अधूरा दिल

बनारस के घाटों पर शाम की आरती की गूंज और उन सीढ़ियों पर बैठे दो युवा दिल—राधिका और कबीर। उन दोनों की दुनिया एक-दूसरे से शुरू होकर एक-दूसरे पर ही खत्म होती थी। कबीर एक उभरता हुआ चित्रकार था, जिसके पास सपनों का एक बड़ा आसमान था, लेकिन हकीकत की जमीन अभी तक बंजर थी। दूसरी ओर, राधिका एक मध्यमवर्गीय और बेहद संस्कारी परिवार की बेटी थी। उसके पिता, रामनाथ जी, शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में हेडमास्टर थे, जिनका जीवन उसूलों और समाज में उनकी इज्जत के इर्द-गिर्द घूमता था। राधिका और कबीर ने साथ मिलकर अनगिनत सपने बुने थे। वे अक्सर गंगा किनारे बैठकर घंटों भविष्य की योजनाएं बनाते कि कैसे कबीर अपनी पहली प्रदर्शनी लगाएगा और कैसे वे दोनों रामनाथ जी को अपने रिश्ते के लिए राजी करेंगे। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

रामनाथ जी की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे अस्पताल पहुंच गए। इस विपदा की घड़ी में रामनाथ जी के एक पुराने मित्र, जो अब एक बड़े व्यापारी बन चुके थे, अपने बेटे सुशांत का रिश्ता लेकर अस्पताल पहुंचे। सुशांत एक सुलझा हुआ, जिम्मेदार और पारिवारिक मूल्यों को मानने वाला युवक था। रामनाथ जी ने अपनी गिरती हुई सांसों के बीच राधिका का हाथ अपने हाथों में लिया और कांपते हुए स्वर में कहा, “बेटी, मेरी अब कोई गारंटी नहीं है। मैं मरने से पहले तुझे सुशांत के साथ सात फेरे लेते देखना चाहता हूं। यही मेरी आखिरी इच्छा है।”

राधिका के लिए वह पल किसी वज्रपात से कम नहीं था। एक तरफ उसका वह प्यार था जिसके साथ उसने जीने की कसमें खाई थीं, और दूसरी तरफ जन्म देने वाले उस पिता की आखिरी ख्वाहिश, जो अस्पताल के बिस्तर पर मौत से लड़ रहा था। राधिका के भीतर एक भयंकर अंतर्द्वंद्व चल रहा था। कई रातों तक वह रोती रही। अंततः एक बेटी के फर्ज ने एक प्रेमिका के सपनों को हरा दिया। उसने अपने पिता की खुशी और उनकी गिरती सेहत के सामने घुटने टेक दिए। जिस दिन राधिका ने कबीर से आखिरी बार मुलाकात की, वह दिन बनारस की सबसे उदास शाम थी। कबीर की आंखों में सवाल थे और राधिका के होठों पर सिर्फ खामोशी और बेबसी।

रोते हुए राधिका ने कबीर की तरफ देखते हुए कहा था, “मैं हार गई कबीर। बाबूजी की हालत और उनकी आंसुओं से भरी आंखों के सामने मेरी एक न चली। मैं उनका दिल चीर कर अपनी खुशी का महल नहीं बना सकी। मुझे उम्मीद है कि तुम मेरे इस फैसले को समझोगे और मुझे इस कायरता के लिए कभी माफ कर दोगे।”

कबीर ने उस वक्त क्या जवाब दिया था, उसकी क्या प्रतिक्रिया थी, राधिका को आज ठीक से याद नहीं। बस कबीर की वो सूनी और वीरान आंखें उसे आज भी याद थीं। उस घटना की वह गहरी टीस कई महीनों तक, बल्कि सालों तक राधिका के मन-मस्तिष्क पर एक काले बादल की तरह छाई रही। उसे लगता था जैसे उसने अपने ही हाथों से अपनी आत्मा की हत्या कर दी हो।

शादी के बाद राधिका एक नए घर, एक नए शहर में आ गई। सुशांत का परिवार बहुत बड़ा था। भरा-पूरा संयुक्त परिवार, जिसमें सास-ससुर, जेठ-जेठानी और ननदें थीं। शुरुआत के कई महीने राधिका के लिए एक मशीन की तरह बीते। वह सुबह उठती, घर का सारा काम करती, सबकी पसंद का खाना बनाती और रात को थक-हार कर सो जाती। उसके चेहरे पर एक स्थायी खामोशी ने घर कर लिया था। सुशांत ने राधिका की इस खामोशी को महसूस किया। उसने कभी राधिका पर एक पत्नी होने का दबाव नहीं डाला, बल्कि एक दोस्त की तरह उसे समझने की कोशिश की।

