सुशीला जी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, हमने उन्हें इतना पढ़ा दिया कि वे अब हर रिश्ते, हर भावना को नफे-नुकसान के तराजू पर तौलने लगे हैं। जब तक हम उनके काम आते रहे, बच्चों को संभालते रहे, तब तक हम अच्छे थे। लेकिन जैसे-जैसे हम बूढ़े हुए, बीमारियां बढ़ने लगीं, तो हम उनके लिए एक ‘बोझ’ और ‘खर्च’ बन गए। बड़े बेटे ने कहा कि उसके पास हमारे लिए समय नहीं है, छोटे बेटे ने कहा कि उसकी पत्नी को हमारा रहन-सहन पसंद नहीं है, और बेटी का कहना था कि उसकी अपनी ज़िंदगी है। वे हमें पैसे तो भेजना चाहते हैं, लेकिन अपने साथ रखना नहीं चाहते। उन्होंने हमें एक शानदार अपार्टमेंट में अकेले छोड़ दिया था, लेकिन वो घर नहीं, एक कब्रगाह थी जहाँ सिर्फ सन्नाटा था। जब हमने उनसे कहा कि हमें पैसे नहीं, तुम्हारा वक्त और प्यार चाहिए, तो उनका जवाब था कि ‘हम इतने पढ़े-लिखे और व्यस्त लोग हैं, हमारे पास इन फालतू की भावुकताओं के लिए समय नहीं है।’ अंततः हमने ही वो घर छोड़ दिया, क्योंकि जिस घर में सम्मान न हो, वहाँ रहना मौत से भी बदतर है।”
दिसंबर की सर्द रात अपने चरम पर थी। शहर के रेलवे स्टेशन के बाहर वाली सड़क पर सन्नाटा पसरने लगा था। कोहरे की सफेद चादर ने स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी को भी धुंधला कर दिया था। रघुवीर अपनी चाय की छोटी सी दुकान (टपरी) बढ़ाने की तैयारी कर रहा था। कोयले की भट्टी अब बुझने के कगार पर थी, लेकिन उसमें अभी भी इतनी आंच थी कि पास खड़े इंसान को थोड़ी राहत मिल सके। रघुवीर ने केतली को धोकर किनारे रखा ही था कि उसकी नज़र सड़क के उस पार स्टेशन के बाहर बनी एक ठंडी सीमेंट की बेंच पर पड़ी। वहाँ एक बुजुर्ग दंपत्ति सिकुड़े हुए बैठे थे। उनके पास दो बड़े सूटकेस और एक पुराना सा बैग रखा था। बुजुर्ग आदमी ने एक मफलर से अपने कान बांध रखे थे और महिला अपनी शॉल में खुद को समेटने की कोशिश कर रही थी। उनके चेहरों पर एक ऐसी गहरी उदासी और थकान थी जो सिर्फ सफर की नहीं हो सकती थी; वह जिंदगी से हार जाने वाली थकान लग रही थी।
रघुवीर का दिल पसीज गया। वह भट्टी से थोड़ी सी आग एक छोटे लोहे के तसले में निकालकर उनके पास ले गया। “बाबूजी, माताजी, यहाँ बहुत ठंड है। ये थोड़ी आग ताप लीजिए। मेरी चाय की दुकान बस सामने ही है।” रघुवीर ने तसला उनके पैरों के पास रखते हुए कहा। बुजुर्ग की आँखें भर आईं। उन्होंने कांपते हाथों से आग की तरफ हाथ बढ़ाए और धीमी आवाज़ में कहा, “जीते रहो बेटा। इस सर्द रात में तुमने जो गर्माहट दी है, वो शायद हमारे अपनों के नसीब में भी नहीं थी।”
रघुवीर को उनकी बातों में एक अजीब सी टीस महसूस हुई। उसने झिझकते हुए पूछा, “बाबूजी, आप लोग यहाँ इतनी रात को किसका इंतज़ार कर रहे हैं? कोई ट्रेन लेनी है क्या? या किसी रिश्तेदार को आना है? अगर कहिए तो मैं ऑटो बुलवा दूँ?”
बुजुर्ग महिला, जो अब तक खामोश थीं, अचानक फफक कर रो पड़ीं। उनके आंसुओं ने रघुवीर को विचलित कर दिया। बुजुर्ग आदमी ने अपनी पत्नी के कंधे पर हाथ रखा और एक गहरी आह भरते हुए बोले, “ट्रेन तो सुबह की है बेटा, लेकिन हम किसी का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं। हम तो बस इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि ये बची-खुची ज़िंदगी कब खत्म हो जाए। हम एक ऐसी जगह जा रहे हैं जहाँ से शायद फिर कभी लौट कर ना आएं… एक वृद्धाश्रम।”
रघुवीर वहीं ज़मीन पर बैठ गया। “वृद्धाश्रम? लेकिन क्यों बाबूजी? आप दोनों तो बहुत पढ़े-लिखे और संभ्रांत परिवार के लगते हैं। आपके बच्चे नहीं हैं क्या?”
