प्रतीक्षा के वो अनकहे पन्ने

“काव्या, मेरी बात एक बार गौर से सुन लो। मैं तुम्हारे लिए अपनी ज़िंदगी की आखिरी सांस तक इंतज़ार कर सकता हूँ। लेकिन इस दिल में तुम्हारे सिवा कोई और कभी जगह नहीं ले पाएगा, यह मेरा वादा है।” मेज पर रखी कॉफी की प्याली को बिना छुए ही रजत वहाँ से उठकर चला गया।  … Read more

लौट कर आई दुआ

शहर के जाने-माने रिटायर्ड बैंक अधिकारी सुधीर बाबू अपनी ईमानदारी और दरियादिली के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर थे। उनके दरवाजे से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। किसी की बेटी की शादी हो, किसी के बच्चे की फीस भरनी हो या किसी के इलाज का खर्च उठाना हो, सुधीर बाबू हमेशा अपनी हैसियत … Read more

अनकहा रिश्ता

 मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी। “हमारा पड़ोसी है ना रोहन… वो हमारी बहुत मदद करता है।” आंटी के ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं? मैं उनकी मदद करता था? मैं तो वो इंसान था जो उनसे बचने के लिए सीढ़ियों में छिप जाता था। मैं वो था जो उन्हें अपना … Read more

खामोशियों का नेटवर्क

कावेरी ने एक गहरी ठंडी सांस छोड़ी। “आजकल के बच्चों का प्यार भी इन मशीनों के अंदर ही कैद होकर रह गया है। ये साथ बैठकर बातें नहीं करते, एक-दूसरे को ‘टैग’ करते हैं। इनकी रूठने-मनाने की प्रक्रिया भी ‘ब्लॉक’ और ‘अनब्लॉक’ तक सीमित हो गई है। हमारी तरह छोटी-छोटी बातों पर रूठना, और फिर … Read more

प्यार की अनकही रेसिपी

क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि तुम एक ‘औरत’ का काम कर रहे हो? या शिखा तुम पर हुक्म चला रही है?” समीर ने झिझकते हुए वह सवाल पूछ ही लिया जो उसके मन में अटका था। अभिनव ज़ोर से हंस पड़ा। उसकी हंसी में कोई बनावट नहीं थी। “औरत का काम? खाना पकाना … Read more

शाम की गुनगुनी धूप

 “ये आप क्या कर रहे हैं? इस उम्र में आकर हाथ जोड़ने शोभा नहीं देते। पति-पत्नी का रिश्ता तो एक गाड़ी के दो पहियों जैसा होता है। कभी एक पहिया घिस जाता है, तो दूसरा उसका भार सँभाल लेता है। इसमें माफी कैसी?” सावित्री की आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था। “और वैसे भी, … Read more

एक पिता का प्रायश्चित: जब न्याय ने ली रिश्तों की जगह

“हाँ, मैंने गलती की। मैं धन बटोरने में अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है।” रघुनाथ जी का गला रुंध गया। “लेकिन सबसे बड़ा पाप जो हमने किया है, वह विक्रम को बिगाड़ना नहीं है। वह पाप है इस मासूम लड़की मीरा की जिंदगी बर्बाद करना। याद है तुम्हें? जब विक्रम … Read more

खामोश बुनियाद

“अरे रूचि, खुशकिस्मत तो ये हैं कि इन्हें मेरे जैसा पति मिला,” विक्रांत ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, “वर्ना सोचो, किसी और से शादी होती तो आज भी किसी दो कमरों के फ्लैट में बर्तन मांज रही होतीं। ये तो मेरा विजन है, मेरी मेहनत है, जो आज ये महारानियों की तरह इस … Read more

धूप, चाय और वो पुरानी बेंच

रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।” मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो … Read more

अदृश्य रक्षक: बंद दरवाजों का दर्द

 “भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया। लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में … Read more

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