शुभी के भीतर कुछ सुलग उठा।आज फिर वही हुआ जो वह नहीं चाहती थी।
एक ही घर में दो बहुएँ थीं—बड़ी और छोटी।
बड़ी बहू शांता घर के काम में बहुत सलीकेदार थी। खाना स्वादिष्ट बनाती, घर को करीने से रखती और मेहमानों का स्वागत भी पूरे मन से करती।सास गायत्री जी हर काम उसे ही सौंपती ।तारीफ करते ना थकती।
छोटी बहू शुभी भी मेहनती थी। वह किसी काम में पीछे नहीं रहती थी, लेकिन उसके मन में एक छोटी-सी गाँठ थी।
जब भी घर में बड़ी बहू की तारीफ़ होती, उसके चेहरे पर मुस्कान तो रहती, मगर मन थोड़ा बुझ जाता।उसे लगता मुझे सुनाया जा रहा है कि मैं खाना अच्छा नहीं बनाती।वह कभी शांता जीजी की तारीफ नहीं कर पाती।
“आज दाल बहुत अच्छी बनी है।”
“बहू, तुम तो मेहमानों की पसंद भी याद रखती हो।”
“तुम्हारे हाथ में सचमुच स्वाद है।”
शांता के लिए रोज कहा जाता ।हर ऐसी बात के बाद छोटी बहू मन ही मन सोचती— “मेरे बनाए खाने में कभी किसी को ऐसा स्वाद क्यों नहीं मिलता?”
उसे शांता जीजी से कोई शिकायत नहीं थी। बड़ी बहू ने कभी उसका बुरा भी नहीं किया था।
फिर भी जाने क्यों, उसकी तारीफ़ सुनते ही शुभी के भीतर तुलना शुरू हो जाती।उसे हमेशा यही लगता कि सब लोग उसे जलाने के लिए शांता की ही तारीफ करते हैं उसकी तरफ तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता।भीतर की यह जलन इतनी तीव्र हो जाती कि कभी कभी तो उसे लगता कि शांता के बनाए खाने नाश्ते में नमक मिर्च ज्यादा मिला आए!!फिर जब सब लोग खाने की बुराई करेंगे शांता की आलोचना होगी तब कितना मजा आएगा..!!
आज घर में कुछ मेहमान आने वाले थे। सुबह से ही घर में चहल-पहल थी।सासू मां गायत्री जी ने एक दिन पहले ही शांता को बुलाकर खाना नाश्ता सबकी लिस्ट जिम्मेदारी सब सौंप दी थी शुभी ने बीच में कुछ कहना भी चाहा था तो गायत्री जी ने कोई ध्यान ही नहीं दिया था बल्कि बार बार शांता को समझा रही थीं देखो बहू बहुत खास मेहमान हैं पहली बार आ रहे हैं हर चीज तुम्हीं पकाना विशेष रूप से अपनी स्पेशल वाली कढ़ी अपने हाथों से समझ गईं!!?
शांता शालीनता से जी मां जी कह सहजता से वापिस किचेन में चली गई लेकिन शुभी का जी जल गया।आज वह चाह कर भी हमेशा की तरह शांता के पीछे ना जाकर सीधे अपने कक्ष में जाकर लेट गई और मन ही मन संकल्पित हो गई कि कल जो भी मेहमान आए मैं कोई भी काम नहीं करने वाली ।थोड़ी देर बाद जब शांता ने आकर उसे आवाज लगाई शुभी आओ खाना बन गया है … तब भी वह जीजी मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही बोलकर आंख बंद कर पड़ी रही।
दूसरे दिन सुबह वह देर से ही उठी जब किचेन में पहुंची तो देखा शांता परात में आटा छान रही थी।उसे देखते ही शांता ने बहुत स्नेह से पूछा अरे शुभी कैसी तबियत है तुम्हारी पहले चाय पी लो रात में भी तुमने कुछ खाया नहीं था कुछ खा लो पहले।
शुभी चुपचाप उन्हें काम करते देखती रही।
शांता ने परात में आटा लगाया ही था कि अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई।उसका जी मिचलाने लगा और उल्टी हो गई। उसने बहुत चिंता से गायत्री जी से कहा “मां,आज मुझसे शायद खाना नहीं बन पाएगा।”
गायत्री जी चिंतित हो गईं तो शुभी ने तुरंत कहा— “भाभी आप आराम कीजिए, मैं बना लूँगी।”
गायत्री और शांता दोनों ने थोड़ा संकोच करते हुए पूछा— “सब कुछ?”तुम्हारी तबियत भी तो खराब है ?
