खामोश दर्द

कांता बुआ ने भी मुंह बनाते हुए जवाब दिया, “सही कह रही हो भाभी! आखिर बेटी तो बेटी ही होती है न। खून का रिश्ता है उसका। बहू तो पराये घर से आई है, उसे क्या दर्द होगा अपनी सास के मरने का। बस नाम का रोना-धोना भी नहीं कर रही।”

पास ही बैठी एक और दूर की चाची ने आग में घी डालते हुए कहा, “माना कि पराये घर की है, लेकिन सुमित्रा जी ने तो इसे कभी बहू नहीं, बेटी ही माना था। दस साल हो गए इस घर में आए हुए। कम से कम दुनिया को दिखाने के लिए ही चार घड़ियाली आँसू बहा लेती। आजकल की इन पढ़ी-लिखी बहुओं का दिल तो जैसे पत्थर का होता है। इन्हें अपने काम और अपनी जिंदगी के अलावा किसी से कोई लगाव नहीं होता। देखो कैसे चाय बनवा रही है जैसे घर में कोई उत्सव हो!”

दिसंबर की सर्द और ठिठुरती हुई रात थी। शहर के एक पुराने, लेकिन आलीशान घर में खामोशी छाई हुई थी। अनुपमा अपनी सास, सुमित्रा देवी और दो छोटे बच्चों—पाँच साल के कबीर और तीन साल की मायरा—के साथ घर में अकेली थी। अनुपमा के पति, समीर, अपनी कंपनी के एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के सिलसिले में पिछले तीन दिनों से बैंगलोर गए हुए थे। सुमित्रा देवी को वैसे तो कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, लेकिन उम्र के साथ होने वाली हल्की-फुल्की परेशानियां अक्सर उन्हें घेर लेती थीं। रात के लगभग दो बज रहे थे, जब अचानक सुमित्रा देवी के कमरे से खांसने और कराहने की तेज आवाजें आने लगीं।

अनुपमा गहरी नींद में थी, लेकिन एक माँ और एक बहू की सतर्कता ने उसे तुरंत जगा दिया। वह दौड़कर अपनी सास के कमरे में गई। सुमित्रा देवी सीने पर हाथ रखे हुए हांफ रही थीं। उनका चेहरा पसीने से भीग चुका था। अनुपमा के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने तुरंत बच्चों को उनके कमरे में सुलाए रखा और अपने पारिवारिक डॉक्टर को फोन मिलाया। रात का समय होने के कारण डॉक्टर को आने में थोड़ा वक्त लगा। इस बीच अनुपमा अपनी सास के हाथ-पैर मलती रही, उन्हें ढांढस बंधाती रही। डॉक्टर ने आते ही सुमित्रा देवी की जांच की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक खामोश दिल का दौरा सुमित्रा देवी के जीवन की डोर काट चुका था।

डॉक्टर के यह कहते ही कि “अब ये इस दुनिया में नहीं रहीं,” अनुपमा को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। वह सुमित्रा देवी के बेजान शरीर से लिपटकर चीख-चीख कर रोना चाहती थी। वह चाहती थी कि कोई उसे गले लगाए और कहे कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जैसे ही उसकी आँखों में आँसू छलकने को हुए, उसे दूसरे कमरे से अपनी छोटी बेटी मायरा के रोने की आवाज सुनाई दी। अनुपमा को तुरंत एहसास हुआ कि इस विशाल घर में वह बिल्कुल अकेली है। समीर हजारों किलोमीटर दूर है, और इन छोटे बच्चों और इस दुखद घड़ी में घर की सारी जिम्मेदारी उसी के कंधों पर है। उसने अपने आँसुओं को अपनी पलकों के पीछे ही कैद कर लिया। एक गहरी, कांपती हुई सांस ली और खुद को मजबूत किया।

सबसे पहले उसने समीर को फोन किया। समीर को यह मनहूस खबर देते हुए अनुपमा का गला रुंध गया, लेकिन उसने खुद को टूटने नहीं दिया। समीर ने कहा कि वह पहली फ्लाइट पकड़कर सुबह तक ही पहुंच पाएगा। इसके बाद अनुपमा ने पड़ोसियों को जगाया और रिश्तेदारों को फोन करना शुरू किया। रात के अंधेरे में ही घर में मातम का माहौल छा गया।

