दहलीज के पार का उजाला

“मुझे माफ़ कर दो सुप्रिया… मुझे माफ़ कर दो,” कुणाल की आवाज़ कांप रही थी। “आज तुमने जब वो दरवाज़ा छोड़ा, तब पहली बार मुझे अपनी कायरता का अहसास हुआ। मैं घर पर बैठा रहा, लेकिन मेरा दम घुट रहा था। मिस्टर मल्होत्रा घर आए, माँ ने सब इंतज़ाम किए, लेकिन मैं डाइनिंग टेबल पर एक निवाला भी नहीं निगल पाया। मुझे बार-बार तुम्हारा वो चेहरा याद आ रहा था। मुझे लगा कि जिस लड़की ने अपना पूरा जीवन, अपना घर, अपना परिवार छोड़कर मुझ पर भरोसा किया, मैंने उसी को सबसे बड़े संकट के समय अकेला छोड़ दिया। अगर आज पापा को कुछ हो जाता, तो मैं ज़िंदगी भर खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता।”

दिसंबर की कंपकपाती सुबह थी। चारों ओर घने कोहरे की चादर फैली हुई थी और सूरज की किरणें बादलों के पीछे कहीं दुबकी थीं। हवेलीनुमा घर में अभी सन्नाटा ही पसरा था। सुप्रिया रसोई की स्लैब पर हाथ टिके चाय का पानी उबलने का इंतज़ार कर रही थी कि अचानक उसके कोट की जेब में रखा मोबाइल थरथरा उठा। इतनी सुबह फोन की घंटी का बजना किसी खतरे की घंटी से कम नहीं लगता। स्क्रीन पर देखा तो नाम चमक रहा था—’डॉ. आलोक माथुर’।

माथुर अंकल सुप्रिया के मायके के पारिवारिक मित्र और पड़ोसी थे। सुप्रिया की छाती किसी अनजाने डर से धक से रह गई। उसने फौरन कांपती उंगलियों से फोन का हरा बटन स्वाइप किया।

“हैलो, माथुर अंकल? सब ठीक तो है?”

“सुप्रिया बेटा, खुद को संभालो और तुरंत लाइफलाइन अस्पताल पहुँचो। तुम्हारे पापा को सुबह सीने में भयानक दर्द उठा था। वो बेहोश होकर फर्श पर गिर गए थे। हम लोग एम्बुलेंस से उन्हें यहाँ लेकर आए हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि बड़ा हार्ट अटैक है, फौरन एंजियोप्लास्टी या बाईपास की ज़रूरत पड़ सकती है। बेटा, यहाँ कोई कागज़ी कार्रवाई करने वाला नहीं है, तुम जल्दी आओ।”

डॉक्टर माथुर की घबराई हुई आवाज़ सुनकर सुप्रिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हाथ से चाय की छलनी छूटकर नीचे जा गिरी। उसके पिता, विश्वनाथ जी, रेलवे से रिटायर्ड चीफ इंजीनियर थे। सुप्रिया जब मात्र नौ साल की थी, तभी उसकी माँ इस दुनिया से चल बसी थीं। विश्वनाथ जी ने अपनी इकलौती बेटी के लिए दूसरी शादी तक नहीं की। उन्होंने माँ और बाप दोनों का प्यार देकर सुप्रिया को पाला-पोसा था। अपनी हर ख्वाहिश मारकर बेटी को बेहतरीन शिक्षा दिलाई। आज वो उसी शहर के दूसरे छोर पर अकेले रहते थे, केवल पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर।

शादी के समय सुप्रिया की सास, मनोरमा देवी ने पूरे समाज के सामने ताल ठोककर कहा था, “मास्टर साहब, आप क्यों फिक्र करते हैं? हम बेटी ले जा रहे हैं, कोई बहू नहीं। हमारा बेटा कुणाल आपके बेटे जैसा रहेगा और सुप्रिया पराई नहीं, हमारे घर की शान होगी।”

