दिल के रिश्ते

“अनन्या, उठो। लगता है नीचे अंकल की तबीयत ज्यादा खराब है,” सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को जगाते हुए कहा। दोनों दौड़कर नीचे गए। देवकी जी ने रोते हुए दरवाजा खोला। अंदर रमाकांत जी सीने पर हाथ रखे सोफे पर गिरे हुए थे और उन्हें सांस लेने में भयंकर तकलीफ हो रही थी। उनका चेहरा पसीने … Read more

दिखावटी आज़ादी

“क्या हुआ रोहन? तुम इतने हाइपर क्यों हो रहे हो? मैं यहाँ…” “मैंने कहा अभी घर आओ! अगर अगले बीस मिनट में तुम घर पर नहीं हुई, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” फोन कट गया। मेघना का दिल बैठ गया। उसने कभी रोहन को इस कदर गुस्से में नहीं देखा था। वह अपना बैग … Read more

स्वाभिमान

लेकिन आज सुमित वह पुराना, डरा हुआ और संकोची इंसान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और दृढ़ता थी। सुमित ने आगे बढ़कर विनम्रता से हाथ जोड़े और बेहद शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, “भैया, आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमें वापस इस बड़े घर में बुलाने के लायक … Read more

अकेलापन

कमरे में खामोशी इतनी गहरी थी कि दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी हथौड़े की चोट की तरह महसूस हो रही थी। विक्रम बेड के किनारे बैठा था, उसके हाथों में एक अस्पताल की फाइल थी और उसकी नजरें सामने ड्रेसिंग टेबल के पास खड़ी काव्या पर टिकी थीं। काव्या अपने … Read more

मेरी बेटियां बोझ नहीं है

“भाभी, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी बच्चियों को इस तरह मनहूस और बोझ कहना बंद कर दीजिए। जब मुझे और इनके पिता को इनका कोई भार नहीं लगता, तो आप लोग क्यों इनके भविष्य की चिंता में अपना खून जला रही हैं?” सुमेधा ने अपनी तीन छोटी-छोटी बेटियों को सीने से चिपकाते … Read more

गिरवी रखा हुआ मकान

“पापा कहाँ हैं माँ?” घर की दहलीज पर कदम रखते ही सुमित ने अपनी माँ, सुलोचना जी से पूछा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी थकावट और आँखों में एक छिपी हुई उलझन थी। सुलोचना जी बरामदे में बैठी स्वेटर बुन रही थीं। उन्होंने सुमित की आवाज़ सुनकर एक बार नज़र उठाई, लेकिन अगले ही … Read more

अपनों का साथ ही सबसे बड़ी दौलत है – हिमानी बंसल

“रिश्ते अपने आप नहीं टूटते। वे तब टूटते हैं जब बात करना बंद हो जाता है, एक-दूसरे को समझना बंद हो जाता है और ‘मैं’ की जगह ‘हम’ खो जाता है।” नैना बचपन से ही मेधावी, आत्मविश्वासी और स्पष्टवादी थी। वह हर बात साफ़-साफ़ कहती थी। उसका उद्देश्य कभी किसी का दिल दुखाना नहीं होता … Read more

कब तक आत्मसम्मान खोकर जीऊँ – मंजू ओमर

विवेक मुझे ₹200 दे देना ऑफिस जाने से पहले इतना कह के काजल विवेक का खाना पैक करने लगी । और जब विवेक का ऑफिस जाने के लिए कमरे से बाहर आया तो काजल ने उसका टिफिन देते हुए बोली विवेक वह ₹200 दे दो मुझे जाने से पहले। अरे क्या है यह रोज तुम … Read more

*भगवान के घर देर है पर अंधेर नही* – तोषिका

“क्या हुआ बेटा, ऐसे रो क्यों रहा है?” सुनीता ने अपने बेटे अंश से पूछा। अंश ने बोला “कुछ नहीं मा, बस ऐसा लग रहा है कि जिंदगी साथ नहीं दे रही है।” “ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा है क्या?” उसकी मां ने अंश के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला। नहीं मा … Read more

 सच्चे धागे

विशाखा जब से अनुराग के घर ब्याह कर आई थी, पूरे घर में अक्सर उसी के स्वभाव की चर्चा दबी जुबान में होती रहती थी। विशाखा एक बहुत ही शांत, गंभीर और कम बोलने वाली लड़की थी। वह पेशे से एक बैंक अधिकारी थी और उसे फालतू की गपशप, मोहल्ले की औरतों के साथ बैठकर … Read more

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