पार्वती देवी की अनुभवी आँखें पिछले कई दिनों से एक अजीब सा बदलाव महसूस कर रही थीं। उनका बेटा, समीर, जो हमेशा पूरे घर में अपनी हंसी और चुलबुलेपन से रौनक बिखेरे रहता था, आजकल एक गहरी और अनजानी उदासी की चादर ओढ़े हुए था। यह बात पार्वती जी को अंदर ही अंदर बहुत बेचैन कर रही थी। घर में खुशियों का माहौल था; उनकी बहू, अंजलि, पांच महीने की गर्भवती थी। यह वो समय होता है जब कोई भी पति-पत्नी अपने आने वाले बच्चे के सुनहरे भविष्य के सपने बुनते हैं। एक भावी पिता के रूप में समीर को तो इस समय सातवें आसमान पर होना चाहिए था। बच्चे का कमरा कैसा होगा, उसके खिलौने, उसके नाम… इन सब बातों से घर गूंजना चाहिए था। लेकिन इसके उलट, समीर दफ्तर से लौटकर चुपचाप अपने कमरे में चला जाता, या फिर आधी रात तक बालकनी में खड़ा होकर किसी गहरी सोच में डूबा रहता। अंजलि की आँखों में भी अपने पति की इस मायूसी को लेकर सवाल तैरने लगे थे, लेकिन अपने गर्भ की नाजुक स्थिति के कारण वह ज्यादा कुछ पूछने से कतराती थी।
आज सुबह नाश्ते की मेज पर जब अंजलि ने बच्चे के लिए एक छोटे से लकड़ी के झूले की तस्वीर समीर को दिखाई, तो समीर ने बस एक फीकी सी मुस्कान दी और बिना कुछ खाए ऑफिस के लिए निकल गया। पार्वती देवी समझ गईं कि बात सिर्फ ऑफिस की साधारण थकान की नहीं है; दाल में कुछ बहुत काला है। जिस बात को वे अब तक काम का बोझ समझकर टाल रही थीं, आज उसकी गंभीरता ने उनके दिल में एक अनजाना खौफ पैदा कर दिया। एक माँ का दिल किसी रडार से कम नहीं होता, वह अपने बच्चे के माथे की सिलवटें देखकर ही उसके दिल का हाल पढ़ लेती है। पार्वती जी ने तय कर लिया कि आज रात वे इस खामोशी की दीवार को तोड़कर ही रहेंगी। चाहे जो हो जाए, आज उन्हें समीर के मन का यह भारी बोझ उतरवाना ही होगा।
रात के ग्यारह बज चुके थे। अंजलि अपने कमरे में सो चुकी थी। पार्वती देवी दबे पांव समीर के कमरे की तरफ गईं, लेकिन वह वहां नहीं था। उन्होंने देखा कि दालान से सटी हुई बालकनी का दरवाजा आधा खुला है और वहां अँधेरे में समीर खड़ा है। चाँद की हल्की रोशनी में भी समीर का उतरा हुआ चेहरा और उसकी आँखों में छाई गहरी हताशा साफ झलक रही थी। पार्वती देवी धीरे से उसके पास गईं और उसके कंधे पर अपना हाथ रख दिया। माँ के स्पर्श से समीर एकदम चौंक गया।
“क्या बात है मेरे लाल? कौन सा तूफान सीने में दबाए बैठा है जो तुझे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है?” पार्वती जी ने बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ स्वर में पूछा।
समीर ने नजरें चुराते हुए बात टालने की कोशिश की, “कुछ नहीं माँ, बस ऑफिस का थोड़ा तनाव है। आप इतनी रात को क्यों जाग रही हैं? जाइए सो जाइए, आपकी तबीयत खराब हो जाएगी।”
पार्वती जी ने समीर का चेहरा अपनी तरफ घुमाया। “मुझे मत सिखा समीर। मैंने तुझे अपनी कोख में नौ महीने और इस दुनिया में अट्ठाईस साल पाला है। तेरी हंसी असली है या झूठी, ये मैं तेरी सांसों की आहट से बता सकती हूँ। अंजलि माँ बनने वाली है, इस घर में खुशियां आनी हैं, और तू एक मरे हुए इंसान की तरह जी रहा है। सच-सच बता, बात क्या है? ऐसा क्या है जो तू अपनी माँ से भी नहीं बांट पा रहा?”
