शहर के एक छोटे से घर में रहने वाले किशन जी अक्सर कहा करते थे, “बैंक की जमा पूंजी कभी भी खत्म हो सकती है, लेकिन रिश्तों की जमा पूंजी जितनी बाँटो, उतनी ही बढ़ती जाती है।”
उनका एक बेटा था सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। फिर भी किशनजी की सबसे बड़ी खुशी धन-दौलत नहीं, बल्कि शाम को पूरे परिवार का एक साथ बैठकर हँसना-बोलना था।
हर सोमवार को अपने पोतो को बुलाकर कहानियाँ सुनाते। कहानी के अंत में हमेशा एक सीख होती—”रिश्ते निभाने पड़ते हैं, अपने आप नहीं चलते।”|
एक दिन किशन जी अचानक बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने आराम की सलाह दी। बहु पूरे मन से सेवा करने लगीं। दोनों पोते दादा जी के कमरे में बैठकर उन्हें हँसाने की कोशिश करते।
किशन जी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, “आज मुझे समझ आ गया कि मैंने जीवनभर सबसे सही निवेश किया था।”
बेटों ने हैरानी से पूछा, “पिताजी, कौन-सा निवेश?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने रिश्तों की जमा पूंजी बनाई है। बचपन से तुम्हें सिर्फ पढ़ाया-लिखाया नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करना, बड़ों का आदर करना, छोटे का हाथ थामना और परिवार को साथ लेकर चलना भी सिखाया। आज वही संस्कार ब्याज बनकर लौट रहे हैं।”
कुछ महीनों बाद किशन जी पूरी तरह स्वस्थ हो गए।
इसी दौरान पड़ोस में रहने वाले एक धनवान व्यक्ति का निधन हो गया। करोड़ों की संपत्ति थी, लेकिन अंतिम समय में उनके पास कोई अपना नहीं था। बेटे विदेश में थे और पड़ोसी ही अंतिम संस्कार की व्यवस्था कर रहे थे।
यह दृश्य देखकर किशन जी के पोते अंश ने पूछा, “दादाजी, उनके पास इतना पैसा था, फिर भी वे अकेले क्यों थे?”
किशन जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, पैसा घर बना सकता है, लेकिन परिवार नहीं। महँगे उपहार खरीदे जा सकते हैं, पर सच्चा अपनापन नहीं। रिश्तों में समय, विश्वास और प्रेम जमा करना पड़ता है। यही असली पूंजी है।”
उस दिन से बच्चों ने एक संकल्प लिया कि चाहे जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, परिवार के लिए समय अवश्य निकालेंगे।
वर्षों बीत गए। बच्चे बड़े हो गए। किसी ने बड़ा व्यवसाय संभाला, किसी ने ऊँची नौकरी पाई। लेकिन घर का एक नियम कभी नहीं बदला—हर सोमवार को पूरा परिवार एक साथ भोजन करता, सुख-दुख बाँटता और बड़ों का आशीर्वाद लेता।
एक दिन किशन जी ने अपनी पुरानी डायरी बच्चों को दी। उसके पहले पन्ने पर लिखा था—
“यदि कभी जीवन में धन और रिश्तों में से किसी एक को बचाने का अवसर आए, तो रिश्तों को चुनना। धन फिर से कमाया जा सकता है, लेकिन टूटे हुए रिश्ते जीवनभर मन को गरीब बनाए रखते हैं।”
डायरी पढ़ते-पढ़ते सबकी आँखें नम हो गईं।
उस दिन ् बेटे ने कहा, “पिताजी, आपने हमें ज़मीन-जायदाद से भी बड़ी विरासत दी है—संस्कारों की।”
किशन जी मुस्कुराए और बोले, “याद रखना, घर की दीवारें ईंटों से बनती हैं, लेकिन परिवार प्रेम, विश्वास, त्याग और सम्मान से बनता है। जब घर में एक-दूसरे की खुशी अपनी खुशी लगने लगे, एक-दूसरे का दुख अपना दुख महसूस होने लगे, तब समझना कि रिश्तों की जमा पूंजी समृद्ध हो रही है।”
समय का चक्र चलता रहा। किशन जी इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके संस्कार आज भी उस घर की सबसे बड़ी धरोहर बने हुए हैं।
आज भी जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं, तो किशन जी की बात अवश्य याद करते हैं—
“बैंक का खाता केवल जीवन चलाता है, लेकिन रिश्तों की जमा पूंजी जीवन को खूबसूरत बनाती है।”
रिश्ते प्रेम, विश्वास, सम्मान, त्याग और संस्कार से सींचे जाते हैं। धन की संपत्ति आने वाली पीढ़ियों को सुविधा दे सकती है, पर अच्छे संस्कार और स्नेह से भरे रिश्ते उन्हें जीवनभर सुख, सुरक्षा और अपनापन देते हैं। यही वह अमूल्य जमा पूंजी है, जो कभी घटती नहीं, बल्कि हर पीढ़ी के साथ और अधिक समृद्ध होती जाती है।
सुदर्शन सचदेवा