मायके की दहलीज

“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको … Read more

वक्त का पहिया

 पार्वती ने यह सुनकर एक पल के लिए आसमान की तरफ देखा और सुकून से मुस्कुराती हुई बोली, “ईश्वर की माया भी कितनी अजीब है न! जो अपनी रफ्तार और मशीन पर इतना इतरा रहा था, वो आज पैदल हो गया। और हम, जो सोच रहे थे कि हमारी जिंदगी अब खत्म हो गई, भगवान … Read more

अपना वजूद

सुमेधा ने सूटकेस की चेन बंद की और खड़ी हो गई। उसके सामने उसकी सास, विमला देवी, सीना ताने खड़ी थीं, जिनकी आँखों में गुस्सा और अविश्वास दोनों तैर रहे थे। पास ही सोफे पर सिर झुकाए बैठा था—निखिल। पैंतीस साल का एक हट्टा-कट्टा इंसान, जो इस वक्त किसी डरे हुए बच्चे जैसा लग रहा … Read more

पापा का घर 

“बेटा, घर तो ईंट-पत्थर का होता है। हमारा असली घर, हमारी असली जायदाद तो तू है। अगर तेरी नींव मज़बूत करने के लिए मुझे अपनी छत बेचनी भी पड़ी, तो क्या हुआ? तू खुश है, आबाद है, बस हमारी तपस्या सफल हो गई।” आर्यन ने अपने पिता के फटे हुए बनियान और माँ की सूजी … Read more

मैं भी इंसान हूँ – डॉ पारुल अग्रवाल

सावित्री जी के हाथ कांप रहे थे। फोन रखते ही उनके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आई थीं। अभी-अभी उनकी ननद, सुलोचना जी का फोन आया था कि वे अपने पूरे परिवार के साथ—बेटे, बहू और नाती-पोतों समेत—दो घंटे में पहुँच रही हैं। सावित्री जी का ब्लड प्रेशर तो वैसे ही बढ़ा रहता था, … Read more

एक पिता की मुस्कान – रश्मि प्रकाश

अंधेरे कमरे के एक कोने में बैठा समीर पिछले दो सालों से सिर्फ़ दीवारों को घूरता रहता था। घर के बाकी सदस्य दबे पाँव उसके कमरे के पास से गुज़रते। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। समीर, जो कभी पूरे घर की जान हुआ करता था, अपनी छोटी … Read more

उम्मीदों का उजला आकाश

 “पैसे कागज के टुकड़े हैं प्रज्ञा!” रघुनाथ जी की आवाज में एक गूंज थी। “वे मेहनत से दोबारा कमाए जा सकते हैं। मैंने जो मेहनत की, वह किसी जुए में नहीं लगाई थी, अपनी बेटी की काबिलियत पर लगाई थी। मुझे अपनी मेहनत पर गर्व है और तेरी लगन पर पूरा भरोसा है। तूने साल … Read more

साझी देहरी की दीवार

“साथी ऐसे होते हैं क्या बलवंत जी?” मैंने भीतर आते हुए कहा, “दो साल पहले जब इस कॉलोनी से लोग पलायन कर रहे थे, तो हम दोनों ने इसी सोफे पर बैठकर कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना आशियाना छोड़कर नहीं जाएंगे। और अगर कभी जाने की नौबत आई भी, … Read more

स्वाभिमान की कीमत

हरिशंकर जी अपनी जगह से उठे और अंकिता के सिर पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा, जब मेरे उस परिचित ने मुझे फोन पर यह बात बताई थी, तो उसने सोचा था कि मैं रिश्ता तोड़ दूंगा। लेकिन उसने जैसे ही कहा कि उस लड़की ने मालिक के बेटे को थप्पड़ मारा और पुलिस में … Read more

स्वाभिमान का तराजू

 “उसके पास वो सब है जो मुझे चाहिए—शानो-शौकत, महंगी गाड़ियां और रुतबा। और तुम बेकार हो। साफ सुन लो, जिसके पास दौलत नहीं, उससे कोई समझदार लड़की प्यार नहीं कर सकती। पैसा ही सब कुछ होता है, समझे!” उसी वक्त धनराज की चमचमाती खुली गाड़ी हॉर्न बजाते हुए आकर रुकी थी। कावेरी ने मुझे एक … Read more

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