ने कहा कि वह उसे परेशान नहीं करना चाहती थीं। रोशनी उनकी गोद में सिर रखकर रो पड़ी। उसने स्वीकार किया कि उसके कुछ सपने अधूरे रह गए हैं। सुमित्रा ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, “सपने कभी मरते नहीं बेटी। हर सपना पूरा होना भी जरूरी नहीं होता। कुछ सपने हमें रास्ता दिखाने आते हैं, मंजिल बनने नहीं।” माँ की यह बात रोशनी के मन में हमेशा के लिए बस गई।

कुछ ही दिनों बाद सुमित्रा चली गईं। घर वही था, आँगन वही था, सिलाई मशीन वही थी और रातरानी की खुशबू भी वही थी, लेकिन माँ नहीं थीं। रोशनी उस कमरे में देर तक बैठी रही जहाँ कभी उसकी माँ सिलाई किया करती थीं। उसने मशीन पर हाथ फेरा और उसे लगा जैसे माँ अभी कहेंगी कि अपने लिए भी कुछ खरीद लिया कर। मगर कमरे की खामोशी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उस दिन रोशनी ने जाना कि कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिन्हें समय भी नहीं भर पाता।

वर्ष बीतते गए। नितारा और रोशनी की मुलाकातें कम होती गईं। फोन पर होने वाली बातें भी धीरे-धीरे छोटी होती चली गईं। जिंदगी दोनों को अलग दिशाओं में बहा ले गई। रोशनी ने बहुत कुछ हासिल किया। उसने घर खरीदा, नौकरी में आगे बढ़ी, यात्राएँ कीं और अपने लिए एक सुंदर-सा संसार बनाया। लोगों की नजर में वह सफल थी, लेकिन रात के सन्नाटे में वह अक्सर अपनी बड़ी-सी खिड़की के पास खड़ी होकर सोचती कि क्या सफलता वही है जिसे लोग सफलता कहते हैं। उसके पास बहुत कुछ था, बस वह लड़की कहीं खो गई थी जो कभी कहा करती थी कि वह अपने सपनों की जिंदगी जिएगी।

एक दिन नितारा अचानक उसके घर पहुँची। वर्षों बाद दोनों एक-दूसरे को देखकर देर तक गले लगी रहीं। बातें करते-करते नितारा ने रोशनी की आँखों में पहले जैसी चमक न होने की बात कही। रोशनी उसे अपने घर के उस हिस्से में ले गई जहाँ रातरानी की बेल लगी थी। उसने बताया कि उसने आखिरकार पेड़ों के बीच छोटा-सा घर तो बना लिया था, मगर जिस जिंदगी के लिए उसने कभी उस घर का सपना देखा था, वह नहीं बन पाई। नितारा ने पूछा कि वह चाहती क्या है। रोशनी ने बहुत देर बाद कहा, “मैं फिर से लिखना चाहती हूँ।” नितारा ने बिना देर किए कहा, “तो लिख।” रोशनी ने उम्र, समय और बीते वर्षों का हवाला दिया, लेकिन नितारा ने कहा कि उम्र सपनों की दुश्मन कब से हो गई। उस रात रोशनी ने वर्षों बाद अपनी डायरी खोली।

पहले पन्ने पर उसने लिखा—“कुछ सपने हमेशा सपने ही रह जाते हैं…” फिर कुछ देर कलम रोककर उसने आगे लिखा—“लेकिन शायद कुछ सपनों का काम पूरा होना नहीं, हमें जीवित रखना होता है।” उस रात से उसने लिखना शुरू किया। पहली कहानी पर किसी ने खास ध्यान नहीं दिया। दूसरी भी अनदेखी रह गई। तीसरी कहानी पर किसी अजनबी का संदेश आया—“आपकी कहानी पढ़कर मुझे मेरी माँ की याद आ गई।” रोशनी उस छोटे-से संदेश को बहुत देर तक देखती रही और फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे लगा जैसे माँ ने कहीं दूर से उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।

धीरे-धीरे उसकी कहानियाँ लोगों तक पहुँचने लगीं। वह उन स्त्रियों के बारे में लिखती रही जिनके सपने घर की चौखट पर छूट जाते हैं, उन चेहरों के बारे में लिखती रही जिनकी मुस्कान के पीछे अनगिनत आँसू छिपे होते हैं और उन रिश्तों के बारे में लिखती रही जो समय के साथ अपना रूप बदल लेते हैं। उसकी हर कहानी में कहीं न कहीं वह स्वयं मौजूद थी। उसके शब्दों में उसका अपना जीवन था, उसकी अपनी पीड़ा थी और उसके भीतर बची हुई वह लड़की भी थी जिसने कभी कहा था—“मैं हारूँगी नहीं।”

