बुआ जी का हर एक शब्द मेरे सीने में लोहे की कील की तरह चुभ रहा था। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे शरीर से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरी मुट्ठियां भींच गईं, आंखें डबडबा आईं। सबसे ज्यादा डर मुझे इस बात का था कि भाभी क्या जवाब देंगी। आखिर बुआ की बात में सांसारिक गणित तो बिल्कुल सही था। भैया सचमुच कितनी मेहनत करते थे। उनके माथे पर चिंता की लकीरें मैंने खुद देखी थीं। आज के इस मतलबी दौर में, जहां सगे भाई एक कटोरी दाल के लिए अलग चूल्हा जला लेते हैं,
गली के मोड़ पर साइकिल का पैडल मारते हुए मेरे पैर कांप रहे थे। यह थकान सिर्फ शरीर की नहीं थी, बल्कि भीतर पल रहे उस खालीपन की थी जो पिछले छह महीनों से मुझे अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रहा था। छह महीने पहले जिस कपड़ा मिल में मैं अकाउंटेंट था, वह अचानक बंद हो गई। मालिक तो रातों-रात शहर छोड़कर चला गया, मगर हमारे जैसे दर्जनों कामगारों की जिंदगी अधर में लटका गया। उस दिन से लेकर आज तक, हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर मैं पुरानी साइकिल उठाकर निकलता और शाम ढलते-ढलते वही खाली हाथ और झुकी हुई नजरें लेकर चौखट पर लौट आता।
घर के बाहर नीम के पुराने पेड़ की छांव में साइकिल खड़ी करते हुए मैंने एक गहरी सांस ली। मन में यही दुआ थी कि आज किसी से सामना न हो। जब इंसान की जेब खाली हो जाती है, तो उसे अपनों की साधारण नजरें भी चुभने लगती हैं। ऐसा लगता है मानो हर कोई सिर्फ यही पूछ रहा हो कि ‘आज क्या लाए?’ अभी मैंने दहलीज पर कदम रखा ही था कि बैठक की खिड़की से आती तीखी आवाज ने मेरे कदम वहीं जमा दिए।
वह आवाज हमारी दूर की बुआ जी की थी, जो पिछले दो दिनों से हमारे घर आई हुई थीं। उनके शब्दों में वही चाशनी में लिपटा जहर था जो अक्सर सीधे-सादे परिवारों की दीवारों में दरारें डाल देता है। वे मेरी बड़ी भाभी, सरला से बात कर रही थीं।
“सरला, तू भी कितनी भोली है बहू! आज के जमाने में इतना सीधापन ठीक नहीं होता। तेरा पति राघव सुबह सात बजे से रात के नौ बजे तक दुकान पर खून-पसीना एक करता है। रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता है उसका, फिर भी दवा खाकर काम पर जाता है। और यहां घर में? देवर-देवरानी दोनों ठाठ से रोटियां तोड़ रहे हैं। अरे, कब तक चलेगा यह सब? छह महीने कम नहीं होते। अब तो शादी हुए भी उनके तीन साल हो चुके हैं, कोई छोटे बच्चे तो हैं नहीं कि संभाला जाए। ऐसे मुफ़्तखोरों को घर में बैठाकर खिलाओगी तो तुम्हारी अपनी गृहस्थी की कमर टूट जाएगी। कल को तुम्हारे बच्चों का भविष्य क्या होगा?”