लेकिन विवाह के तीन सालों में सुप्रिया ने उस मीठी बातों की असलियत को कड़वे घूँट की तरह पिया था। मनोरमा देवी के उस ‘बेटी’ शब्द के पीछे एक तानाशाही मुखौटा था। सुप्रिया का अपने पिता से मिलना, उनसे रोज़ फोन पर बात करना या उनकी तबीयत पूछना तक ससुराल में एक अपराध माना जाता था। हर बात पर एक ही ताना सुनने को मिलता—”जो लड़कियाँ शादी के बाद भी मायके का राग अलापती हैं, उनके ससुराल कभी बस नहीं पाते।”

सुप्रिया का पति कुणाल एक बड़ी प्राइवेट बैंक में वाइस प्रेसिडेंट था। वह स्वभाव से क्रूर या बुरा नहीं था, लेकिन माँ के प्रति उसकी निष्ठा इतनी अंधी थी कि वह सही और गलत का अंतर भूल चुका था। उसे लगता था कि माँ की किसी बात का विरोध करना पाप है, और इसी कमज़ोरी के चलते वह हर संवेदनशील मौके पर अपनी चुप्पी का चादर ओढ़ लेता था।

सुप्रिया कांपते पैरों से हॉल की तरफ दौड़ी। वहाँ मनोरमा देवी शॉल लपेटे, हाथ में गर्म पानी का प्याला लिए बैठी थीं।

“माँ जी… बाबूजी को दिल का दौरा पड़ा है। अस्पताल में हैं, बहुत सीरियस हालत है। मुझे अभी तुरंत लाइफलाइन अस्पताल जाना होगा,” सुप्रिया ने हाँफते हुए, आंसुओं को रोककर कहा।

मनोरमा देवी ने अपनी भौहें सिकोड़ीं और पानी का घूँट भरते हुए बेरुखी से कहा, “इतनी सुबह-सुबह? दिमाग तो ठिकाने है तुम्हारा? आज कुणाल के बड़े बॉस और उनकी पत्नी दोपहर के खाने पर आने वाले हैं। घर की सारी तैयारी बाकी है। कश्मीरी पुलाव और शाही पनीर कौन बनाएगा? काम वाली बाई तो सिर्फ झाड़ू-पोछा करती है।”

सुप्रिया स्तब्ध रह गई। “माँ जी, आप खाने की बात कर रही हैं? वहाँ मेरे पिता जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। डॉक्टर कह रहे हैं तुरंत सर्जरी करनी पड़ेगी। उनके पास अस्पताल में कोई नहीं है।”

“तो डॉक्टर माथुर हैं न? पड़ोसी किस दिन काम आते हैं? वैसे भी तुम जाकर क्या कर लोगी? तुम कोई डॉक्टर तो हो नहीं,” मनोरमा देवी ने आवाज़ को सख्त करते हुए आगे कहा, “बहू, ससुराल आ जाने के बाद लड़की की प्राथमिकता उसका पति और उसका घर होता है। मायके के हर छींक पर अगर बहुएं दौड़ने लगेंगी, तो खानदान की मर्यादा का क्या होगा? शाम को कुणाल के साथ चली जाना।”

तभी कुणाल कमरे से बाहर निकला। उसने कोट पहना हुआ था। सुप्रिया उम्मीद भरी नज़रों से उसकी ओर दौड़ी और उसका हाथ पकड़ लिया। “कुणाल, प्लीज… पापा अस्पताल में हैं। आईसीयू में हैं वो। चलो न मेरे साथ, उन्हें हमारी ज़रूरत है।”

