ज़िंदगी की दूसरी सुबह
सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ, बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी … Read more