बुआ जी का हर एक शब्द मेरे सीने में लोहे की कील की तरह चुभ रहा था। मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे शरीर से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरी मुट्ठियां भींच गईं, आंखें डबडबा आईं। सबसे ज्यादा डर मुझे इस बात का था कि भाभी क्या जवाब देंगी। आखिर बुआ की बात में सांसारिक गणित तो बिल्कुल सही था। भैया सचमुच कितनी मेहनत करते थे। उनके माथे पर चिंता की लकीरें मैंने खुद देखी थीं। आज के इस मतलबी दौर में, जहां सगे भाई एक कटोरी दाल के लिए अलग चूल्हा जला लेते हैं, वहां भैया-भाभी पिछले छह महीनों से मेरे, मेरी पत्नी सीमा और हमारे हिस्से का भी खर्च उठा रहे थे। मुझे लगा कि शायद भाभी भी आज अपनी विवशता कह देंगी। अगर भाभी ने सिर्फ इतना भी कह दिया कि ‘हां बुआ, मुश्किल तो हो रही है’, तो मैं शायद अपनी ही नजरों में गिर जाऊंगा और मुझे लगेगा कि मैं इस घर का सबसे बड़ा अभिशाप बन चुका हूं।
सन्नाटे के उन चंद पलों में मेरा दम घुट रहा था। मैं अपने ही अस्तित्व से नफरत करने लगा था।
तभी भाभी की शांत, गंभीर मगर चट्टान जैसी मजबूत आवाज गूंजी, “बुआ जी, रिश्ते रोटियों के हिसाब से नहीं, दिल की धड़कनों से चलते हैं।”
उस एक वाक्य ने बाहर खड़े मेरे कानों को स्तब्ध कर दिया।
भाभी रुकी नहीं, उनके लहजे में मर्यादा भी थी और एक ऐसा दृढ़ संकल्प भी जिसे कोई हिला नहीं सकता था। वे बोलीं, “बुआ जी, देव कोई पराया नहीं है, इस घर की दूसरी बाजू है। आज अगर उसकी नौकरी छूट गई है, तो क्या वह उसका दोष है? छह महीने पहले जब राघव जी टाइफाइड में तीन हफ्ते अस्पताल में भर्ती थे, तब इसी देव ने दिन-रात एक कर दिया था। अपनी पूरी जमा-पूंजी भैया के इलाज में लगा दी थी और अस्पताल के फर्श पर अखबार बिछाकर सोया था ताकि राघव जी को एक खरोंच भी न आए। तब आपने यह नहीं कहा कि देवर अपनी कमाई बड़े भाई पर क्यों लुटा रहा है? आज जब उस पर बुरा वक्त आया है, तो मैं उसे बेगाना कह दूं?”
बुआ जी ने कुछ कहना चाहा, “पर सरला, दुनियादारी भी कोई चीज होती है…”
“दुनियादारी बाहर वालों के लिए होती है बुआ जी, अपनों के लिए नहीं,” भाभी ने उनकी बात बीच में ही काट दी। “और रही बात मुफ़्त की रोटियां तोड़ने की, तो जिस दिन से देव की नौकरी छूटी है, वह सुबह छह बजे से शाम तक चिलचिलाती धूप में साइकिल से दर-दर भटकता है। उसकी पत्नी सीमा घर के हर काम में मेरा हाथ बंटाती है, उसने महीनों से अपने लिए एक सूती साड़ी तक नहीं मांगी। इस घर पर जितना हक राघव का है, उतना ही देव का भी है। अगर कल को भगवान न करे राघव की तबीयत बिगड़ जाए और वे कमाने लायक न रहें, तो क्या मैं उन्हें भी बोझ समझकर अलग कर दूंगी? परिवार नफे-नुकसान की दुकान नहीं होता बुआ जी, जहां केवल वही बैठेगा जो गल्ले में पैसे डालेगा। जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, इस घर का कोई भी सदस्य खुद को लाचार या बोझ नहीं समझेगा। इसलिए आपसे विनती है कि आगे से देव या सीमा के बारे में ऐसी बातें न करें।”
भाभी के एक-एक शब्द ने मेरे अंदर के मरते हुए स्वाभिमान को जैसे नई सांसें दे दी थीं। मेरी आंखों से बेबसी के आंसू बहकर गालों पर लुढ़क आए, लेकिन इस बार उन आंसुओं में अपमान का खारापन नहीं, बल्कि कृतज्ञता की असीम मिठास थी।
कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था। बुआ जी के पास कहने को कोई शब्द नहीं बचे थे। कुछ ही पलों बाद उनके पैर पटकते हुए भीतर जाने की आहट सुनाई दी। मैंने झटपट अपनी आस्तीन से चेहरे के आंसू पोंछे, दो-तीन गहरी सांसें लीं ताकि मेरी रुंधी हुई आवाज किसी को सुनाई न दे। फिर मैंने दरवाजे की कुंडी धीरे से खटखटाई और सामान्य दिखने का नाटक करते हुए अंदर कदम रखा।
