सच्चा प्यार और साथ

दीपावली के दीयों की तरह ही उस दिन घर का कोना-कोना जगमगा रहा था, जब विशाखा पहली बार नई नवेली दुल्हन बनकर इस घर की दहलीज पार कर रही थी। विशाखा और सुशांत का विवाह दो परिवारों का ही नहीं, बल्कि दो जिम्मेदार और परिपक्व इंसानों का मिलन था। सुशांत का परिवार काफी बड़ा था। घर में उसके बूढ़े माता-पिता, एक छोटी बहन अंजलि और एक छोटा भाई कुणाल थे। सुशांत के पिता, दीनानाथ जी, एक सरकारी स्कूल के शिक्षक थे और कुछ ही महीने पहले वे सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी पेंशन से घर का खर्च चलना मुश्किल था, इसलिए परिवार की पूरी आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी अब सुशांत के कंधों पर आ गई थी।

विशाखा एक बहुत ही समझदार और सुलझी हुई लड़की थी। वह शादी से पहले भी एक कंपनी में काम करती थी और उसने शादी के बाद भी अपनी नौकरी जारी रखने का फैसला किया था। सुशांत अक्सर रात को अपनी डायरी में घर के खर्चों और जिम्मेदारियों का हिसाब लगाते हुए परेशान हो जाता था। विशाखा उसकी इस खामोश परेशानी को भली-भांति समझती थी। वह जानती थी कि सुशांत एक ऐसा बड़ा बेटा है जो अपने परिवार के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है, लेकिन कई बार जिम्मेदारियों का पहाड़ इंसान को अंदर ही अंदर तोड़ देता है। विशाखा ने सुशांत के कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कहा था, “सुशांत, ये रथ अब दो पहियों का है। आप अकेले इसे नहीं खींचेंगे। सुख हो या दुख, हम दोनों मिलकर इस परिवार को आगे ले जाएंगे।”

समय अपनी गति से बढ़ता रहा। कुछ महीनों बाद ही अंजलि के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आ गया। लड़के वाले अच्छे थे, लेकिन शादी का खर्च उठाना सुशांत के लिए एक बड़ी चुनौती थी। सुशांत ने बैंक से एक बड़ा लोन लिया। उस समय विशाखा ने भी अपनी बरसों की जमा-पूंजी और अपनी नौकरी का बोनस बिना किसी हिचकिचाहट के अंजलि की शादी में लगा दिया। अंजलि की विदाई बहुत धूमधाम से हुई, लेकिन उसके जाने के बाद घर पर लोन की किश्तों का भारी बोझ आ गया।

इसी बीच, विशाखा ने एक प्यारी सी बेटी, नव्या को जन्म दिया। नव्या के आने से घर में खुशियों का माहौल तो बना, लेकिन साथ ही एक नई चिंता भी जुड़ गई—बच्ची का भविष्य और उसकी परवरिश। सुशांत और विशाखा दोनों दिन-रात मेहनत करते। विशाखा सुबह जल्दी उठकर पूरे घर का काम करती, बच्ची को संभालती और फिर ऑफिस भागती। दीनानाथ जी और उनकी पत्नी अपनी बहू की इस भागदौड़ और त्याग को देखकर अक्सर भावुक हो जाते थे। सास कहती थीं, “विशाखा, तूने हमारे घर को सिर्फ संभाला नहीं है, बल्कि इसे एक मंदिर बना दिया है। हमें तो लगता था कि हम एक बहू ला रहे हैं, लेकिन भगवान ने हमें साक्षात अन्नपूर्णा दे दी है।”

घर की एक बड़ी समस्या सुशांत का छोटा भाई कुणाल भी था। कुणाल ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन पिछले दो साल से उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल रही थी। लगातार मिल रही असफलताओं की वजह से कुणाल डिप्रेशन का शिकार होने लगा था। वह अक्सर अपने कमरे में बंद रहता और खुद को परिवार पर बोझ समझने लगा था। एक रात कुणाल बहुत रो रहा था। तब विशाखा उसके कमरे में गई और उसे समझाते हुए कहा, “कुणाल, जीवन में अगर संघर्ष न हो तो जीत का मजा कैसे आएगा? तुम्हारे भैया और मैं दिन-रात किसलिए मेहनत कर रहे हैं? ताकि तुम बिना किसी दबाव के अपने सपनों को पूरा कर सको। ये जो रात का अंधेरा है ना, ये हमेशा नहीं रहता। तुम बस अपनी मेहनत पर भरोसा रखो। ये परिवार तुम्हारी ताकत है, कमजोरी नहीं।”

