बोए बीज बबूल के

शालिनी के पास इस मासूम लेकिन तीर की तरह चुभते हुए सच का कोई जवाब नहीं था। वह पत्थर की मूरत बनकर खड़ी रही। तभी नीरज, जो अब तक चुपचाप यह सारा तमाशा देख रहा था, आगे आया। उसने रोती हुई निधि  को अपनी गोद में उठाया, उसे चुप कराया और फिर शालिनी की तरफ … Read more

इंसानियत का स्पर्श

 सुहासिनी देवी ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर स्वर में बोलीं, “राधिका, तुम्हें याद है सुबह तुमने शांति के साथ कैसा बर्ताव किया था? तुमने कहा था ना कि वह एक नौकरानी है, अनपढ़ है, उसे कोई तमीज नहीं है। उसने तुम्हारे बिखरे कमरे को समेटने की ही तो कोशिश … Read more

हैसियत का आईना

 वसुंधरा देवी ने एक व्यंग्यात्मक और दर्प पूर्ण हंसी हंसते हुए कहा, “अरे रश्मि, तुम भी कैसी बात करती हो! इन लोगों का स्टैंडर्ड काजू कतली और पिस्ते वाला थोड़े ही है। इन्हें ये महंगी चीजें पचती भी नहीं हैं। इनके लिए तो ये बाजार की मीठी सोनपापड़ी ही बहुत है। आखिर हमें क्लास का … Read more

जश्न के पीछे का सन्नाटा

 लेकिन तभी हॉल के मुख्य दरवाज़े पर एक अजीब सा शोर हुआ। दरबान किसी को अंदर आने से रोक रहे थे, और वह व्यक्ति ज़ोर-ज़ोर से गालियां बक रहा था। “अरे हटो… मेरा बेटा है वो… मुझे रोकोगे तुम? मैं बाप हूँ उसका, आईएएस का बाप!” आवाज़ सुनकर सुमेधा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। … Read more

स्वाभिमान का नया सवेरा

 सुमेधा सुबह विकास के उठने से पहले ही घर से निकल जाती और दोपहर तक वापस आ जाती। विकास को लगता कि वह बच्चों को स्कूल छोड़ने या किसी सहेली के घर जाती है। लेकिन एक दिन, नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। विकास अपने एक पुराने दोस्त से नौकरी के सिलसिले … Read more

एक कठोर हृदय का पश्चाताप

 कांता बुआ ने पल्लवी के सिर पर हाथ फेरा और गहरी सांस लेते हुए बोलीं, “पल्लवी बिटिया, मैं पिछले दस दिनों से इस घर का तमाशा देख रही हूँ। तू दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती है। मेरी बहन सुमित्रा की हर जायज-नाजायज मांग पूरी करती है। फिर भी उसके मुंह से तेरे … Read more

कलाई की खनक

“अरे… सुनते हो!” “हाँ-हाँ, क्यों नहीं सुनूँगा? कोई इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। माना कि घुटनों में थोड़ा दर्द रहता है और अखबार पढ़ने के लिए चश्मे की जरूरत पड़ती है, पर मेरी जान… कान मेरे अभी भी सोलह साल वाले लड़के जैसे तेज हैं। बोलो, क्या हुक्म है सरकार का?” रमा देवी अपनी … Read more

अनकहा इश्क़

शादी के बाद सिद्धार्थ ने अपनी ज़िम्मेदारियाँ तो पूरी कीं, लेकिन वह अपना दिल अनुराधा को कभी नहीं दे पाया। उसने अनुराधा के साथ एक समझौता सा कर लिया था। उसे लगता था कि वह काव्या के सपनों को अनुराधा पर थोप कर अपनी कसक मिटा रहा है। काव्या का सपना था कि उसका पति … Read more

अपनी माटी, अपना आंगन

 कौशल्या जी ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और अनिरुद्ध के कंधे के ऊपर से देखा। सामने उनकी बहू क्लारा खड़ी थी। लेकिन यह वो क्लारा नहीं थी जिसकी कल्पना कौशल्या जी ने की थी। क्लारा ने एक बहुत ही सुंदर सूती सलवार-कमीज़ पहनी हुई थी। उसके सुनहरे बालों पर लाल रंग का दुपट्टा बहुत ही … Read more

खामोश चीख

 “किस मिट्टी की बनी हुई हो तुम शिखा?” अविनाश की आवाज अब शांत थी, लेकिन यह उस तूफान के बाद की शांति थी जो सब कुछ तबाह कर चुकी थी। “इतने सालों से मैं तुम्हें बर्दाश्त कर रहा हूं। तुम्हारी हर महत्वाकांक्षा, तुम्हारी हर आज़ादी का मैंने जश्न मनाया है। मैंने तुम्हारी हर जिद, हर … Read more

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