अहसास के धागे

मीनल यह सब देख और समझ रही थी। वह जानती थी कि एक नई लड़की को नए घर में ढलने में वक्त लगता है और कभी-कभी असुरक्षा की भावना हावी हो जाती है। घर की शांति भंग न हो और परिवार एक डोर में बँधा रहे, सिर्फ इसलिए मीनल चुपचाप काव्या की सारी गुस्ताखियों को नजरअंदाज करती रही और घर का सारा बोझ अकेले ही ढोती रही।

लेकिन इंसान के धैर्य की भी एक सीमा होती है, और वह सीमा एक रविवार की दोपहर टूट गई।

उस दिन खाने की मेज पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। मीनल ने समीर की पसंद की मलाई कोफ्ता और गाजर का हलवा बनाया था। समीर ने जैसे ही हलवे का पहला चम्मच मुँह में रखा, उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं।

“वाह भाभी! सच में आपके हाथों में तो जादू है। मैं दुनिया के किसी भी बड़े होटल में खा लूँ, लेकिन आपके हाथ के बने इस हलवे और खाने का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। ऐसा स्वाद तो कहीं मिल ही नहीं सकता!” समीर ने पूरी गर्मजोशी से तारीफ की।

शहनाइयों की गूँज और अपनों की बधाइयों के बीच, काव्या ने अपने सजे-धजे लाल जोड़े में मदान परिवार की दहलीज पर अपना पहला कदम रखा। उसके पति, समीर के चेहरे पर एक ऐसी खुशी थी जो किसी से छिप नहीं रही थी। दरवाजे पर आरती की थाल लिए खड़ी थी उसकी जेठानी, मीनल। मीनल के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी और आँखों में एक नए रिश्ते का स्वागत करने की चमक। उसने अपनी देवरानी का स्वागत ऐसे किया जैसे वह अपने ही घर की बेटी हो। मदान परिवार में सास नहीं थीं, उनका देहांत कुछ साल पहले ही हो चुका था। घर में ससुर जी (दीनानाथ जी), जेठ (रोहित), जेठानी (मीनल), उनके दो प्यारे बच्चे और अब यह नया जोड़ा, समीर और काव्या थे।

मीनल पेशे से एक जानी-मानी ग्राफ़िक डिज़ाइनर थी, लेकिन अपनी सास के अचानक निधन के बाद उसने बाहर जाकर नौकरी करने का फैसला बदल दिया था। उसने घर से ही फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स लेना शुरू कर दिया था ताकि वह घर की जिम्मेदारियों और अपने करियर, दोनों के बीच एक सही तालमेल बिठा सके। मीनल की यही समझदारी और सूझबूझ मदान परिवार की सबसे बड़ी ताकत थी। घर का हर एक कोना, हर एक काम उसके कुशल हाथों से सँवरता था।

शुरुआती कुछ दिन तो काव्या के लिए किसी सपने जैसे रहे। नई नवेली दुल्हन होने के नाते उसे किसी काम को हाथ नहीं लगाना पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, काव्या को घर की असल तस्वीर साफ दिखने लगी। और वह तस्वीर उसे कुछ खास रास नहीं आई। घर में ससुर जी की सुबह की चाय से लेकर, समीर के ऑफिस की फाइलों तक, हर चीज़ के लिए घर में सिर्फ एक ही नाम गूँजता था—”मीनल!”

“मीनल बहू, मेरी बीपी की गोली कहाँ रखी है?” दीनानाथ जी आवाज लगाते।

“भाभी, मेरी वो नीली वाली शर्ट प्रेस हो गई क्या?” समीर अक्सर पूछता।

यहाँ तक कि घर में राशन क्या आएगा, शाम को खाने में क्या बनेगा, यह सब भी मीनल ही तय करती थी।

काव्या, जो अपने मायके में सबकी लाडली थी और हमेशा सबका ध्यान अपनी ओर खींचने की आदी थी, उसे यह सब बहुत खटकने लगा। उसे लगने लगा कि इस घर में उसकी तो कोई अहमियत ही नहीं है। उसे ऐसा महसूस होता जैसे वह इस घर की बहू नहीं, बल्कि कोई मेहमान है जिसकी यहाँ किसी को जरूरत ही नहीं है। यह एहसास धीरे-धीरे एक जलन में बदलने लगा।

दीनानाथ जी अक्सर जब खाना खाते, तो अगर काव्या ने कुछ बनाया होता और उसमें नमक कम या ज्यादा हो जाता, तो वे बहुत ही प्यार से समझाते, “काव्या बेटा, सब्जी का रंग और स्वाद कैसा होना चाहिए, यह एक बार अपनी मीनल भाभी से सीख लेना। उनके हाथों में तो जैसे अन्नपूर्णा का वास है।” ससुर जी की यह भोली सी बात काव्या के दिल में तीर की तरह चुभ जाती। उसे मीनल अब अपनी बड़ी बहन या जेठानी कम, और एक बड़ी प्रतिद्वंद्वी ज्यादा लगने लगी थी।

