वह मुझसे बेहतर क्यों..? – लतिका श्रीवास्तव

शुभी के भीतर कुछ सुलग उठा।आज फिर वही हुआ जो वह नहीं चाहती थी। एक ही घर में दो बहुएँ थीं—बड़ी और छोटी। बड़ी बहू शांता घर के काम में बहुत सलीकेदार थी। खाना स्वादिष्ट बनाती, घर को करीने से रखती और मेहमानों का स्वागत भी पूरे मन से करती।सास गायत्री जी हर काम उसे … Read more

जलन – दीपा माथुर

आंटी ,कैसी है आप? बालकनी से एक नन्ही आवाज सुनकर मै चौक गई। आप? मै तो यहां नई नई आई हु ना? आप मुझसे बात करेंगी? हा,क्यों नहीं उसकी बात का जवाब देते देते तुलसी की क्यारी में पानी डालने लगी। आंटी देखिये मैने इस क्यूब के सारे कलर मैजिक से एक जगह कर लिए” … Read more

जलन – मंजू ओमर

बेटा शिवम एक गिलास पानी दे दे बेटा, अच्छा माँ लाता हूँ। ये लो माँ पानी,,  लगता है आज आपकी तबियत बहुत खराब है, ऐसा करता हूँ आज मै आफिस से छुट्टी ले लेता हूँ। मेरे पीछे आपको कौन देखेगा, यदि आपको कुछ चाहिए तो कौन देगा। नहीं बेटा तू अपने काम का नुकसान न … Read more

“फर्स्ट रैंक”- श्वेता अग्रवाल

छवि जैसे ही स्कूल के लिए निकलने लगी, उसकी माँ ने उसे रोकते हुए कहा, “छवि टिफिन तो लेकर जा। इतनी बड़ी हो गई लेकिन ध्यान ही नहीं रहता।” ये सुनकर छवि हँसते हुए उनके गले में झूल गई, “मम्मा, ध्यान मुझे नहीं बल्कि आपको नहीं रहता।” “क्या मतलब?” “मतलब ये भाग्यवान कि तुम भूल … Read more

जलन – खुशी

निशा और सिया दो चचेरी-तहेरी बहनें थीं। दोनों बचपन से ही साथ पली-बढ़ी थीं, लेकिन दोनों के स्वभाव और गुणों में बहुत अंतर था। निशा साँवली-सलोनी, समझदार, मेहनती और गुणी लड़की थी। पढ़ाई में वह बहुत तेज थी और हमेशा अच्छे अंक प्राप्त करती थी। घर के कामों में उसकी बहुत अधिक रुचि नहीं थी, … Read more

जेठानी – निभा राजीव “निर्वी”

जैसे ही नववधू अंकिता ने मीनल के पैर छुए उसने पुलकित होकर उसे खींचकर हृदय से लगा लिया। वह बेहद प्रसन्न थी आज! और होती भी क्यों नहीं, नववधू के पदार्पण के साथ ही उसे जेठानी की पदवी जो प्राप्त हो गई थी। उसने मुंह दिखाई में सुंदर से कान के बुंदे देवरानी के हाथों … Read more

जलनखोर – गीता वाधवानी

” आज चलो ना अविनाश मम्मी पापा से मिलने” श्रुति ने प्यार से मनुहार करते हुए अविनाश से कहा।   अविनाश-” आज नहीं, कल आऊंगा और वो भी अपने मम्मी पापा को साथ लेकर कल ठीक रहेगा क्योंकि कल रविवार है। ”   श्रुति-” सच्ची, सच कह रहे हो ना तुम? ”   अविनाश-” हां बाबा बिल्कुल सच्ची, … Read more

ये न कहना – डॉ. कविता विकास

काम रोज़ की तरह चल रहे थे लेकिन मन में उत्साह नहीं था। मेहमानों से भरे – पूरे घर में भी एक ख़ालीपन धर गया था। मैं भिंडी काट रही थी कि लगा कोई पीछे से कह रहा है,”फिर आज इतनी देर लगा दी,सब्ज़ी बनी नहीं अभी तक,मैं क्या खा कर जाऊँगी?कॉलेज का समय हो … Read more

भारी मन (अर्चना सिंह)

कीर्ति भारी मन से अपनी पड़ोसन नैना के घर से लौट आई। घर आकर ना जाने क्यों आज कीर्ति के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था और बहुत बोझिल सी स्थिति हो रही थी। इसका कारण खुद कीर्ति भी नहीं समझ पा रही थी। अचानक पौधों को बालकनी में लहराते देख कीर्ति को याद आया.. … Read more

जलन – सुदर्शन सचदेवा

जलन किसी एक रिश्ते की जागीर नहीं होती। वह कभी सहेली बनकर आती है, कभी रिश्तेदार बनकर, कभी पड़ोसी बनकर और कभी-कभी तो अपने ही मन में चुपचाप बैठ जाती है। सीमा और रमा बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ कॉलेज गईं और शादी के बाद भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में … Read more

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