रिश्तों की जमा पूंजी – सुदर्शन सचदेवा
शहर के एक छोटे से घर में रहने वाले किशन जी अक्सर कहा करते थे, “बैंक की जमा पूंजी कभी भी खत्म हो सकती है, लेकिन रिश्तों की जमा पूंजी जितनी बाँटो, उतनी ही बढ़ती जाती है।” उनका एक बेटा था सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। फिर भी किशनजी की सबसे बड़ी खुशी धन-दौलत … Read more