सुबह होते-होते घर के आंगन में सगे-संबंधियों और रिश्तेदारों की भीड़ जमा होने लगी। अनुपमा की ननद, राधिका, जो उसी शहर के दूसरे कोने में रहती थी, खबर मिलते ही बदहवास हालत में दौड़ी चली आई। दरवाजे से ही राधिका की चीखें और विलाप शुरू हो गया था। वह अपनी माँ के शव से लिपटकर ऐसे रो रही थी कि देखने वालों का कलेजा फट जाए। घर की अन्य महिलाएं राधिका को संभालने में लगी थीं, उसे पानी पिला रही थीं और ढांढस बंधा रही थीं।

और दूसरी तरफ अनुपमा थी। एक मशीन की तरह काम करती हुई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता थी। आँखें सूखी हुई थीं और वह हर वह काम कर रही थी जो उस वक्त जरूरी था। उसने बर्फ की सिल्लियां मंगवाईं ताकि समीर के आने तक शव को सुरक्षित रखा जा सके। अंतिम संस्कार के लिए बाँस, सफेद कपड़ा, फूल और अन्य सामग्री की व्यवस्था के लिए पड़ोसियों के साथ मिलकर पर्ची बना रही थी। जो दूर के रिश्तेदार आ रहे थे, उनके बैठने और चाय-पानी का इंतजाम भी वह खुद देख रही थी। बीच-बीच में वह अपने दोनों छोटे बच्चों को भी संभालती, जो घर में इतनी भीड़ और अपनी दादी को इस तरह लेटे देखकर सहम गए थे।

अनुपमा की इस खामोशी और व्यस्तता को देखकर घर के कोने में बैठी कुछ उम्रदराज महिला रिश्तेदारों के बीच कानाफूसी शुरू हो गई। अनुपमा की ताई सास, कांता बुआ के कान में फुसफुसाते हुए बोलीं, “अरे जरा इस अनुपमा को तो देखो! चेहरे पर शिकन तक नहीं है। एक आँसू नहीं गिरा अब तक इसकी आँख से, और उधर बेचारी राधिका को देखो, रो-रोकर हलकान हुई जा रही है, कई बार तो बेहोश हो चुकी है।”

कांता बुआ ने भी मुंह बनाते हुए जवाब दिया, “सही कह रही हो भाभी! आखिर बेटी तो बेटी ही होती है न। खून का रिश्ता है उसका। बहू तो पराये घर से आई है, उसे क्या दर्द होगा अपनी सास के मरने का। बस नाम का रोना-धोना भी नहीं कर रही।”

पास ही बैठी एक और दूर की चाची ने आग में घी डालते हुए कहा, “माना कि पराये घर की है, लेकिन सुमित्रा जी ने तो इसे कभी बहू नहीं, बेटी ही माना था। दस साल हो गए इस घर में आए हुए। कम से कम दुनिया को दिखाने के लिए ही चार घड़ियाली आँसू बहा लेती। आजकल की इन पढ़ी-लिखी बहुओं का दिल तो जैसे पत्थर का होता है। इन्हें अपने काम और अपनी जिंदगी के अलावा किसी से कोई लगाव नहीं होता। देखो कैसे चाय बनवा रही है जैसे घर में कोई उत्सव हो!”

