लौटते कदमों की आहट

 लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आई, लेकिन यह चमक सम्मान की नहीं, बल्कि एक तीखे सवाल की थी। उसने कहा, “तो फिर अंकल, जब आप इतने बड़े आदमी हैं, तो आपने इस भूखी बच्ची को दस रुपये का बिस्किट क्यों नहीं दिला दिया? आप तो बैठकर बस देखते रहे।” अंकल थोड़ा सकपका … Read more

एक अनकही विदाई

 “पापा… ये क्या हो गया? आपने बताया क्यों नहीं कि आपकी तबीयत खराब है? आपको कोई परेशानी थी तो मुझसे कहना चाहिए था, आख़िर मैं आपका बेटा हूँ!” अभिनव के आँसू श्रीनाथ जी के हाथों पर गिर रहे थे। श्रीनाथ जी ने एक बहुत ही फीकी, लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा। … Read more

कांच के रिश्ते और आभासी दुनिया

 रामेश्वर जी ने एक व्यंग्यात्मक लेकिन दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो दुख है बेटा। दुनिया तुम्हें श्रवण कुमार समझ रही है, लेकिन तुम्हारे माता-पिता यहाँ प्यासे बैठे हैं। तुमने लिखा कि ‘स्वर्ग माता-पिता के चरणों में है’, लेकिन इस घर में कदम रखे तुम्हें आठ घंटे हो गए हैं, और तुमने एक … Read more

डिग्रियों के बोझ तले दब गए रिश्ते

 सुशीला जी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, हमने उन्हें इतना पढ़ा दिया कि वे अब हर रिश्ते, हर भावना को नफे-नुकसान के तराजू पर तौलने लगे हैं। जब तक हम उनके काम आते रहे, बच्चों को संभालते रहे, तब तक हम अच्छे थे। लेकिन जैसे-जैसे हम बूढ़े हुए, बीमारियां बढ़ने लगीं, तो हम … Read more

रिश्तों का बाज़ार

आकाश और रिया के बीच दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोनों एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहने लगे। दोनों के बीच कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं था। एक दिन आकाश को रिया के फोन में उसके किसी पुराने दोस्त के साथ हुई कुछ ऐसी चैट्स मिल गईं जो उसे नागवार गुजरीं। उसने शराब … Read more

अहसास के धागे

मीनल यह सब देख और समझ रही थी। वह जानती थी कि एक नई लड़की को नए घर में ढलने में वक्त लगता है और कभी-कभी असुरक्षा की भावना हावी हो जाती है। घर की शांति भंग न हो और परिवार एक डोर में बँधा रहे, सिर्फ इसलिए मीनल चुपचाप काव्या की सारी गुस्ताखियों को … Read more

खामोश दर्द

कांता बुआ ने भी मुंह बनाते हुए जवाब दिया, “सही कह रही हो भाभी! आखिर बेटी तो बेटी ही होती है न। खून का रिश्ता है उसका। बहू तो पराये घर से आई है, उसे क्या दर्द होगा अपनी सास के मरने का। बस नाम का रोना-धोना भी नहीं कर रही।” पास ही बैठी एक … Read more

उड़ान खामोशियों की

अपनी आलीशान कांच की इमारत के सबसे ऊपरी माले पर बनी अपनी शानदार केबिन में, बाहर हो रही बारिश को देखते हुए अवनि ने अपनी ब्लैक कॉफ़ी का कप अभी होंठों से लगाया ही था कि उसके दिमाग के किसी कोने में पच्चीस साल पुरानी वो खौफनाक रात फिर से जिंदा हो उठी। वो रात … Read more

अस्तित्व की कीमत

समीर ने अपने चमचमाते जूतों के फीते बांधते हुए झल्लाहट भरी आवाज में कहा, “मीरा, मेरा नीला रूमाल कहां है? तुम दिन भर घर में रहकर एक काम ढंग से नहीं कर सकती? नाश्ते में नमक कम है और मेरी फाइल भी टेबल पर नहीं है।” मीरा, जो पसीने से लथपथ रसोई में बच्चों का … Read more

अनकहे जज्बात और माँ की पारखी नज़र

  रमा देवी गैस के पास खड़ी होकर अपने पच्चीस साल के बेटे कबीर के लिए टिफिन पैक कर रही थीं। डाइनिंग टेबल पर बैठे उनके पति, आनंद जी, अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अख़बार की सुर्ख़ियों में खोए हुए थे। घर का माहौल बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी भी आम मध्यमवर्गीय परिवार का … Read more

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