बुजुर्ग ने एक फीकी और दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, “बच्चे हैं बेटा। दो बेटे हैं और एक बेटी। तीनों बहुत बड़े इंसान बन गए हैं। एक अमेरिका में बड़ा डॉक्टर है, दूसरा मुंबई में किसी मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट है, और बेटी भी लंदन में सेटल है। मेरा नाम नारायणकांत है। मैं एक सरकारी बैंक में बड़े पद पर था और मेरी पत्नी सुशीला कॉलेज में प्रोफेसर थीं। हमने अपनी पूरी ज़िंदगी, अपनी हर पाई अपने बच्चों को बनाने में लगा दी।”
रघुवीर हैरान था। “फिर आप दोनों यहाँ इस हाल में क्यों हैं? इतने बड़े और अमीर बच्चे होने के बाद भी आपको वृद्धाश्रम क्यों जाना पड़ रहा है?”
नारायणकांत जी की आँखों में अतीत के पन्ने पलटने लगे। उन्होंने कहा, “बेटा, हमने सोचा था कि बच्चों को दुनिया की सबसे बेहतरीन शिक्षा देंगे ताकि वे जीवन में कभी पीछे ना रहें। हमने उन्हें शहर के सबसे महंगे, सबसे नामी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाया। उनकी हर फरमाइश पूरी की। जब वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहते थे, तो मैंने अपना पुश्तैनी मकान तक बेच दिया। अपनी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा उनके एजुकेशन लोन चुकाने में लगा दिया। हमने अपनी ज़रूरतों को मार कर उन्हें वो सब कुछ दिया जो पैसे से खरीदा जा सकता था।”
सुशीला जी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, हमने उन्हें इतना पढ़ा दिया कि वे अब हर रिश्ते, हर भावना को नफे-नुकसान के तराजू पर तौलने लगे हैं। जब तक हम उनके काम आते रहे, बच्चों को संभालते रहे, तब तक हम अच्छे थे। लेकिन जैसे-जैसे हम बूढ़े हुए, बीमारियां बढ़ने लगीं, तो हम उनके लिए एक ‘बोझ’ और ‘खर्च’ बन गए। बड़े बेटे ने कहा कि उसके पास हमारे लिए समय नहीं है, छोटे बेटे ने कहा कि उसकी पत्नी को हमारा रहन-सहन पसंद नहीं है, और बेटी का कहना था कि उसकी अपनी ज़िंदगी है। वे हमें पैसे तो भेजना चाहते हैं, लेकिन अपने साथ रखना नहीं चाहते। उन्होंने हमें एक शानदार अपार्टमेंट में अकेले छोड़ दिया था, लेकिन वो घर नहीं, एक कब्रगाह थी जहाँ सिर्फ सन्नाटा था। जब हमने उनसे कहा कि हमें पैसे नहीं, तुम्हारा वक्त और प्यार चाहिए, तो उनका जवाब था कि ‘हम इतने पढ़े-लिखे और व्यस्त लोग हैं, हमारे पास इन फालतू की भावुकताओं के लिए समय नहीं है।’ अंततः हमने ही वो घर छोड़ दिया, क्योंकि जिस घर में सम्मान न हो, वहाँ रहना मौत से भी बदतर है।”
रघुवीर बहुत ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। वह भले ही ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन ज़िंदगी के फलसफे को उसने सड़क और समाज की पाठशाला में बहुत गहराई से सीखा था।
“बाबूजी,” रघुवीर ने बड़े सम्मान से कहना शुरू किया, “मैं तो बस आठवीं पास हूँ। दिन भर में चाय बेचकर चार-पांच सौ रुपये कमा लेता हूँ। मेरा एक छोटा सा कच्चा घर है बस्ती में। मेरे भी दो बच्चे हैं, जो पास के सरकारी स्कूल में जाते हैं। हम गरीब ज़रूर हैं, लेकिन जब मैं रात को घर जाता हूँ, तो मेरे बच्चे दौड़कर मेरे गले लग जाते हैं। मेरी पत्नी रुखी-सूखी जो भी बनाती है, हम सब एक साथ बैठकर खाते हैं। मेरे बूढ़े माता-पिता भी उसी छोटे से कमरे में हमारे साथ रहते हैं। मेरे बच्चों को शायद फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलनी नहीं आती, लेकिन उन्हें यह ज़रूर पता है कि दादा-दादी के पैर छूकर ही दिन शुरू करना चाहिए।”
नारायणकांत जी रघुवीर की बातें सुनकर एकटक उसे देखने लगे। रघुवीर ने आगे कहा, “बाबूजी, मुझे लगता है कि गलती बच्चों की भी पूरी तरह से नहीं है। गलती उस शिक्षा व्यवस्था की है जिसे हमने व्यापार बना दिया है। बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को किताबें तो रटा दी जाती हैं, लेकिन उन्हें इंसान बनना नहीं सिखाया जाता। वहाँ उन्हें बस एक ही रेस में दौड़ाया जाता है—’फर्स्ट आना है, सबसे बड़ा पैकेज लेना है, सबसे आगे निकलना है।’ इस अंधी दौड़ में वे पीछे मुड़कर देखना ही भूल जाते हैं।”
