संदूक में रखा सपना सिल्क की प्लेन बॉर्डर वाली साड़ी… – लतिका श्रीवास्तव

मां कहां हो जोर से आवाज लगाती नंदिनी बैठक से होते हुए अंदर वाले कमरे तक पहुंच गई… लेकिन मां के कमरे के दरवाजे पर ही ठिठक गई उसने देखा मां अपना संदूक खोले बैठी है उसकी तरफ मां की पीठ थी

नंदिनी की समझ में नहीं आया कि मां इस समय यहां बैठ कर संदूक क्यों खोले हुए है झांक कर देखा पीछे से उसने।मां के हाथों में  सिल्क की साड़ी थी जिसे बहुत आहिस्ता से अपने हाथों में थामे सहला रही थी और उसकी आँखें चमक रहीं थीं….

नंदिनी के लिए वह सिर्फ़ एक साड़ी नहीं थी, बचपन से देखा हुआ एक सपना थी।

वह ऐसे घर में पली-बढ़ी थी जहाँ ज़रूरतें बड़ी मुश्किल से पूरी होती थीं। उसकी माँ की अलमारी में बस कुछ सूती साड़ियाँ थीं। वही त्योहारों में पहन ली जातीं, वही रिश्तेदारी में और वही रोज़मर्रा के कामों में। रेशम या सिल्क उनके जीवन का हिस्सा नहीं था।

एक दिन नंदिनी के स्कूल का वार्षिकोत्सव था। नंदिनी ने बड़े आग्रह से माँ को बुलाया। माँ ने अपनी सबसे अच्छी, कई बार धुल-धुलकर मुलायम हो चुकी सूती साड़ी पहनी और स्कूल पहुँच गईं।

कार्यक्रम के बीच कुछ लोगों की धीमी फुसफुसाहट नंदिनी के कानों में पड़ी—

“लगता है इनके पास यही एक अच्छी साड़ी है…”

“बेटी के स्कूल में भी सूती साड़ी पहनकर आ गईं…”

शब्द धीमे थे, लेकिन तानों की चोट गहरी थी।

ये और गहरी तब हो गई जब उसने देखा, माँ अनजाने में बार-बार अपना पल्लू ठीक कर रही थीं। शायद उन्हें पहली बार अपनी साड़ी के कमतर होने का एहसास हुआ था।

उसी दिन नंदिनी ने मन-ही-मन संकल्प लिया—

“एक दिन मैं अपनी माँ के लिए सबसे महंगी सिल्क की साड़ी ज़रूर खरीदूँगी।”

समय बीतता गया। पढ़ाई, नौकरी, घर, ज़िम्मेदारियाँ… और फिर एक दिन उसने अपनी मेहनत की कमाई से माँ के लिए सबसे महंगी हल्की-सी प्लेन बॉर्डर वाली सिल्क की साड़ी खरीद ही ली।बढ़िया गिफ्ट पेपर में पैकिंग करवा कर उसने मां को गिफ्ट किया तो साड़ी देखकर माँ की आँखें भर आईं।

“मेरे लिए…?”

“हाँ माँ, सिर्फ़ आपके लिए।”

माँ ने साड़ी को सीने से लगाया, फिर बड़े जतन से तह करके पुराने संदूक में सबसे ऊपर रख दिया।

“इसे किसी बहुत खास मौके पर पहनूँगी।मेरी बेटी ने मेरा मान रखा सोच कर ही भावविहल हो गई।

उस दिन के बाद उनका एक नया नियम बन गया।

रोज़ एक बार जरूर संदूक खोलतीं, साड़ी को बाहर निकालतीं, हथेलियों से सहलातीं, उसकी चमक को निहारतीं और फिर उतने ही प्यार से वापस रख देतीं।

उनके चेहरे पर एक संतोष उतर आता—

“अब मेरे पास भी सिल्क की साड़ी है… अब कोई नहीं कहेगा कि मेरे पास रेशमी साड़ी नहीं है सोचते ही स्कूल के वार्षिकोत्सव का दिन याद आ जाता।

आज नंदिनी ने उन्हें यूँ ही साड़ी निहारते देख लिया।

वह पीछे से आई, प्यार से माँ के कंधे पर थपकी दी और मुस्कुराकर बोली—

“क्या माँ… ये साड़ी देखने के लिए बस नहीं है देखती ही रहोगी या पहनोगी भी?”

माँ सकुचा गईं।

“अरे बेटी… यह रोज़ पहनने की चीज़ थोड़े ही है। किसी बहुत खास अवसर पर पहनूँगी।”

जैसे ….कौन सा खास अवसर मां नंदिनी ने हंसकर पूछा।

अरे बेटी तेरी शादी पर पहनूंगी मां ने हुलस कर कहा।

नंदिनी ने साड़ी उठाई और माँ के हाथों में थमा दी।

“जाइए… अभी पहनकर आइए अधिकार से कहा।

“अभी? बिना किसी वजह?”मां हिचक गईं।

“वजह है न माँ…”उसने हँसते हुए कहा—

“आप साड़ी पहनकर आइए। मैं तब तक बढ़िया वाली अदरक-इलायची की चाय बनाकर लाती हूँ। बाहर बगीचे में कुर्सियाँ लगा रही हूँ। आज हम दोनों वहीं बैठकर चाय पिएँगे। आज कोई मेहमान नहीं आएगा… आज हम खुद अपने सबसे खास मेहमान हैं।”

कुछ सोच मां साड़ी लेकर कमरे में चली गईं और कुछ देर बाद  सिल्क की साड़ी पहनकर बाहर आईं।

शाम की सुनहरी धूप में उनका चेहरा किसी दुल्हन की तरह खिल उठा था।

अरे वाह मां आपके ऊपर ये साड़ी कितनी फब रही है बहुत खूबसूरत आइए आइए यहां बैठिए नंदिनी ने खड़े होते हुए झट से कुर्सी उनकी ओर बढ़ाई और चाय का कप भी ….और देर तक उन्हें निहारती रही। मां मुस्कुरा रही थीं और वो मुस्कान भी अद्भुत थी दिल की गहराइयों से छलकती खुशी की अभिव्यक्ति थी।जैसे आज उसने उन सब तानों का जवाब दे दिया हो ।

उस दिन न कोई शादी थी…

न कोई त्योहार…

न कोई समारोह…

फिर भी वह दिन दोनों के जीवन का सबसे खूबसूरत दिन बन गया।चाय का हर घूंट आनंद के अतिरेक से इतना लबालब था कि शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ी।

नंदिनी ने महसूस किया—

संदूक में सिल्क की साड़ी नहीं रखी थी… एक सपना तह करके रखा था।

माँ का इत्ता-सा ख़्वाब…जो आज हकीकत बन गया था।आज किसी को दिखाने की जताने की कोई इच्छा ही शेष नहीं रह गई थी।आत्मसंतोष की आभा हावी थी।

और उस दिन माँ ने भी समझ लिया—

खास अवसर कभी अपने आप नहीं आते… उन्हें अपने हाथों से रचना पड़ता है।आख़िर एक सिल्क की साड़ी की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी कीमत में नहीं, बल्कि उसे पहनकर जी लिए गए उन पलों में होती है, जिन्हें हम जीवन भर याद रखते हैं।  

लतिका श्रीवास्तव 

सिल्क की साड़ी# कहानी प्रतियोगिता 

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