दूसरी ओर, मीनल के मन में ऐसा कोई भी मैल नहीं था। वह काव्या को अपनी छोटी बहन की तरह ही मानती थी। वह अक्सर काव्या को अपने पास बिठाती, घर के तौर-तरीके समझाती, ससुर जी की पसंद-नापसंद के बारे में बताती, लेकिन काव्या को उसकी हर बात में एक हुक्म नजर आता। उसे लगता कि मीनल अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए उसे नीचा दिखा रही है।

इस चिढ़ और जलन का असर काव्या के बर्ताव पर साफ दिखने लगा। उसने घर के कामों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। सुबह देर से उठना, अपने कमरे में ही ज्यादा वक्त बिताना और किसी से ज्यादा बात न करना उसकी आदत बन गई। बात यहाँ तक पहुँच गई कि जब मीनल के दोनों बच्चे खेलते हुए काव्या के कमरे की तरफ चले जाते, तो वह चिढ़कर उन्हें डाँट कर बाहर निकाल देती और अंदर से कुंडी लगा लेती। समीर जैसे ही ऑफिस के लिए निकलता, काव्या का कमरा अंदर से बंद हो जाता।

मीनल यह सब देख और समझ रही थी। वह जानती थी कि एक नई लड़की को नए घर में ढलने में वक्त लगता है और कभी-कभी असुरक्षा की भावना हावी हो जाती है। घर की शांति भंग न हो और परिवार एक डोर में बँधा रहे, सिर्फ इसलिए मीनल चुपचाप काव्या की सारी गुस्ताखियों को नजरअंदाज करती रही और घर का सारा बोझ अकेले ही ढोती रही।

लेकिन इंसान के धैर्य की भी एक सीमा होती है, और वह सीमा एक रविवार की दोपहर टूट गई।

उस दिन खाने की मेज पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था। मीनल ने समीर की पसंद की मलाई कोफ्ता और गाजर का हलवा बनाया था। समीर ने जैसे ही हलवे का पहला चम्मच मुँह में रखा, उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं।

“वाह भाभी! सच में आपके हाथों में तो जादू है। मैं दुनिया के किसी भी बड़े होटल में खा लूँ, लेकिन आपके हाथ के बने इस हलवे और खाने का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। ऐसा स्वाद तो कहीं मिल ही नहीं सकता!” समीर ने पूरी गर्मजोशी से तारीफ की।

समीर का इतना कहना था कि काव्या, जिसके अंदर पिछले कई हफ्तों से जलन का ज्वालामुखी खौल रहा था, वह अचानक फट पड़ा।

“जब भाभी के हाथ का खाना इतना ही पसंद था, तो मुझसे शादी क्यों की?” काव्या की तेज और तीखी आवाज ने डाइनिंग रूम के खुशनुमा माहौल को एक झटके में श्मशान जैसी शांति में बदल दिया। “उम्र भर इन्हीं के पल्लू से बंधे रहते और इन्हीं के हाथ का खाते रहते! मेरी क्या जरूरत थी इस घर में?”

मेज पर सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी के हाथ से चम्मच छूटकर प्लेट पर गिर पड़ा। रोहित हतप्रभ होकर काव्या को देख रहा था।

मीनल, जिसने समीर को हमेशा अपने छोटे भाई और एक बेटे की तरह प्यार किया था, इन शब्दों को सुनकर जैसे पत्थर की हो गई। उसके कानों पर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी निस्वार्थ ममता और सेवा को इतना गंदा और भद्दा रूप दिया जा सकता है। उसकी आँखों में आँसू छलक आए, लेकिन उसने अपनी गरिमा बनाए रखी और चुपचाप वहाँ से उठकर अपने कमरे में चली गई।

समीर भी सन्न रह गया था। लेकिन अगले ही पल उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि काव्या की सोच इतनी नीची हो सकती है।

“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा काव्या?” समीर ने गुस्से से मेज पर हाथ मारते हुए चिल्लाकर कहा। “भाभी मेरी माँ के समान हैं! तुमने इस रिश्ते की पवित्रता पर उंगली उठाकर अपनी घटिया सोच का परिचय दिया है। तुम्हें शर्म आनी चाहिए!”

