रमा दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी। एक माँ के इस दर्द ने उसके दिल को चीर कर रख दिया। उसी पल रमा ने एक ऐसा फैसला लिया जो कोई सगा भी शायद ही लेता। उसने तय किया कि जब तक ‘माजी’ (सावित्री देवी) ठीक नहीं हो जातीं, वह उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएगी। रमा ने अपने बाकी के तीनों घरों का काम छोड़ दिया, यह जानते हुए भी कि इससे उसकी कमाई आधी से भी कम हो जाएगी और बच्चों का पेट पालना मुश्किल हो जाएगा।
शहर के सबसे पॉश इलाके में बने ‘आनंद भवन’ में सब कुछ था—महंगी गाड़ियां, नौकर-चाकर और ऐशो-आराम की हर चीज़। अगर कुछ नहीं था, तो वह थी अपनों की आहट। इस विशाल बंगले की मालकिन, पैंसठ वर्षीय सावित्री देवी, पिछले कई सालों से यहाँ अकेली ही रह रही थीं। उनके पति का देहांत हुए एक अरसा बीत चुका था और उनका इकलौता बेटा, कुणाल, अमेरिका में बस गया था। सावित्री देवी के लिए अब उनका घर सिर्फ एक ईंट-पत्थर का ढांचा रह गया था, जिसे सँभालने के लिए उन्होंने कुछ नौकर रखे हुए थे। इन्हीं में से एक थी रमा।
रमा एक बेहद गरीब लेकिन स्वाभिमानी महिला थी। तीन साल पहले एक हादसे में उसके पति की मौत हो गई थी, जिसके बाद अपने दो छोटे बच्चों—सात साल के आर्यन और पांच साल की मीठी—की जिम्मेदारी पूरी तरह से रमा के कंधों पर आ गई थी। वह सुबह से शाम तक चार घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन का काम करती, तब जाकर उसके घर का चूल्हा जल पाता था। सावित्री देवी के घर का काम भी रमा ही करती थी। वह चुपचाप अपना काम करती और चली जाती।
एक दिन अचानक मौसम बदला और सावित्री देवी को तेज बुखार ने घेर लिया। उम्र के इस पड़ाव पर बुखार ने उनके शरीर को पूरी तरह तोड़ दिया। हालत इतनी खराब हो गई कि उनका बिस्तर से उठना भी मुहाल हो गया। जब दो दिन तक सावित्री देवी कमरे से बाहर नहीं आईं, तो रमा ने घबराकर कमरे का दरवाजा खटखटाया। अंदर जाकर देखा तो सावित्री देवी बुखार में तप रही थीं और दर्द से कराह रही थीं। रमा ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें निमोनिया हो गया है और उन्हें 24 घंटे देखभाल की जरूरत है।
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से अमेरिका में अपने बेटे कुणाल को फोन मिलाया। फोन उठते ही उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े, “बेटा, मेरी तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर ने कहा है कि हालत गंभीर है। क्या तू कुछ दिनों के लिए यहाँ आ सकता है?”
दूसरी तरफ से कुणाल की रुखी आवाज़ आई, “माँ, आप भी ना! बिना बात के परेशान होती हैं। मैं यहाँ एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ, मेरा अभी इंडिया आना बिल्कुल नामुमकिन है। आप ऐसा करो, किसी नर्स को रख लो। मैं पैसे ट्रांसफर कर दूंगा।” यह कहकर कुणाल ने फोन काट दिया। सावित्री देवी का दिल टूट गया। जिस बेटे को उन्होंने अपनी छाती से लगाकर पाला था, आज जब उन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तो उसने पैसों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगीं।
रमा दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी। एक माँ के इस दर्द ने उसके दिल को चीर कर रख दिया। उसी पल रमा ने एक ऐसा फैसला लिया जो कोई सगा भी शायद ही लेता। उसने तय किया कि जब तक ‘माजी’ (सावित्री देवी) ठीक नहीं हो जातीं, वह उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएगी। रमा ने अपने बाकी के तीनों घरों का काम छोड़ दिया, यह जानते हुए भी कि इससे उसकी कमाई आधी से भी कम हो जाएगी और बच्चों का पेट पालना मुश्किल हो जाएगा।
अगले कुछ हफ्तों तक रमा ने सावित्री देवी की वो सेवा की जो शायद एक सगी बेटी भी न कर पाती। वह रात-रात भर उनके सिरहाने बैठी रहती, उनके लिए सूप बनाती, समय पर दवाइयां देती और स्पंज से उनका बदन पोंछती। सावित्री देवी को जब भी रात में दर्द के मारे नींद नहीं आती, रमा उनके पैर दबाती और उन्हें ढांढस बंधाती।
एक दिन सावित्री देवी को थोड़ा होश आया और उन्होंने दर्द भरी आवाज़ में रमा से पूछा, “रमा, तू दिन-रात मेरी सेवा में लगी रहती है। तेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं, उन्हें कौन देखता होगा? तू उनके पास क्यों नहीं जाती?”