जैसे ही मैं बरामदे में पहुंचा, भाभी रसोई के दरवाजे पर खड़ी थीं। उनके चेहरे पर वही ममतामयी और शांत मुस्कान थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने यह बिल्कुल जाहिर नहीं होने दिया कि अभी कुछ क्षण पहले यहां क्या हुआ था। वे नहीं चाहती थीं कि मैं जरा सा भी संकोच महसूस करूं।
“अरे देव! आ गए तुम? बड़ा वक्त लगा दिया आज,” भाभी ने सहज स्वर में कहा।
“जी भाभी… वो आज दो-तीन जगहों पर चक्कर लग गया था,” मैंने नजरें झुकाए हुए कहा।
भाभी तुरंत रसोई से ठंडे पानी का लोटा और गुड़ का एक टुकड़ा ले आईं। “पहले यह पानी पियो और मुंह मीठा करो। धूप कितनी तेज है बाहर। और सुनो, मैंने तुम्हारे लिए बेसन की कढ़ी और चावल बनाए हैं, जो तुम्हें बहुत पसंद हैं। मुंह-हाथ धो लो, मैं अभी थाली लगाती हूं।”
मैं पानी का लोटा हाथ में थामे खड़ा रहा। भाभी की आंखों में मेरे प्रति वही आदर और स्नेह था जो पहले दिन था। उन्होंने आगे बढ़कर मेरे कंधे पर हौले से हाथ रखा और बोलीं, “चिंता मत किया करो देव। अंधेरी रात कितनी भी लंबी क्यों न हो, सवेरा अपनी तय घड़ी पर ही आता है। तुम्हारी मेहनत कहीं व्यर्थ नहीं जाएगी। जो इंसान ईमानदार होता है, ईश्वर उसकी परीक्षा तो लेता है मगर कभी उसका साथ नहीं छोड़ता।”
उस वक्त कमरे के कोने से मेरी पत्नी सीमा भी बाहर आई। उसकी आंखों के किनारे भी हल्के लाल थे। जाहिर था कि उसने भी बुआ जी की बातें और भाभी का जवाब सुन लिया था। जब सीमा ने मुझे देखा, तो उसकी आंखों में न तो मायूसी थी और न ही कोई शिकायत। उसकी नजरों में अपने परिवार के प्रति एक गहरा गर्व और सुकून था। हमने एक-दूसरे की ओर देखा। बिना एक भी शब्द बोले, हम दोनों समझ चुके थे कि जीवन के इस कठिन दौर में हम दुनिया के सबसे अमीर इंसान थे। हमारे पास भले ही किसी बैंक में लाखों रुपये न हों, लेकिन हमारे पास वह ‘परिवार’ था जिसकी कीमत दुनिया की सारी दौलत मिलकर भी नहीं चुका सकती।
उस शाम जब मैंने थाली से रोटी का पहला निवाला तोड़ा, तो मेरे मन में एक नया संकल्प जन्म ले चुका था। वह निवाला मुझे उपकार का नहीं, बल्कि भाभी के उस अटूट विश्वास का अहसास करा रहा था जो उन्होंने मुझ पर जताया था। मैंने मन ही मन खुद से प्रतिज्ञा की कि अब मैं सिर्फ अपनी रोजी-रोटी के लिए नहीं लडूंगा, बल्कि भाभी और भैया के उस मान-सम्मान को आसमान तक पहुंचाने के लिए जी-जान लगा दूंगा।
अगले दिन से मेरे भीतर एक अद्भुत ऊर्जा का संचार हो चुका था। निराशा की जो धुंध मेरे मन पर छाई थी, वह पूरी तरह छंट चुकी थी। मैंने तय किया कि केवल नौकरी के भरोसे बैठने के बजाय क्यों न अपनी मेहनत और हुनर के दम पर कुछ छोटा ही सही, मगर अपना काम शुरू किया जाए। मुझे कपड़ों के धागे, बुनाई और बाजार के हिसाब-किताब की अच्छी समझ थी।
शाम को जब भैया दुकान से लौटे, तो मैंने हिचकिचाते हुए अपने मन की बात उनके सामने रखी। मैंने कहा, “भैया, शहर के थोक बाजार से अगर हम सीधे कपड़ा लाकर फेरी लगाकर या स्थानीय छोटी दुकानों को सप्लाई करें, तो कम लागत में काम शुरू हो सकता है। मेरे पास कुछ पैसे नहीं हैं, बस आपकी अनुमति और आशीर्वाद चाहिए।”
भैया ने मेरी बात ध्यान से सुनी। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपनी जेब से दुकान की चाबियां निकालीं और मेरी हथेली पर रख दीं। भैया ने नम आंखों से मुस्कुराते हुए कहा, “पगले, मुझसे अनुमति मांग रहा है? यह घर, यह दुकान सब तेरी ही तो है। कल सुबह मेरे साथ चलना, गल्ले में जो भी जमा पूंजी है, उससे तू अपना माल उठाना। मुझे अपनी मेहनत से ज्यादा तेरे हुनर पर भरोसा है।”
भाभी पीछे खड़ी मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। उस पल मुझे महसूस हुआ कि जिस घर में ऐसी समझदारी और प्यार हो, वहां कोई भी विपत्ति ज्यादा देर टिक ही नहीं सकती।