समय के साथ राधिका ने खुद को अपने परिवार में पूरी तरह झोंक दिया। एक संस्कारी बहू के रूप में उसने हर जिम्मेदारी को बिना किसी शिकायत के उठाया। वह सुबह जल्दी उठकर अपनी सास के जोड़ों के दर्द की मालिश करती, अपने ससुर के चश्मे और उनकी नियमित दवाइयों का ध्यान रखती। जेठानी के साथ रसोई में हाथ बंटाते हुए उसने घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद को जान लिया था। जेठानी के बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर घर के छोटे-बड़े आयोजनों को संभालने तक, पूरे घर को राधिका ने एक मजबूत धागे में पिरो कर रख दिया था।

धीरे-धीरे, उसके इसी समर्पण और सेवा भाव ने सुशांत के पूरे परिवार का दिल जीत लिया। उसकी सख्त मिजाज सास भी अब राधिका के बिना एक पल नहीं रह पाती थीं और पूरे मोहल्ले में अपनी बहू की तारीफें करती नहीं थकती थीं। उसके ससुर उसे अपनी बहू नहीं बल्कि घर की लक्ष्मी मानते थे और घर का हर बड़ा फैसला राधिका से पूछकर ही लेते थे। जेठानी उसे अपनी छोटी बहन से भी ज्यादा प्यार करने लगी थी और अक्सर अपने मन की बातें उससे साझा करती थी।

सुशांत का निस्वार्थ प्रेम और परिवार का यह बेशुमार सम्मान राधिका के दिल पर लगे पुराने घावों के लिए मरहम का काम करने लगा। उसे यह एहसास होने लगा कि प्यार केवल एक व्यक्ति को पा लेने का नाम नहीं है, बल्कि अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना, और एक परिवार को जोड़ कर रखना भी प्रेम का ही एक विशाल और पवित्र रूप है। अगर वह उस दिन बगावत कर देती, तो शायद उसके पिता जीवित नहीं बचते और वह आजीवन एक अपराधबोध में जीती। आज उसके पिता स्वस्थ थे और समाज में गर्व से सिर उठाकर चलते थे।

सालों बाद, एक दिन सुशांत राधिका को शहर की एक मशहूर आर्ट गैलरी में ले गया। वहां एक बहुत बड़े चित्रकार की प्रदर्शनी लगी थी। जब राधिका ने वहां लगी तस्वीरों को देखा, तो उसके कदम ठिठक गए। वे तस्वीरें बनारस के घाटों की थीं और उनमें एक अजीब सा दर्द छिपा था। तभी उसकी नजर मंच पर खड़े उस चित्रकार पर पड़ी। वह कबीर था। कबीर अब एक सफल और मशहूर इंसान बन चुका था।

अचानक कबीर की नजर भीड़ में खड़ी राधिका पर पड़ी। दोनों की नजरें मिलीं। एक पल के लिए दोनों के आसपास की दुनिया जैसे थम गई। बनारस की उस उदास शाम की यादें ताज़ा हो गईं। लेकिन इस बार कबीर की उन आंखों में कोई शिकायत, गुस्सा या टीस नहीं थी। कबीर ने दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान के साथ राधिका का अभिवादन किया, मानो वह खामोशी में कह रहा हो कि ‘तुमने जो किया, वह सही था, मैं खुश हूँ कि तुम खुश हो।’

राधिका ने भी पलकें झुकाकर उस सम्मान को स्वीकारा और सुशांत का हाथ कसकर थाम लिया। वह समझ चुकी थी कि जीवन की किताब के कुछ पन्ने भले ही अधूरे छूट जाएं, लेकिन अगर बाकी की कहानी ईमानदारी और अपनों के प्रति समर्पण से लिखी जाए, तो वह किताब मुकम्मल ही कहलाती है। राधिका के मन में अब कोई पछतावा नहीं था; केवल एक ठहराव था, एक शांति थी, और अपने भरे-पूरे परिवार के प्रति एक अटूट प्रेम था।

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