कुणाल ने अपनी कलाई धीरे से छुड़ा ली और नज़रें चुराते हुए बोला, “सुप्रिया, माँ की बात में दम है। आज मिस्टर मल्होत्रा लंच पर आ रहे हैं, मेरा प्रमोशन अटका हुआ है। अगर मैं अभी हॉस्पिटल चला गया या घर पर इंतज़ाम बिगड़ा तो मेरी सालों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। माथुर अंकल तो हैं ही वहाँ। मैंने उन्हें अभी मैसेज कर दिया है, पैसों की कोई कमी हो तो बता दें। मैं शाम को फ्री होकर सीधे वहीं आऊँगा।”

उस पल सुप्रिया के कानों में एक सन्नाटा छा गया। उसे ऐसा लगा मानो किसी ने उसके सीने में खंजर घोंप दिया हो। जिस पति को वह अपना जीवनसाथी, अपना रक्षक और अपने पिता का बेटा समझती रही थी, उसके लिए एक कॉर्पोरेट लंच और प्रमोशन किसी इंसान की सांसों से ज्यादा कीमती था। और पैसों का ताना? क्या एक पिता को अपनी औलाद के हाथ की छुअन, उसके सहारे की ज़रूरत नहीं होती? क्या सिर्फ चेक काट देने से फर्ज पूरा हो जाता है?

सुप्रिया ने अपनी आँखें पोंछीं। उसके चेहरे से लाचारी और गिड़गिड़ाहट का भाव पलक झपकते ही गायब हो गया। उसकी आँखों में एक ऐसी ठंडी आग जल उठी जिसे कुणाल ने पहले कभी नहीं देखा था।

“कुणाल, आज तुमने और माँ जी ने मेरी आँखें खोल दीं,” सुप्रिया का स्वर बिल्कुल शांत, धीमा लेकिन चट्टान जैसा अटल था। “तुम्हारे लिए शायद प्रमोशन और लंच दुनिया की सबसे बड़ी बात हो सकती है, लेकिन मेरे लिए वो पिता दुनिया हैं, जिन्होंने मुझे अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया। जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे नाम कर दी। आज अगर मैं उनके पास नहीं गई, तो मैं खुद को कभी आईने में इंसान के रूप में नहीं देख पाऊँगी।”

सुप्रिया तेज़ी से मुड़ी, अपना पर्स और चाबियाँ उठाईं और मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़ गई।

“सुप्रिया! खबरदार जो उस दरवाज़े से बाहर कदम रखा!” मनोरमा देवी अपनी कुर्सी से उठकर चीखीं। “अगर आज तू इस घर की चौखट लांघकर गई, तो याद रखना इस घर के दरवाज़े तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। एक बार जो बहू ससुराल की मर्यादा तोड़कर बाहर निकलती है, उसकी इस घर में कोई जगह नहीं होती!”

सुप्रिया चौखट पर रुकी। उसने पलटकर अपनी सास की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में न डर था, न हिचकिचाहट।

“माँ जी, जिस चौखट के भीतर इंसानियत और माँ-बाप के प्रति फर्ज की कोई कद्र न हो, वो चौखट घर की नहीं, किसी कैदखाने की होती है। आपने मुझे अपनी बेटी कहा था, लेकिन हकीकत यह है कि आपने मुझे सिर्फ एक ऐसी बंधी-बंधाई अमानत समझा जिसे अपनी मर्जी से जीने का कोई अधिकार नहीं। मेरे पिता ने मुझे इतना बुज़दिल नहीं बनाया कि मैं उनकी ज़िंदगी और मौत के सवाल पर आपकी इजाज़त की भीख मांगूँ। अगर अपने जन्मदाता के आखिरी पलों में उनके पास खड़े होना जुर्म है, तो मुझे यह जुर्म सौ बार मंज़ूर है। और हाँ, अगर यह दरवाज़ा मेरे लिए बंद होता है, तो याद रखिएगा, मेरा आत्मसम्मान इस दरवाज़े से कहीं ज्यादा बड़ा है।”

बिना दूसरा पल गंवाए, सुप्रिया ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गई। अपनी स्कूटी स्टार्ट की और ठंडी हवा के थपेड़ों की परवाह किए बिना तेज़ी से अस्पताल की तरफ दौड़ पड़ी।

