लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आई, लेकिन यह चमक सम्मान की नहीं, बल्कि एक तीखे सवाल की थी। उसने कहा, “तो फिर अंकल, जब आप इतने बड़े आदमी हैं, तो आपने इस भूखी बच्ची को दस रुपये का बिस्किट क्यों नहीं दिला दिया? आप तो बैठकर बस देखते रहे।”
अंकल थोड़ा सकपका गए। उन्होंने अपनी सफाई देते हुए कहा, “बेटा, तुम अभी छोटी हो, दुनियादारी नहीं समझती। मैंने अपनी सारी कमाई अपने बेटे के नाम कर दी है और सारा पैसा उसी के अकाउंट में रहता है। वह मुझे सिर्फ पेट्रोल और चाय के लिए कुछ पैसे देता है। अगर मैं इधर-उधर पैसे खर्च करूँगा और उसे पता चल गया, तो वह घर में बहुत क्लेश करता है, बुरा-भला कहता है। आज-कल के बच्चे मेरी तरह कहाँ हैं… उनमें तो कोई संस्कार ही नहीं बचे हैं।”
लड़की ने एक गहरी सांस ली। “अंकल, आप असल में कहाँ के रहने वाले हैं?”
मुंबई के मरीन ड्राइव पर शाम का वक़्त था। अरब सागर की लहरें किनारो से टकरा रही थीं और आसमान में सूरज सिंदूरी रंग बिखेर रहा था। मरीन ड्राइव के उस चौड़े फुटपाथ पर मैं खड़ा था, शहर की उस तेज़ रफ्तार और चमक को निहार रहा था जो किसी भी नए इंसान को अपनी तरफ खींच लेती है। मेरे गाँव की शांत और धीमी जिंदगी से यह कितनी अलग दुनिया थी! यहाँ हर तरफ चमचमाती गाड़ियाँ, ऊँची इमारतें और स्टाइलिश कपड़ों में सजे लोग थे। मुझे अपना यहाँ आने का फैसला बहुत सही लग रहा था। यह शहर, जिसे सपनों का शहर कहा जाता था, मुझे अपने आगोश में ले रहा था।
थोड़ी दूर पर कुछ युवा लड़के-लड़कियों का एक ग्रुप गिटार बजा रहा था और जोर-जोर से हँस रहा था। उन्हें देखकर मुझे लगा कि यहाँ कितनी आत्मीयता और खुशी है। लेकिन मेरी यह सोच अगले ही पल तब टूट गई, जब मैंने ट्रैफिक सिग्नल के पास एक छोटी सी सात-आठ साल की बच्ची को देखा। उसके कपड़े फटे हुए थे और बाल उलझे हुए थे। वह एक बड़ी सी मर्सिडीज कार की खिड़की खटखटाकर कुछ मांग रही थी।
अचानक कार का शीशा नीचे हुआ और अंदर बैठी एक सूट-बूट वाली महिला ने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा, “चल हट यहाँ से! रोज़ का यही नाटक है तुम भिखारियों का। पैदा करके छोड़ देते हैं सड़क पर लोगों को परेशान करने के लिए। जा कहीं और जाकर मर!” महिला ने ज़ोर से शीशा चढ़ा लिया। सिग्नल ग्रीन हुआ और वह गाड़ी रफ़्तार पकड़ते हुए आगे निकल गई। वह छोटी बच्ची सहम कर फुटपाथ की तरफ आ गई।
मुझसे रहा नहीं गया, मैं उस बच्ची के पास गया। “बेटा, तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं? तुम ऐसे गाड़ियों के बीच में क्यों घूम रही हो? कोई टक्कर मार देगा तो क्या होगा?” मैंने प्यार से पूछा।
उसने अपनी बड़ी-बड़ी और सहमी हुई आँखों से मुझे देखा और बोली, “बाबूजी, बहुत भूख लगी है। सुबह से कुछ नहीं खाया। बस एक बिस्किट का पैकेट दिला दो।”
मैं खुद एक छोटी सी नौकरी की तलाश में यहाँ-वहाँ भटक रहा था। मेरी जेब में कुल जमा पच्चीस रुपये बचे थे। मुझे दादर वापस जाने के लिए ट्रेन का टिकट लेना था। अगर मैं उसे कुछ खिलाता, तो मुझे मीलों पैदल चलना पड़ता। मैंने एक पल सोचा, फिर अपनी मजबूरी के आगे मेरी इंसानियत हार गई। मैंने उसे कुछ नहीं दिया और चुपचाप वहाँ से बस स्टॉप की तरफ बढ़ गया।
बस स्टॉप पर काफी भीड़ थी। मैं अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था, तभी मेरी नज़र फिर उसी बच्ची पर पड़ी। वह एक बूढ़ी औरत के पास ज़मीन पर बैठी थी, जो वहीं किनारे फल बेचती थी। वह बूढ़ी औरत उस बच्ची के सिर पर हाथ फेर रही थी और बच्ची लगातार रोए जा रही थी। तभी भीड़ में से एक कॉलेज जाने वाली लड़की, जिसने कंधे पर बैग लटका रखा था, उस बच्ची के पास गई। उसने अपने बैग से एक टिफिन निकाला, जिसमें से पराठे और सब्ज़ी निकालकर उस बच्ची के हाथ में रख दिए। बच्ची भूख से बेहाल थी, वह जल्दी-जल्दी खाने लगी।
यह नज़ारा देखकर पास ही बेंच पर बैठे एक सूट पहने हुए अधेड़ उम्र के सज्जन, जिन्हें देखकर लग रहा था कि वह किसी अच्छी कंपनी में बड़े पद पर होंगे, मुस्कुराए और बोले, “वाह बेटा! तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। आजकल की इस मतलबी दुनिया में तुम जैसी लड़कियाँ बहुत कम हैं। जिस घर में भी तुम जाओगी, उसे स्वर्ग बना दोगी।”