विशाखा और सुशांत के इस अटूट विश्वास ने कुणाल के अंदर एक नई आग पैदा कर दी। उसने दोगुनी मेहनत से तैयारियां शुरू कर दीं। वह दिन-रात किताबों में डूबा रहता। सुशांत ने भी अपनी थकावट को कभी कुणाल की पढ़ाई के बीच नहीं आने दिया।

फिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका इस परिवार को बरसों से इंतजार था। बाहर तेज बारिश हो रही थी। घर में सब लोग शाम की चाय पी रहे थे कि तभी दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खुला तो सामने कुणाल खड़ा था। वह बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ था, लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो घर की सारी ट्यूबलाइट्स से भी ज्यादा रोशन थी। उसकी सांसें तेज चल रही थीं और आंखों में आंसू थे।

कुणाल दौड़कर सीधा सुशांत और विशाखा के पैरों में गिर पड़ा। “भैया! भाभी! मेरा सिलेक्शन हो गया है। वो भी शहर की सबसे बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में, और पैकेज इतना है कि अब हमारे घर का सारा लोन मैं चुटकी में भर दूंगा!”

यह सुनते ही जैसे उस छोटे से कमरे में खुशियों का बम फूट पड़ा। सुशांत ने झुककर अपने छोटे भाई को उठाया और उसे कसकर गले लगा लिया। दोनों भाइयों की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। विशाखा भी अपनी नम आंखों से इस खूबसूरत पल को देख रही थी।

सुशांत ने कुणाल की पीठ थपथपाते हुए कहा, “मुझे पता था मेरे शेर, तू एक दिन जरूर बाजी मारेगा। ये हमारी शुरुआत की तकलीफें थीं कुणाल, जो हमें अंदर से मजबूत बना रही थीं। आज मुझे लग रहा है कि मेरी सारी थकान मिट गई है। अब हम एक नहीं, दो हैं। अब इस परिवार को कोई नहीं डिगा सकता।”

दीनानाथ जी और उनकी पत्नी भी वहां आ गए थे। उन्होंने विशाखा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज हम बहुत खुश हैं। हमें अपने बेटों पर तो गर्व है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा गर्व इस बात पर है कि हमें विशाखा जैसी बहू मिली, जिसने कभी इस परिवार को बिखरने नहीं दिया। हे ईश्वर, हम तुझसे और क्या मांगें? तूने हमें सब कुछ दे दिया।”

सुशांत ने विशाखा की तरफ प्यार से देखते हुए कहा, “बिल्कुल पापा, आज हमारे घर में अगर प्यार और विश्वास की ये अटूट नींव है, तो वो विशाखा की वजह से ही है।”

माहौल बहुत भावुक हो गया था। तभी कुणाल ने अपनी आंखें पोंछीं और अपनी चिर-परिचित शरारती मुस्कान के साथ बोला, “अरे पापा-मम्मी! आज ईश्वर से आपको जो मांगना है बेझिझक मांग लो। आज ऊपर वाला बहुत अच्छे मूड में है, उसने छप्पर फाड़ के दिया है। क्या पता आपकी और कोई मुराद भी पूरी कर दे!”

कुणाल की इस बात पर घर का वह भावुक माहौल अचानक ठहाकों में बदल गया। नव्या भी अपने चाचा को हंसता देख तालियां बजाने लगी। उस घर की दीवारों ने बरसों बाद एक ऐसी हंसी सुनी थी, जिसमें कोई दर्द, कोई चिंता और कोई कर्ज नहीं था, सिर्फ और सिर्फ एक-दूसरे का सच्चा प्यार और साथ था।

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दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे के साथ खड़े हों, तो बड़ी से बड़ी मुश्किल भी छोटी लगने लगती है? इस कहानी में विशाखा और सुशांत का साथ आपको कैसा लगा? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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