अगले हफ्ते से मेरा नया सफर शुरू हुआ। सुबह पांच बजे उठकर मैं थोक मंडी जाता, अच्छी गुणवत्ता का कपड़ा छांटता और फिर दिन भर शहर के अलग-अलग इलाकों में जाकर व्यापारियों से संपर्क करता। शुरुआत आसान नहीं थी। कई दुकानदारों ने माल देखने से मना कर दिया, कई ने उधारी पर माल मांगा। दोपहर की चिलचिलाती धूप में पसीने से लथपथ होकर जब कभी मेरी हिम्मत डगमगाती, तो मुझे भाभी के वे शब्द याद आ जाते—”देव इस घर की दूसरी बाजू है।” बस, यह ख्याल आते ही मेरी थकान गायब हो जाती और मैं दुगने उत्साह से आगे बढ़ जाता।
घर पर सीमा ने भी एक सिलाई मशीन मंगवा ली थी और आसपास की महिलाओं के कपड़े सिलने शुरू कर दिए थे। वह कहती थी, “जब परिवार एक नाव में सवार है, तो पतवार सबको मिलकर चलानी चाहिए।” भाभी और सीमा मिलकर घर भी संभालतीं और सीमा के काम में भी एक-दूसरे की मदद करतीं। हमारे आंगन में बुआ जी जैसी सोच का कोई असर नहीं हुआ था; वहां केवल सहयोग और प्रेम की खुशबू महक रही थी।
मेरी निष्ठा और उचित दाम की नीति रंग लाने लगी। धीरे-धीरे छोटे व्यापारियों को मेरा व्यवहार और समय पर माल पहुंचाने की आदत पसंद आने लगी। तीन महीने के भीतर ही मेरे पास दर्जनों दुकानों से नियमित ऑर्डर आने लगे। जो देव छह महीने पहले अपनी पहचान खो चुका था, आज वही देव बाजार में एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में जाना जाने लगा था।
मेहनत ने ऐसा फल दिया कि एक साल के भीतर हमने शहर के मुख्य बाजार में अपनी एक बड़ी कपड़ा एजेंसी खोल ली।
उद्घाटन का दिन हमारे पूरे परिवार के लिए किसी त्योहार से कम नहीं था। दुकान के मुख्य द्वार पर जब फीता काटने की बारी आई, तो भैया ने कैंची मेरे हाथ में थमानी चाही। मैंने हाथ पीछे खींच लिए और भैया-भाभी दोनों का हाथ पकड़कर उन्हें आगे कर दिया।
मैंने भरे गले से कहा, “भैया, अगर उस दिन भाभी ने समाज के तानों के आगे अपना सिर झुका लिया होता, तो शायद आज मैं इस मुकाम पर खड़ा होने के बजाय किसी कोने में अपनी किस्मत को रो रहा होता। यह दुकान मेरी मेहनत से नहीं, भाभी के उस विश्वास और आपकी छाया की बदौलत खुली है। इस फीते को काटने का हक केवल आपका और भाभी का है।”
भाभी की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। जब उन्होंने कांपते हाथों से फीता काटा, तो पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बुआ जी भी एक कोने में खड़ी यह सब देख रही थीं, लेकिन आज उनकी नजरें झुकी हुई थीं और उनके चेहरे पर अपनी पुरानी सोच को लेकर गहरा पछतावा था। भाभी ने आगे बढ़कर बुआ जी के पैर छुए और उन्हें भी मिठाई खिलाई। भाभी के इस बड़प्पन ने बुआ जी के दिल का सारा मैल हमेशा के लिए धो दिया।
उस रात घर की छत पर जब पूरा परिवार एक साथ बैठा था, ठंडी हवा चल रही थी। भैया और मैं चाय की चुस्कियां ले रहे थे, वहीं भाभी और सीमा बच्चों को खिला रही थीं। मैंने आसमान की तरफ देखा और सोचा कि समाज में लोग अक्सर कहते हैं कि रिश्तों में दरार बाहर वालों की वजह से आती है। कोई मंथरा आकर कान भर देती है और परिवार बिखर जाते हैं। लेकिन सच तो यह है कि मंथराएं बाहर नहीं, हमारे अपने कमजोर विश्वास में पनपती हैं। अगर घर की नींव में सरला भाभी जैसी समझदारी, निस्वार्थ प्रेम और अटूट विश्वास हो, तो दुनिया का कोई भी तूफान उस घर का एक पत्ता भी नहीं हिला सकता। विश्वास की उस शीतल छांव में हमारा परिवार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और खुशहाल बन चुका था।
आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं:
क्या आज के दौर में भी ऐसे संयुक्त परिवार और समझदार भाभियां मौजूद हैं जो बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़ी होती हैं? आपके हिसाब से एक बिखरते हुए परिवार को बचाने के लिए सबसे बड़ी ताकत क्या होती है—पैसा या आपसी विश्वास? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।
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लेखिका : मैथिली मिश्रा