ये सारी बातें अनुपमा के कानों तक पहुँच रही थीं। हर एक ताना उसके सीने में खंजर की तरह चुभ रहा था। उसका मन कर रहा था कि वह जाकर उन औरतों से कहे कि क्या उन्हें नहीं पता कि अंदर से वह कितनी टूट चुकी है? जिस सास ने उसे माँ से बढ़कर प्यार दिया, उसके जाने का दर्द उसे क्या कम होगा? लेकिन उसने अपने होंठ सिल लिए। वह जानती थी कि अगर इस वक्त वह टूट गई, अगर वह रोने बैठ गई, तो ये सारी व्यवस्थाएं कौन करेगा? बच्चों को कौन संभालेगा? समीर के आने तक घर का माहौल कौन शांत रखेगा? उसने अपने आँसुओं का घूंट पी लिया और चुपचाप अपने काम में लगी रही।

दोपहर के करीब समीर घर पहुंचा। अपनी माँ को इस हालत में देखकर वह बुरी तरह टूट गया और फूट-फूट कर रोने लगा। अनुपमा ने आगे बढ़कर समीर को संभाला, उसे ढांढस बंधाया। समीर के आते ही घर के पुरुषों ने अंतिम संस्कार की तैयारियां तेज कर दीं। पंडित जी आ गए और विधान शुरू हो गए। अनुपमा ने सुमित्रा देवी के अंतिम सफर के लिए उनके चेहरे को साफ किया, उन्हें सुहागिन के कपड़े पहनाए और उनके माथे पर आखिरी बार सिंदूर लगाया। यह सब करते हुए भी उसकी आँखें पथराई हुई थीं, लेकिन उनमें आँसू नहीं थे। कांता बुआ और ताई सास अभी भी तिरछी नजरों से उसे ही देख रही थीं और उसके इस ‘पत्थर दिल’ होने की आलोचना कर रही थीं।

वक्त आ गया था। पंडित जी के मंत्रोच्चार के बीच समीर और अन्य रिश्तेदारों ने अर्थी को कंधा दिया। जैसे ही अर्थी घर की चौखट से बाहर निकली, अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने वहां मौजूद हर इंसान को सन्न कर दिया।

अब तक एक चट्टान की तरह मजबूत खड़ी अनुपमा, अर्थी के चौखट पार करते ही धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ी। “माँ… मेरी माँ मुझे छोड़कर मत जाओ!” उसके गले से एक ऐसी चीख निकली जिसने पूरे घर की दीवारों को हिला दिया। वह बुरी तरह पछाड़ खाकर रोने लगी। उसके सब्र का बांध जो उसने पिछली बारह घंटों से अपनी जिम्मेदारियों के चलते बांध रखा था, वह अब पूरी तरह से टूट चुका था। वह सुमित्रा देवी के कमरे की तरफ भागना चाह रही थी, और फिर जमीन पर गिरकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसके आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसका विलाप इतना मार्मिक और हृदयविदारक था कि वहां खड़ी हर महिला की आँखें भर आईं।

जो ताई सास और कांता बुआ कुछ पल पहले तक उसे ताने दे रही थीं, वे अब भागकर अनुपमा को संभालने आ गईं। उनके हाथों से अनुपमा को संभाला नहीं जा रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि अनुपमा के वे आँसू न तो झूठे थे और न ही घड़ियाली। असल में, उसने एक आदर्श बहू होने की अपनी सारी जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए अपनी भावनाओं का गला घोंट रखा था। जब तक घर में शव था, जब तक पति नहीं आया था, और जब तक अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्थाएं नहीं हो गईं, तब तक उसने अपने आँसुओं को बहने की इजाजत नहीं दी थी। लेकिन जैसे ही उसकी जिम्मेदारी खत्म हुई, उसके अंदर की वह ‘बेटी’ बाहर आ गई जिसने अपनी माँ समान सास को खो दिया था।

अनुपमा का यह रूप देखकर ताने मारने वाली सभी महिलाओं के सिर शर्म से झुक गए। उन्हें एहसास हो गया था कि किसी के दुःख को सिर्फ उसके आँसुओं से नहीं मापा जा सकता। कभी-कभी इंसान इसलिए शांत नहीं होता क्योंकि उसे दर्द नहीं है, बल्कि इसलिए शांत होता है क्योंकि उसे उस दर्द से भी बड़ी कोई जिम्मेदारी निभानी होती है। उस दिन अनुपमा ने बिना कुछ कहे समाज की उस खोखली सोच को तमाचा जड़ दिया था जो हर रिश्ते को सिर्फ दिखावे के तराजू पर तौलती है।

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मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल 

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