बहू कम और बेटी ज्यादा

“रोहन, तुम किसी भी गलतफहमी में मत रहना। मैं तुम्हारी माँ की तीमारदारी करने के लिए वहाँ बिल्कुल नहीं जा रही हूँ।” श्रुति ने अपने बैग में लैपटॉप रखते हुए बहुत ही सपाट और कठोर स्वर में कहा। रोहन ने अभी-अभी फोन रखा था और वह गहरी चिंता में था। फोन उसके गृहनगर से था। … Read more

दुख का भारी पत्थर

आज माधवी और राघव की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह—सिल्वर जुबली—थी। पिछले एक हफ्ते से दोनों के बच्चे, आर्यन और शिखा, इस पार्टी की तैयारियों में दिन-रात एक किए हुए थे। शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल से लेकर मेहमानों की लिस्ट तक, सब कुछ तय हो चुका था। माधवी अपने कमरे में आईने के सामने … Read more

अपराधबोध

आनंद और सुधा की कहानी भी उन हजारों प्रेम कहानियों जैसी ही थी, जिन्हें समाज और परिवार आसानी से स्वीकार नहीं करते। आज से पैंतीस साल पहले जब उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामा था, तो उनके परिवारों ने हमेशा के लिए उनसे अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। बिना किसी सहारे के, एक अजनबी शहर … Read more

आशीर्वाद

अंजलि अपना सूटकेस पैक कर रही थी। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूरे एक महीने के लिए वह अपने बचपन की सखियों, माँ के हाथ के खाने और उस पुराने झूले के पास जाने वाली थी, जहाँ उसने अपनी ज़िंदगी … Read more

सच्चा प्यार और साथ

दीपावली के दीयों की तरह ही उस दिन घर का कोना-कोना जगमगा रहा था, जब विशाखा पहली बार नई नवेली दुल्हन बनकर इस घर की दहलीज पार कर रही थी। विशाखा और सुशांत का विवाह दो परिवारों का ही नहीं, बल्कि दो जिम्मेदार और परिपक्व इंसानों का मिलन था। सुशांत का परिवार काफी बड़ा था। … Read more

सच्ची मां

“अंजलि बेटा, जरा बाहर आना।” सुमित्रा जी ने अपनी अलमारी को ताला लगाते हुए अपनी नई नवेली बहू अंजलि को आवाज दी। अगले ही पल अंजलि रसोई से अपने हाथ पोंछती हुई बाहर आ गई। उसकी आंखें थोड़ी सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। सुमित्रा जी ने अंजलि को हिदायत देते हुए कहा, … Read more

संदूक में रखा सपना सिल्क की प्लेन बॉर्डर वाली साड़ी… – लतिका श्रीवास्तव

मां कहां हो जोर से आवाज लगाती नंदिनी बैठक से होते हुए अंदर वाले कमरे तक पहुंच गई… लेकिन मां के कमरे के दरवाजे पर ही ठिठक गई उसने देखा मां अपना संदूक खोले बैठी है उसकी तरफ मां की पीठ थी नंदिनी की समझ में नहीं आया कि मां इस समय यहां बैठ कर … Read more

भगवान के घर देर है अंधेर नहीं | – सुदर्शन सचदेवा

अभी अंश 11वीं कक्षा का छात्र है। उसके मन में एक बड़ा सपना है—मुझे अभी से JEE की तैयारी करनी है और अपने माता-पिता का नाम रोशन करना है। लेकिन उसके मन में एक सवाल भी रहता है—”अगर भगवान हैं, तो मेरी मेहनत का फल अभी क्यों नहीं मिलता? क्या सचमुच भगवान मेरी सुनते हैं?” … Read more

दादी की जूठन

मैंने बिना एक पल गँवाए, बिना कोई तर्क किए, अपना मुँह खोल दिया। दादी ने अपने कांपते हाथों से वो खीर मेरे मुँह में रख दी। वो साबूदाने की खीर, जो शायद थोड़ी ठंडी हो चुकी थी, मुझे दुनिया का सबसे स्वादिष्ट व्यंजन लगी। उसे निगलते हुए मेरी आँखों से आंसुओं की एक धार बह … Read more

खोई हुई ममता वापस मिल गई

रमा दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी। एक माँ के इस दर्द ने उसके दिल को चीर कर रख दिया। उसी पल रमा ने एक ऐसा फैसला लिया जो कोई सगा भी शायद ही लेता। उसने तय किया कि जब तक ‘माजी’ (सावित्री देवी) ठीक नहीं हो जातीं, वह उन्हें छोड़कर कहीं नहीं … Read more

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