रघुवीर ने कोयले को थोड़ा और कुरेदा और बोला, “सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले या हम जैसे साधारण परिवारों के बच्चों को बचपन से ही अभाव पता होता है। वे मिट्टी में खेलते हैं, गली-मोहल्ले के हर इंसान से मिलते हैं। उन्हें पता होता है कि दुख क्या होता है, किसी के आंसू कैसे पोंछे जाते हैं। लेकिन जो बच्चे बचपन से ही वातानुकूलित (एसी) कमरों में पले-बढ़े हैं, जिन्होंने स्कूल से घर और घर से स्कूल के अलावा असली दुनिया देखी ही नहीं, वे दूसरों का दर्द कैसे समझेंगे? उनके लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ एक अच्छी नौकरी और बहुत सारा पैसा है। उन महंगे स्कूलों ने उन्हें मशीन बना दिया है बाबूजी, और मशीनों में भावनाएं नहीं होतीं।”
सुशीला जी ने गहरी सांस ली, “तुम बिल्कुल सच कह रहे हो बेटा। हमने उन्हें डिग्रियां तो दिला दीं, लेकिन संस्कार देना भूल गए। हमने उन्हें यह तो सिखाया कि आसमान कैसे छूना है, लेकिन यह सिखाना भूल गए कि ज़मीन पर पैर कैसे टिकाए रखने हैं। हमने उन्हें ‘सक्सेसफुल’ बनाया, लेकिन ‘इंसान’ नहीं बना पाए। आज के समाज का यही सबसे बड़ा कड़वा सच है। जो परिवार जितना ज्यादा शिक्षित और आधुनिक होने का दावा करता है, वहाँ रिश्ते उतने ही ज्यादा कच्चे और खोखले होते हैं। हर चीज़ को लॉजिक और प्रैक्टिकल होने के नाम पर तौला जाता है।”
“बिल्कुल माताजी,” रघुवीर ने कहा, “आजकल की पढ़ाई ने बच्चों को सिर्फ अपनी सुख-सुविधाओं का गुलाम बना दिया है। जब माता-पिता बच्चों को कहते हैं कि ‘हमने तुम्हारी पढ़ाई पर इतना पैसा खर्च किया है, तुम्हें बड़ा आदमी बनना है’, तो बच्चा भी उसी पैसे को अपनी ज़िंदगी का भगवान मान लेता है। उसे लगता है कि अगर उसने कमा कर माता-पिता को पैसे दे दिए, तो उसका फर्ज़ पूरा हो गया। लेकिन वो ये नहीं समझता कि माता-पिता को बुढ़ापे में पैसे नहीं, बल्कि अपने बच्चों का सहारा, उनका वक्त और वो दो मीठे बोल चाहिए होते हैं, जिनके लिए वे तरस जाते हैं।”
रात काफी गहरी हो चुकी थी। ठंडी हवा के झोंके अब और तेज़ हो गए थे। रघुवीर उठा और अपनी दुकान से एक कंबल लाकर उसने नारायणकांत जी और सुशीला जी को ओढ़ा दिया।
“बाबूजी, सुबह की ट्रेन में अभी बहुत वक्त है। आप लोग यहाँ इस ठंड में बीमार पड़ जाएंगे। मेरा गरीब खाना है, पास ही बस्ती में है। वहाँ कोई आलीशान बिस्तर तो नहीं मिलेगा, लेकिन एक सूखी ज़मीन और एक परिवार की गर्माहट ज़रूर मिलेगी। आप आज रात मेरे घर चलिए। सुबह मैं खुद आपको स्टेशन छोड़ जाऊंगा।” रघुवीर के स्वर में इतनी मिठास और अपनापन था कि नारायणकांत जी और सुशीला जी की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे।
नारायणकांत जी ने रघुवीर का हाथ पकड़ लिया और कांपती आवाज़ में बोले, “बेटा, आज तुमने साबित कर दिया कि असली दौलत और असली शिक्षा डिग्रियों में नहीं, बल्कि इंसान के दिल में होती है। हमारे पढ़े-लिखे बच्चों ने हमें सड़क पर छोड़ दिया, और तुम, जिसे समाज शायद एक मामूली चायवाला समझता है, तुमने हमें अपनों से भी बढ़कर सम्मान और आश्रय दिया।”
वे तीनों उस सर्द रात में रघुवीर के उस छोटे से घर की तरफ चल पड़े, जहाँ शायद पैसे की कमी थी, लेकिन रिश्तों की अमीरी कूट-कूट कर भरी थी। आज नारायणकांत जी को समझ आ गया था कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा में उनके बच्चे फेल हो गए थे, और ज़िंदगी की पाठशाला में पढ़ा यह चायवाला अव्वल दर्जे से पास हुआ था।
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