लड़की ने मुड़कर उन सज्जन को देखा। वह बहुत शांत थी। उसने पूछा, “अंकल, आप कहाँ जॉब करते हैं? आप तो काफी रईस लगते हैं।”
अंकल ने थोड़ा गर्व से सीना तानते हुए कहा, “बेटा, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर हूँ। हर महीने लाखों कमाता हूँ। मेरे पास बांद्रा में अपना फ्लैट है और दो गाड़ियाँ हैं।”
लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आई, लेकिन यह चमक सम्मान की नहीं, बल्कि एक तीखे सवाल की थी। उसने कहा, “तो फिर अंकल, जब आप इतने बड़े आदमी हैं, तो आपने इस भूखी बच्ची को दस रुपये का बिस्किट क्यों नहीं दिला दिया? आप तो बैठकर बस देखते रहे।”
अंकल थोड़ा सकपका गए। उन्होंने अपनी सफाई देते हुए कहा, “बेटा, तुम अभी छोटी हो, दुनियादारी नहीं समझती। मैंने अपनी सारी कमाई अपने बेटे के नाम कर दी है और सारा पैसा उसी के अकाउंट में रहता है। वह मुझे सिर्फ पेट्रोल और चाय के लिए कुछ पैसे देता है। अगर मैं इधर-उधर पैसे खर्च करूँगा और उसे पता चल गया, तो वह घर में बहुत क्लेश करता है, बुरा-भला कहता है। आज-कल के बच्चे मेरी तरह कहाँ हैं… उनमें तो कोई संस्कार ही नहीं बचे हैं।”
लड़की ने एक गहरी सांस ली। “अंकल, आप असल में कहाँ के रहने वाले हैं?”
अंकल के चेहरे पर एक उदासी छा गई। उनकी आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, “मैं राजस्थान के एक छोटे से गाँव से हूँ, बेटा। जब मैं पढ़ाई करने मुंबई आया था, तो यहीं की चमक में खो गया। यहीं नौकरी मिली, यहीं शादी की और फिर कभी लौटकर अपने गाँव नहीं गया। मुझे तो यह भी याद नहीं कि मेरे बूढ़े माँ-बाप आखिरी दिनों में कैसे दिखते थे। मैंने तो उनका मुँह तक नहीं देखा।”
यह सुनकर लड़की का चेहरा सख्त हो गया। उसकी आँखों में एक ज्वाला सी धधक उठी। “अंकल, फिर आपको संस्कारों की बात करने का कोई हक़ नहीं है!” लड़की ने कड़क आवाज़ में कहा, जिसे सुनकर आसपास खड़े कुछ लोग भी मुड़कर देखने लगे।
“आप कहते हैं कि आपके बेटे में संस्कार नहीं हैं। लेकिन संस्कार कोई बाजार में बिकने वाली चीज नहीं है, जिसे आप खरीद कर बच्चों को दे सकें। जो इंसान थोड़े से पैसों और अपनी सुख-सुविधाओं के लिए अपने माँ-बाप को भूल सकता है, जो उनके मरने पर उनके अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं जा सकता… उसे ऐसा ही बेटा मिलना चाहिए! अगर आपने अपनी जिंदगी में कभी किसी की मदद की होती, कभी अपने माँ-बाप की सेवा की होती, और आपका बेटा आपको ऐसा करते हुए देखता, तो आज आपको इस बस स्टॉप पर बैठकर दूसरों में संस्कार नहीं ढूँढने पड़ते।”
लड़की बिना रुके बोलती जा रही थी, “संस्कारों की दुहाई हमेशा वही लोग देते हैं, जिनके अपने दामन में कोई संस्कार नहीं होते। आपने जो बोया है, वही आप आज काट रहे हैं। उस बेचारी बच्ची को रोटी खिलाना मेरा फर्ज था, और आपका भी। लेकिन आपने अपनी इंसानियत को अपने बेटे के डर और अपने खोखले रुतबे के पीछे छिपा लिया।”
इतना कहकर वह लड़की वहाँ से तेज़ी से मुड़कर अपनी बस की तरफ चली गई।
अंकल वहीं बेंच पर बुत बने बैठे रह गए। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। वे लड़की की कड़वी, लेकिन सौ टका सच्ची बातों से अंदर तक हिल चुके थे। उन्होंने धीरे से मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें डबडबा गई थीं।
“काश…” उनकी आवाज़ कांप रही थी, “काश जब मैं जवानी में इस शहर आया था, तो मैंने सिर्फ सफलता और पैसे की तरफ अपने कदम नहीं बढ़ाए होते। काश मैंने दो कदम वापस अपने गाँव और अपने माँ-बाप की तरफ भी बढ़ाए होते… तो शायद आज मैं अंदर से इतना खोखला और बेबस नहीं होता।”
वे धीरे-धीरे उठे। उनके कदमों में एक भारीपन था। वे बड़बड़ा रहे थे, “बस दो कदम… जो हमें हमारी जड़ों से दूर ले जाते हैं और यही दो कदम हमें वापस इंसान बनाते हैं। शुक्रिया बेटा, तूने मेरी बंद आँखें खोल दीं।” वे नम आँखों से मुस्कराए और भीड़ में कहीं खो गए। मैं भी वहीं खड़ा रह गया, अपनी उस मजबूरी और अपने उन ‘दो कदमों’ के बारे में सोचता हुआ, जो मैंने उस बच्ची से दूर बढ़ाए थे।
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