अनकहे जज्बात और माँ की पारखी नज़र

  रमा देवी गैस के पास खड़ी होकर अपने पच्चीस साल के बेटे कबीर के लिए टिफिन पैक कर रही थीं। डाइनिंग टेबल पर बैठे उनके पति, आनंद जी, अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अख़बार की सुर्ख़ियों में खोए हुए थे। घर का माहौल बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी भी आम मध्यमवर्गीय परिवार का … Read more

ममता की छाँव और स्वाभिमान

 रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी अपनी पंसदीदा किताब के कुछ पन्ने पलट कर बस सोने की ही तैयारी कर रही थीं। उनका यह पच्चीस सौ स्क्वायर फुट का दो मंजिला घर, जिसे उन्होंने अपने पति के गुजर जाने के बाद अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, अब उनकी एकांत दुनिया … Read more

अनकहे रिश्ते

 जब वह लाल जोड़े में सजी, रोते हुए गाड़ी में बैठ रही थी, तो उसकी नज़रें भीड़ में मुझे ही तलाश रही थीं, लेकिन मैं एक खंभे के पीछे छिप गया था। मैं उसे अलविदा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। आज उसकी शादी को छः महीने बीत चुके हैं। कल ही वह पहली … Read more

संस्कारों की कद्र

“सुषमा जी, देखिए हमारे पंडित जी ने कहा है कि अगले महीने की पंद्रह तारीख का मुहूर्त सबसे उत्तम है। इसके बाद तो सीधा छह महीने तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। हम चाहते हैं कि शादी इसी मुहूर्त में हो जाए। आखिर हमें भी तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देना होता है।” फोन के … Read more

पहली बारिश और वो अजनबी सा अपनापन

कमरे के अंदर बैठी स्नेहा अपने कपड़ों को सूटकेस में सहेज रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार खिड़की के बाहर गिरती बारिश की बूंदों पर जा टिकती थीं। उसकी शादी को अभी महज़ चार महीने ही हुए थे। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ … Read more

स्मृतियों की वसीयत

वैदेही की आंखें आंसुओं से सूज चुकी थीं और उसका सिर अपनी छाती तक झुका हुआ था। सामने बाबूजी क्रोध से कांप रहे थे। “तूने सोच भी कैसे लिया कि इस घर की बेटी उस साधारण से मास्टर के बेटे के साथ अपना जीवन बिताएगी? हमारी और उनके परिवार की जो पीढ़ियों पुरानी खटास है, … Read more

आँगन की वो गौरैया

यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा बाल-मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मौसी मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और रहने जा रही हैं। अगर शादी का मतलब बिछड़ना होता है, तो फिर शादी करनी ही क्यों? मैं दौड़कर मौसी के पास जाना चाहता था, उन्हें … Read more

ज़िंदगी का असली सुकून

अचानक काव्या के मन का सारा मलाल, सारा गुस्सा और सारी मायूसी एक झटके में कहीं बह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके तपते हुए मन पर सुकून की ठंडी फुहार डाल दी हो। जिस नौकरी को वह कुछ घंटों पहले एक बोझ समझ रही थी, आज उसी ने उसे वो खुशी दी थी … Read more

अपनों के आँसू

सुमित के ये शब्द मेरे कानों में सीसे की तरह पिघल कर गिर रहे थे। मैं कुछ जवाब देने ही वाला था कि तभी फ्लैट की घंटी बजी। सुमित ने उठकर दरवाज़ा खोला। मैं भी उसके पीछे-पीछे हॉल में आ गया। शिखा भी किचन से बाहर आ गई थी। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, … Read more

रेत के निशानों पर हौसले की उड़ान

गौरी, उम्र यही कोई पंद्रह बरस की रही होगी, लेकिन उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी समझ थी जो उम्र से बहुत पहले आ जाती है। राजस्थानी गाँव के उस रूखे और रेतीले माहौल में भी वह किसी खिले हुए पलाश के फूल जैसी लगती थी। साँवला सलोना रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें, और हवा में … Read more

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