कई वर्षों बाद उसकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। पुस्तक का नाम था—“अधूरे सपनों का शहर।” नितारा ने जब पुस्तक उसके हाथ में रखी तो रोशनी कुछ क्षण तक मुखपृष्ठ को देखती रही। उसके नाम के नीचे लेखिका के रूप में अपना नाम देखकर उसकी उँगलियाँ काँप उठीं। नितारा ने मुस्कराकर पूछा, “अब बता, क्या तेरे सपने पूरे हो गए?” रोशनी ने धीरे से सिर हिलाया और कहा, “नहीं, कुछ सपने अब भी अधूरे हैं।” नितारा ने आश्चर्य से पूछा, “फिर?” रोशनी की मुस्कान इस बार बिल्कुल अलग थी। उसमें शिकायत नहीं थी, कोई इंतजार नहीं था, केवल एक शांत-सी स्वीकृति थी। उसने कहा, “अब मुझे अधूरेपन से डर नहीं लगता। मैंने समझ लिया है कि हर अधूरा सपना हार नहीं होता। कभी-कभी वह हमारी कहानी का वह पन्ना होता है, जिसके बाद हम खुद को नए शब्दों में लिखना शुरू करते हैं।”

उस शाम दोनों आँगन में बैठी थीं। रातरानी की खुशबू हवा में घुल रही थी। दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं और आसमान में चाँद धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था। नितारा ने पूछा कि यदि रोशनी को जिंदगी दोबारा जीने का मौका मिले तो क्या वह सब कुछ बदल देगी। रोशनी ने बहुत देर तक सोचा और फिर सिर हिलाकर कहा, “नहीं।” उसने समझाया कि जो नहीं मिला, उसी ने उसे वह बनाया जो वह आज है। दर्द ने उसे गहराई दी, बिछड़ने ने उसे रिश्तों की कीमत समझाई और अधूरे सपनों ने उसे अपने भीतर झाँकना सिखाया। अब उसे अपने अतीत से कोई शिकायत नहीं थी।

रात गहरा चुकी थी। नितारा जाने के लिए उठी तो दरवाजे पर पलटकर उसने रोशनी से कहा कि उसकी मुस्कान अब सच में बहुत सुंदर लगती है। रोशनी हँस दी और बोली कि पहले भी तो सुंदर थी। नितारा ने कहा, “पहले उसमें बहुत सारे आँसू छिपे होते थे।” रोशनी ने आसमान की ओर देखते हुए धीरे से कहा, “अब भी हैं।” नितारा ने पूछा, “फिर फर्क क्या है?” रोशनी मुस्कराई और बोली, “पहले मैं आँसुओं से अपने सपने भिगोती थी, अब उन्हीं आँसुओं से शब्दों को सींचती हूँ।”

नितारा उसे गले लगाकर चली गई। रातरानी की खुशबू और रात की नमी के बीच रोशनी बहुत देर तक दरवाजे पर खड़ी रही। उसने महसूस किया कि जिंदगी में कुछ सपने सचमुच कभी मुकम्मल नहीं होते। कुछ प्रेम अधूरे रह जाते हैं, कुछ घर केवल कल्पनाओं में बनते हैं, कुछ रिश्ते समय की धूल में खो जाते हैं और कुछ रास्ते उस मोड़ तक पहुँचने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं जहाँ हम पहुँचना चाहते थे। मगर इसका अर्थ यह नहीं कि सपना व्यर्थ था। सपने केवल मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं होते, वे हमें चलना सिखाते हैं। वे हमारे भीतर ऐसी रोशनी जला देते हैं जो रास्ता खत्म हो जाने के बाद भी बुझती नहीं।

रोशनी ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ खोया था—माँ, प्रेम, कुछ रिश्ते, कुछ अवसर, कुछ वर्ष और बहुत सारे सपने। लेकिन अंततः उसने खुद को पा लिया था। शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी। उसने अपनी डायरी खोली और अंतिम पन्ने पर लिखा—“कुछ सपने हमेशा सपने ही रह जाते हैं, कभी मुकम्मल या कहिए हकीकत का जामा नहीं पहन पाते। मगर शायद हर सपना हकीकत बनने के लिए पैदा भी नहीं होता। कुछ सपने हमारी आँखों में इसलिए उतरते हैं कि हम जिंदगी को थोड़ा और गहराई से देख सकें। कुछ हमें प्रेम करना सिखाते हैं, कुछ इंतजार, कुछ बिछड़ना और कुछ हमें टूटकर फिर से जुड़ना सिखाते हैं। और कुछ सपने हमें खुद से मिलाने आते हैं। ऐसे सपनों को अधूरा मत कहिए। वे बस अपनी मंजिल बदल लेते हैं।”

रोशनी ने डायरी बंद की और खिड़की से बाहर देखा। सुबह होने वाली थी। आकाश की काली चादर पर हल्की-सी सफेदी उतर रही थी। उसने खिड़की खोल दी। ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई और रातरानी की कुछ पंखुड़ियाँ उड़कर उसके कमरे में आ गईं। रोशनी ने उन्हें अपनी हथेली पर रख लिया। उसकी आँखों में नमी थी, मगर चेहरे पर मुस्कान थी। इस बार उस मुस्कान में कोई शिकायत नहीं थी, कोई इंतजार नहीं था। केवल एक शांत-सी स्वीकृति थी।

शायद उसी क्षण उसका सबसे पुराना सपना…खुद को अपने हिस्से की जिंदगी देने का सपना…आखिरकार मुकम्मल हो गया था।

राशि सिंह

मुरादाबाद उत्तर प्रदेश

(मौलिक कहानी )

error: Content is protected !!