पीछे हॉल में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। मनोरमा देवी गुस्से में कांप रही थीं, लेकिन कुणाल अपनी जगह पर जड़वत खड़ा था। सुप्रिया के शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे—’जिस चौखट के भीतर इंसानियत की कोई कद्र न हो, वो घर नहीं कैदखाना है।’

अस्पताल पहुँचकर सुप्रिया ने देखा कि विश्वनाथ जी को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया था। डॉक्टर माथुर बाहर खड़े थे। सुप्रिया को देखते ही उन्होंने राहत की सांस ली। “बेटा, शुक्र है तुम आ गईं। डॉक्टर तुरंत इमरजेंसी बाईपास सर्जरी की बात कर रहे हैं। बिना परिवार के किसी सदस्य के दस्तखत के वो ऑपरेशन शुरू नहीं कर सकते थे।”

सुप्रिया ने बिना एक पल गंवाए सारे सहमति पत्रों पर अपने हाथ से दस्तखत किए। उसने अपने सारे फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक खातों की डिटेल निकालकर बिलिंग काउंटर पर दे दी। अगले चार घंटे सुप्रिया के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। वह आईसीयू के बाहर बने छोटे से मंदिर के सामने हाथ जोड़कर बैठी रही। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसके होंठ लगातार ईश्वर से पिता की ज़िंदगी की भीख मांग रहे थे।

दोपहर के करीब तीन बजे, ऑपरेशन थियेटर का लाल बल्ब बुझा। सीनियर सर्जन बाहर निकले, चेहरे पर थकान थी लेकिन एक हल्की मुस्कान।

“यू आर अ ब्रेव डॉटर,” डॉक्टर ने सुप्रिया के सिर पर हाथ रखते हुए कहा। “अगर आप आधे घंटे भी देर कर देतीं, तो हम आपके पिता को नहीं बचा पाते। मैसिव हार्ट अटैक था। लेकिन अब खतरा टल चुका है। सर्जरी सफल रही है, अगले चौबीस घंटे वो निगरानी में रहेंगे, फिर आप उनसे मिल सकती हैं।”

सुप्रिया के घुटने टिक गए। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर और डॉक्टर का धन्यवाद किया। उसके सीने से एक बहुत बड़ा बोझ उतर चुका था।

शाम के करीब पाँच बज रहे थे। अस्पताल के गलियारे में कदमों की चाप सुनाई दी। सुप्रिया ने मुड़कर देखा तो कुणाल सामने खड़ा था। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। उसके हाथ में दवाइयों की फाइलें थीं और कपड़े अस्त-व्यस्त थे।

सुप्रिया चुपचाप अपनी जगह पर बैठी रही, उसने न कोई शिकायत की, न कोई सवाल पूछा।

कुणाल धीरे-धीरे उसके पास आया और उसी ठंडी बेंच पर बैठ गया। उसका सिर झुका हुआ था। कुछ देर तक दोनों के बीच एक गहरा सन्नाटा छाया रहा। फिर कुणाल ने बहुत ही धीमी और रुंधे हुए गले से कहा, “पापा… पापा कैसे हैं अब?”

“खतरे से बाहर हैं। सर्जरी हो गई है,” सुप्रिया ने बिना उसकी तरफ देखे सपाट आवाज़ में जवाब दिया।

कुणाल की आँखों से आँसू छलक कर उसकी पतलून पर गिर पड़े। उसने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया और बच्चों की तरह सिसकने लगा।