रमा ने एक फीकी लेकिन संतोष भरी मुस्कान के साथ कहा, “माजी, आप उसकी चिंता मत कीजिए। मैंने आर्यन और मीठी को समझा दिया है कि उनकी एक और दादी हैं जिनकी तबीयत बहुत खराब है, और अभी उन्हें मेरी ज्यादा जरूरत है। बच्चे समझदार हैं माजी, आर्यन अपनी छोटी बहन का ख्याल रख लेता है। मैं दिन में एक बार जाकर उन्हें खाना दे आती हूँ। वे घर में अकेले खेल लेते हैं। आप बस जल्दी से ठीक हो जाइए।”
रमा की बातें सुनकर सावित्री देवी की आँखें भर आईं। एक तरफ उनका सगा बेटा था जिसे अपनी माँ के मरने-जीने की कोई फिक्र नहीं थी, और दूसरी तरफ यह गरीब औरत थी जो अपनी रोजी-रोटी और बच्चों को दांव पर लगाकर उनकी जान बचाने में लगी थी।
महीने भर की अनवरत सेवा और देखभाल के बाद आखिरकार सावित्री देवी पूरी तरह से स्वस्थ हो गईं। डॉक्टर ने भी कहा कि अगर रमा ने इतनी लगन से उनकी देखभाल न की होती, तो शायद सावित्री देवी का बचना मुश्किल था।
एक सुबह जब रमा सावित्री देवी को नाश्ता देकर जाने लगी, तो सावित्री देवी ने उसे रोक लिया। उन्होंने रमा का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास पलंग पर बैठा लिया। सावित्री देवी की आँखों में आज एक अजीब सी चमक और कृतज्ञता थी।
“रमा,” सावित्री देवी ने भारी गले से कहा, “मेरी मुसीबत के समय जब मेरे अपने खून ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था, तब तूने मेरे लिए जो किया है, उसका कर्ज मैं सात जन्मों में भी नहीं उतार सकती। तूने एक नौकरानी बनकर नहीं, बल्कि एक बेटी बनकर मेरी जान बचाई है। आज मैं तुझे कुछ देना चाहती हूँ।”
रमा ने संकोच करते हुए अपने हाथ पीछे खींच लिए, “नहीं माजी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने जो किया वो तो इंसानियत के नाते किया था। आप ठीक हो गईं, मेरे लिए बस यही बहुत है। आप मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।”
सावित्री देवी मुस्कुराईं और उन्होंने अपने तकिए के नीचे से एक फाइल निकाली। “मुझे पता था तू यही कहेगी पगली। लेकिन मैं तुझे कोई इनाम या दया नहीं दे रही हूँ। यह मेरा मेरी बेटी और मेरे नाती-पोतों के लिए प्यार है।”
सावित्री देवी ने वह फाइल रमा के हाथों में थमा दी। “इसमें दो कागज़ हैं रमा। एक, तुम्हारे दोनों बच्चों—आर्यन और मीठी—के नाम से एक फिक्स्ड डिपॉजिट है, ताकि उन्हें कभी पैसों के लिए अपनी पढ़ाई न छोड़नी पड़े। और दूसरा कागज़… मैंने इस बंगले के पीछे वाले हिस्से (एनेक्सी) को हमेशा के लिए तुम्हारे नाम कर दिया है। अब तुम उस टूटी हुई बस्ती में नहीं रहोगी। तुम अपने बच्चों के साथ यहीं मेरे पास रहोगी… हमेशा के लिए। और हाँ, आज से तू इस घर की नौकरानी नहीं है। आज से तू मेरी बेटी है।”
रमा अवाक रह गई। उसके हाथ कांप रहे थे और आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह फफक कर सावित्री देवी के गले लग गई। उस बड़े से घर में आज सालों बाद किसी के रोने की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन ये दुख के नहीं, बल्कि दो अजनबी दिलों के एक होने के आँसू थे। सावित्री देवी को उनकी खोई हुई ममता वापस मिल गई थी और रमा को एक माँ का साया। खून के रिश्ते भले ही हार गए थे, लेकिन इंसानियत और सेवा के रिश्ते ने आज एक नई मिसाल कायम कर दी थी।
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