शुभी मुस्कुरा दी— “नहीं अब ठीक है मैं बना लूंगी सब कुछ।”
उस दिन शुभी ने पहली बार अकेले पूरा खाना बनाया।
गायत्री जी बार बार किचेन के अंदर बाहर हो रहीं थीं परेशान सी।
सब्ज़ी, दाल, पुलाव, रायता और अंत में वही कढ़ी, जिसे बड़ी बहू बहुत अच्छा बनाती थी।
मेहमान आए। खाना परोसा गया।
खाने के बाद एक रिश्तेदार ने कहा— “वाह कढ़ी तो बहुत अच्छी बनी है।”गायत्री जी ने भी चखते हुए कहा— “हाँ, आज तो शांता जैसी ही बनी है।”
छोटी बहू शुभी के हाथ वहीं रुक गए।
कुछ पल के लिए उसके भीतर वही पुरानी टीस उठी— “फिर वही तुलना…”
लेकिन तभी बड़ी बहू, शांता जो पास ही बैठी थी, मुस्कुराकर बोली—
“नहीं माँ, आज कढ़ी मेरी जैसी नहीं है… आज तो छोटी ने बनाई है। और सच कहूँ, मुझसे भी अच्छी बनी है छोटी के हाथ का स्वाद ही अलग है।
शुभी ने उसकी ओर देखा।
शांता ने आगे कहा— “मैं तो बस अपनी कढ़ी की तारीफ़ सुनती रही हूँ, आज पता चला कि छोटी इतनी अच्छी कढ़ी बनाती है।”
गायत्री जी ने भी हंसकर समर्थन किया हां शुभी ।
छोटी कुछ नहीं बोल पाई।
उस शाम पहली बार उसे लगा कि शायद अब तक वह गलत जगह देख रही थी।बड़ी बहू उसकी तारीफ़ पाकर उससे बड़ी नहीं हो रही थी।
और उसकी तारीफ़ होने से छोटी छोटी नहीं हो रही थी।
अगले दिन सुबह दोनों रसोई में थीं।
शांता ने रोटी बेलते हुए पूछा— “कल वाली कढ़ी कैसे बनाई थी?”
शुभी हँसते हुए बोली— “क्यों? आपको सीखनी है?”
“हाँ, बिल्कुल।”
छोटी ने हँसकर कहा— “तो फिर पहले आप मुझे अपनी नरम रोटी बनाना सिखाइए।”
दोनों हँस पड़ीं।कुछ देर बाद छोटी ने पहली बार खुद आगे बढ़कर कहा—“जीजी,आपकी रोटी सच में बहुत अच्छी बनती है।”
बड़ी बहू ने मुस्कुराकर जवाब दिया—“और तुम्हारी कढ़ी।”
और बस शुभी के दिल की टीस और जलन भाप बन कर उड़ गई।
बस, इतना ही था।न कोई बड़ी सीख, न कोई बड़ा बदलाव।सिर्फ एक सच्ची तारीफ़।
लेकिन उस दिन से घर में तुलना थोड़ी कम और तारीफ़ थोड़ी ज्यादा होने लगी।और शायद रिश्तों को भी इतना ही चाहिए होता है—
किसी की अच्छाई देखकर मन में यह न आए कि
‘यह मुझसे बेहतर क्यों है?’बल्कि मन सहज होकर कह सके—“अच्छा है… यह भी तो हमारे घर की ही खूबसूरती है।”क्योंकि दूसरे की तारीफ़ करने से हमारी कीमत कम नहीं होती,बल्कि रिश्ते थोड़े और कीमती हो जाते हैं।
— लतिका
जलन#साप्ताहिक शब्द कहानी