“मुझे माफ़ कर दो सुप्रिया… मुझे माफ़ कर दो,” कुणाल की आवाज़ कांप रही थी। “आज तुमने जब वो दरवाज़ा छोड़ा, तब पहली बार मुझे अपनी कायरता का अहसास हुआ। मैं घर पर बैठा रहा, लेकिन मेरा दम घुट रहा था। मिस्टर मल्होत्रा घर आए, माँ ने सब इंतज़ाम किए, लेकिन मैं डाइनिंग टेबल पर एक निवाला भी नहीं निगल पाया। मुझे बार-बार तुम्हारा वो चेहरा याद आ रहा था। मुझे लगा कि जिस लड़की ने अपना पूरा जीवन, अपना घर, अपना परिवार छोड़कर मुझ पर भरोसा किया, मैंने उसी को सबसे बड़े संकट के समय अकेला छोड़ दिया। अगर आज पापा को कुछ हो जाता, तो मैं ज़िंदगी भर खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता।”

कुणाल ने आगे बढ़कर सुप्रिया के दोनों हाथ अपनी हथेलियों में थाम लिए। “मैं मल्होत्रा को सब सच बताकर सीधे यहाँ भागा चला आया। मैंने अपनी माँ से भी साफ कह दिया है कि जो बेटा अपनी पत्नी के पिता का दर्द नहीं समझ सकता, वो एक अच्छा बेटा भी कभी नहीं बन सकता। सुप्रिया, मैं आज तक सिर्फ एक आज्ञाकारी बेटा बनने के चक्कर में एक कायर पति बना रहा। पर अब नहीं। तुम सही थीं, शादी का मतलब यह नहीं कि तुम अपने जन्म देने वाले माता-पिता को पराया कर दो।”

सुप्रिया ने कुणाल की ओर देखा। उसकी आँखों में सचमुच का पश्चाताप और आत्मग्लानि बह रही थी। सुप्रिया का दिल जो सुबह के अपमान से पत्थर हो गया था, कुणाल के इन सच्चे आंसुओं को देखकर थोड़ा पिघल गया।

“कुणाल,” सुप्रिया ने शांत भाव से कहा, “मैं कभी तुम्हारी माँ के खिलाफ नहीं थी, न ही तुम्हें उनसे दूर करना चाहती थी। लेकिन मैं बस इतना चाहती थी कि जैसा सम्मान और प्यार तुम अपनी माँ के लिए रखते हो, वैसा ही आदर मेरे पिता को भी मिले। वो बूढ़े हैं, अकेले हैं। बेटी की शादी कर देने का मतलब यह नहीं होता कि पिता लावारिस हो गया।”

“मैं समझ गया हूँ सुप्रिया,” कुणाल ने अपने आँसू पोंछते हुए दृढ़ता से कहा। “और मैंने एक फैसला किया है। पापा जैसे ही डिस्चार्ज होंगे, वो उस पुराने मकान में अकेले नहीं रहेंगे। वो हमारे साथ, हमारे घर में रहेंगे। यह उनका भी उतना ही हक है जितना माँ का है। अगर माँ को आपत्ति होगी, तो मैं उन्हें समझाऊँगा, लेकिन अब पापा अकेले नहीं रहेंगे। उनका बेटा अब मैं बनूँगा।”

अगले दिन सुबह जब विश्वनाथ जी को होश आया, तो उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से देखा कि उनकी इकलौती बेटी सुप्रिया उनके सिरहाने बैठी उनका हाथ सहला रही थी, और उनका दामाद कुणाल उनके पैर दबा रहा था।

विश्वनाथ जी की आँखों के कोरों से खुशी के आँसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथों से दोनों के सिर पर अपना हाथ रख दिया।

अस्पताल के कमरे की खिड़की से सुबह की ताज़ा, सुनहरी धूप छनकर अंदर आ रही थी। वह धूप सिर्फ एक नए दिन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक ऐसे परिवार की नई सुबह थी जहाँ रिश्तों ने संकीर्ण बंधनों, रूढ़ियों और स्वार्थ की बेड़ियों को तोड़कर एक-दूसरे के आत्मसम्मान को अपनाना सीख लिया था। सुप्रिया को अब किसी अनजानी चौखट का डर नहीं था; उसने अपने साहस से उस चौखट को ही बदल दिया था।

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