अपनी माँ की आँखों में झांकते ही समीर के सब्र का बांध टूट गया। वह जो आदमी पिछले कई हफ्तों से अपने आंसुओं को पी रहा था, वह आज एक छोटे बच्चे की तरह अपनी माँ के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसकी हिचकियां बंध गईं। पार्वती जी का दिल कांप उठा, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला और उसकी पीठ सहलाती रहीं।
“माँ… मैं सब कुछ हार गया,” समीर ने सुबकते हुए कहा। “मेरी नौकरी… मेरी नौकरी पिछले महीने ही छूट गई। कंपनी में अचानक छंटनी हुई और मुझे निकाल दिया गया। मैंने अंजलि को इसलिए नहीं बताया क्योंकि डॉक्टर ने उसे किसी भी तरह का तनाव लेने से सख्त मना किया है। हमारे सिर पर घर का इतना बड़ा लोन है, अंजलि की डिलीवरी का खर्च, आने वाले बच्चे की जिम्मेदारियां… और मेरे पास कुछ नहीं बचा माँ। मैं रोज सुबह ऑफिस जाने का नाटक करता हूँ और दिन भर शहर की धूप और धूल फांकता रहता हूँ, नई नौकरी की तलाश में भटकता रहता हूँ। मुझे हर जगह से सिर्फ निराशा मिल रही है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं अपने बच्चे का स्वागत कैसे करूंगा? मैं तो एक अच्छा पिता बनने से पहले ही हार गया माँ।”
समीर की बातें सुनकर पार्वती जी की आँखों में भी आंसू आ गए। लेकिन ये आंसू डर के नहीं, बल्कि अपने बेटे के उस अकेलेपन और संघर्ष के लिए थे जो वह इतने दिनों से चुपचाप झेल रहा था। उन्होंने समीर का माथा चूमा और अपनी साड़ी के पल्लू से उसके आंसू पोंछे।
“बस इतनी सी बात के लिए मेरा शेर बेटा अंदर ही अंदर इतना घुट रहा था?” पार्वती जी ने बहुत ही शांत और मजबूत आवाज में कहा। “समीर, पैसा और नौकरी तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन ये जो परिवार होता है ना, वो किसी भी मुसीबत से बड़ा होता है। तूने ये कैसे सोच लिया कि तू इस लड़ाई में अकेला है? क्या तेरी माँ मर गई है?”
समीर ने हैरानी से माँ को देखा। पार्वती जी ने आगे कहा, “मेरे पास मेरे वो पुश्तैनी गहने रखे हैं और बाबूजी की कुछ एफडी भी है जो उन्होंने बुरे वक्त के लिए छोड़ी थी। मैं कल ही जाकर वो सब तुड़वा दूंगी। घर का लोन भी भरेंगे और मेरी बहू की डिलीवरी भी शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में होगी। और तू हार कैसे मान सकता है? जब ईश्वर एक दरवाजा बंद करता है, तो दस नए दरवाजे खोल देता है। तू अपनी मेहनत जारी रख, नौकरी भी मिल जाएगी। लेकिन इस तरह अंदर ही अंदर घुट कर अपनी और अंजलि की खुशियां मत छीन।”
समीर को लगा जैसे किसी ने उसके सिर से कोई बहुत बड़ा पहाड़ हटा दिया हो। माँ के उन चंद शब्दों और उनके अटूट विश्वास ने उसकी बुझी हुई उम्मीदों में फिर से जान फूंक दी थी। उसने अपनी माँ के दोनों हाथ चूम लिए।
“मुझे माफ कर दो माँ। मैं सच में बहुत कमजोर पड़ गया था। मुझे लगा था कि मैं अकेला सब संभाल लूंगा, लेकिन मैं टूट रहा था। आज आपने मुझे फिर से जीना सिखा दिया,” समीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
उस रात बालकनी में खड़े होकर समीर ने अपनी माँ के साथ मिलकर एक बार फिर से अपने आने वाले बच्चे के भविष्य का ताना-बाना बुनना शुरू किया। लेकिन इस बार उसके मन में कोई खौफ या घुटन नहीं थी, क्योंकि उसे पता था कि जब तक एक माँ का मजबूत साया उसके साथ है, दुनिया की कोई भी चुनौती उसे हरा नहीं सकती।
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लेखिका : कुसुम भार्गव