काव्या को लगा था कि समीर उसका साथ देगा, लेकिन सबके सामने डांट पड़ने पर उसका झूठा अहंकार और आहत हो गया। वह भी रूठकर पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई और जोर से दरवाजा बंद कर लिया।

उस दिन के बाद से मदान परिवार का नक्शा ही बदल गया। मीनल ने बिना किसी से बहस किए या हंगामा किए, बहुत ही खामोशी से अपना एक कड़ा फैसला ले लिया। उसने समीर और काव्या से पूरी तरह दूरी बना ली।

अगले दिन से मीनल ने घर की रसोई का काम बाँट दिया। वह सिर्फ अपने ससुर, पति रोहित, अपने बच्चों और खुद का खाना बनाती। उसने समीर और काव्या के लिए नाश्ता या खाना बनाना बिल्कुल बंद कर दिया। उनके कपड़े धोना, प्रेस करना या उनके कमरे की सफाई, सब कुछ उसने छोड़ दिया। ससुर दीनानाथ जी और जेठ रोहित ने भी मीनल के इस फैसले का खामोशी से समर्थन किया, क्योंकि वे जानते थे कि काव्या ने जो कहा था, वह अक्षम्य था और उसे सबक मिलना जरूरी था।

अब काव्या के लिए असली मुसीबत शुरू हुई। उसे दिन में तारे दिखाई देने लगे। जो काव्या सुबह आराम से नौ बजे उठती थी, अब उसे समीर का टिफिन बनाने के लिए सुबह छह बजे उठना पड़ता था। रसोई में उसे न मसालों का पता था, न गैस के तापमान का अंदाजा। कभी रोटियां जलकर काली हो जातीं, तो कभी सब्जी में नमक इतना तेज हो जाता कि निगला न जाए।

समीर, जो पहले काम पर जाने से पहले एक खुशमिजाज इंसान हुआ करता था, अब अक्सर बिना खाए ही झल्लाते हुए ऑफिस चला जाता। उसे काव्या के हाथ का बेस्वाद खाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, और काव्या के पास इतना समय ही नहीं बचता था कि वह ठीक से तैयार होकर समीर के साथ दो पल सुकून से बिता सके।

कपड़े प्रेस करने से लेकर, कमरे की सफाई और रसोई के झंझटों ने काव्या को बुरी तरह थका दिया। कुछ ही दिनों में उसकी उंगलियां कट गईं, चेहरे की रौनक उड़ गई और सबसे बुरी बात—समीर और उसके रिश्ते के बीच एक गहरी, ठंडी खामोशी की दीवार खड़ी हो गई। रात को जब दोनों बिस्तर पर होते, तो दोनों अपनी-अपनी तरफ करवट लेकर सो जाते। समीर के दिल में अभी भी भाभी के अपमान की टीस थी, और काव्या अपनी शारीरिक और मानसिक थकान से टूट रही थी।

एक दिन, जब काव्या रसोई में पसीने से लथपथ होकर जली हुई दाल को ठीक करने की कोशिश कर रही थी, उसकी नजर हॉल में बैठी मीनल पर पड़ी। मीनल बहुत ही शांति से अपना लैपटॉप लिए बैठी थी, बच्चे उसके आस-पास खेल रहे थे और दीनानाथ जी चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे थे। उस तरफ एक सुकून था, एक ठहराव था।

अचानक काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पहली बार यह गहराई से अहसास हुआ कि जिस घर को चलाना उसे बहुत आसान लगता था, वह असल में कितना मुश्किल था। उसे समझ में आ गया कि मीनल भाभी ने कभी भी अपना रौब जमाने के लिए काम नहीं किया था, बल्कि वह तो इस पूरे परिवार की नींव थीं, जो सबके बोझ को अपने कंधों पर उठाए हुए थीं।

काव्या को अपनी उस घटिया सोच पर घिन आने लगी कि उसने एक ऐसी औरत पर शक किया और उसे ताना मारा, जिसने उसे कभी एक तिनका तक उठाने नहीं दिया था। उसे समझ में आ गया कि घर के लोगों के दिलों में अपनी जगह लड़-झगड़ कर, जिद करके या जलन की भावना रखकर नहीं बनाई जाती। असली जगह तो सेवा, त्याग और प्यार से बनती है, जो मीनल भाभी ने सालों की तपस्या से कमाई थी।

काव्या ने गैस बंद की। उसने अपने आँसू पोंछे और भारी कदमों से हॉल की तरफ चल दी। वह सीधे मीनल के पास गई और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।

“मुझे माफ कर दीजिए भाभी,” काव्या फफक-फफक कर रो पड़ी। “मैं बहुत बड़ी बेवकूफ थी। मैंने आपकी ममता को, आपके प्यार को गलत समझा। मुझे अहंकार हो गया था। पिछले पंद्रह दिनों में मुझे समझ आ गया है कि आप इस घर के लिए क्या हैं। प्लीज, मुझे अपनी छोटी बहन समझकर एक आखिरी बार माफ कर दीजिए। मैं वादा करती हूँ, अब कभी आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगी।”

मीनल, जिसका दिल मोम की तरह नर्म था, काव्या के इन आँसुओं को देखकर पिघल गई। उसने काव्या को उठाया और गले से लगा लिया। घर के कोने में खड़े समीर के चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान आ गई, क्योंकि वह जानता था कि अब यह घर, फिर से एक असली ‘घर’ बन गया था।

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 मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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