कीर्ति भारी मन से अपनी पड़ोसन नैना के घर से लौट आई। घर आकर ना जाने क्यों आज कीर्ति के मन में अंतर्द्वंद चल रहा था और बहुत बोझिल सी स्थिति हो रही थी। इसका कारण खुद कीर्ति भी नहीं समझ पा रही थी। अचानक पौधों को बालकनी में लहराते देख कीर्ति को याद आया.. लगता है आँधी आ गयी। बहुत कपड़े डाले थे धुलकर , तेज कदमों से भागकर कीर्ति कपड़े उठाकर बिस्तर पर पटक दी और ड्राइंग रूम में सोफे पर सिर टेक कर बैठ गयी। आँखें बन्द ही करने वाली थी कि दरवाजे की घंटी बजी। कीर्ति ने दरवाजा खोला तो देखा उसके पति अभय थे। अभय ने जूते खोलते हुए बच्चों के बारे में पूछा… सोनल और शुभम अभी तक खेल के नहीं आए? “पता नहीं बोलते हुए कीर्ति रसोई मे चाय बनाने लगी। हाथ मुँह धोकर अभय रसोई आकर कीर्ति से पूछने लगे.. ” कुछ बात है क्या? तुम्हारा मूड बिल्कुल उखड़ा उखड़ा लग रहा है। अभय के इतना बोलते ही कीर्ति चाय का कप टेबल पर रखते हुए फट पड़ी….. “आपको पता है कुछ? नैना की तो किस्मत चमक गयी। उसकी बेटी पूर्वी पढाई मे तो अच्छी है ही और आज उसने खेल कूद प्रतियोगिता में भी स्कूल मे टॉप किया है। अभी पिछले महीने उसके पति ने नई गाड़ी भी खरीद लिया, आप तो बस मिठाई और पार्टी पाकर खुश हो लेते हो।
अभय चाय का घूँट भरते हुए शांति से बोले.. तो क्या समस्या है, इसमें # जलन की क्या बात है? तुम इतना क्यों परेशांन हो रही हो ? सबको ईश्वर अपने समय से सब कुछ देते हैं जब हमारा समय आएगा हमें भी मिलेगा। “आप तो सांत्वना देने के अलावा कुछ नहीं करते। हमारी गाड़ी भी तो पुरानी हो गयी है, घसीट घसीट कर चलाते हो आप। हमे भी नया ले लेना चाहिए”। कीर्ति ने तुनक कर कहा। अभय ने चाय खत्म किया और सिर पर दोनों हाथ रखकर बैठ गए।
अब कीर्ति बर्तनों को पटक कर निकालने लगी और खाना बनाने मे लग गयी। तब तक सोनल और शुभम घर के अंदर घुसे। दोनों भाई धीरे से आपस मे बुदबुदाए.. “घर का माहौल ठीक नहीं लग रहा, लग रहा है कि मम्मी- पापा मे फिर से झगड़ा हुआ है। फिर दोनों पढ़ने बैठ गए। कीर्ति ने बच्चों के कमरे मे जाकर दाँत पीसते हुए कहा.. देर तक पढ़ना वरना आज खाने नहीं मिलेगा और दरवाजा पटक कर निकल गयी। अभय का सिर दर्द से फट रहा था उठकर अपने कमरे मे जाते हुए कीर्ति को हिदायत देते हुए बोलने लगे.. हो क्या गया है तुम्हें यार? दूसरों को सुखी देखकर खुश होना सीखो ना! # जलन में क्यों घर का माहौल बर्बाद कर रही हो? मुझे तो लगता है इस सोसाइटी में घर खरीद के मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। जब से आया हूँ तुम दूसरों को देखकर आए दिन घर की सुख – शांति भंग कर देती हो। ये तुम्हें नहीं महसूस होगा कि तुम किस क़दर अपना सुख सुकून दाव पर लगाकर पागल बनी हुई हो। ऑफिस का टेंशन झेलूं फिर घर मे आकर भी सिर्फ कलेश देखूँ बेवजह, इतना मजबूत नहीं हूँ मैं।
सबके घर की अलग कहानी , जिम्मेदारी और परिस्थिति अलग है। तुम्हें क्या कमी है जो दूसरों को देखकर तुम इस तरह पागल सी होने लगती हो। सब कुछ तो है हमारे पास, सबको देखकर गाड़ी खरीदूँ और दूसरे सामान लाऊँ ऐसा जरूरी तो नहीं। रही स्कूल में अव्वल आने की बात तो अभी हमारे बच्चे छः -सात में पढ़ रहे हैं, तुम उनको अपनी निगरानी में पढ़ाओ। पर उनको पढ़ने के टाइम पर तुम सहेलियों से बात करने लगती हो और बोलती हो पढ़ो । आज जो इतना दबाव बना रही हो खाना नहीं दूँगी ये शुरू से करना था। पर तुम खाने देती हो और साथ बिठाकर टी.वी दिखाती हो। ऐसे नहीं पढ़ते बच्चे, उन्हें बहुत देखभाल करने की जरूरत होती है। सब कुछ तुम नैना को देखकर सीख रही हो तो ये क्यों नहीं सीख रही कि बच्चों पर चीखती चिल्लाती नहीं है उसके बाद भी उसके बच्चे उसकी बात सुनते हैं और पढाने के वक़्त वो घर मे किसी का आना जाना पसंद नहीं करती। अपने बच्चों को तुम खेल कूद का हिस्सा नहीं बनने देती कि चोट लग जाएगी स्कूल वाले लापरवाह होते हैं।
अभय ने सारी बातें गुस्से में उड़ेल दी और उन्हें लगा की शायद अब सिर दर्द हल्का होकर ठीक हो जाए । बोलकर वो अपने कमरे मे सोने चले गए। दो मिनट के लिए सिर दर्द थोड़ा कम हुआ तो हल्की सी आँख बंद होने लगी थी। सारी बातें कीर्ति ने सुन ली शांति से पर उसका दिमाग ठंडा नहीं हुआ। अभय के कमरे मे जाकर उसने कहा.. सो गए क्या? अभय ने आँखें खोल कीर्ति को देखते हुए अनमने ढंग से कहा.. बोलो! कीर्ति ने अभी भी तीखे स्वर में कहा.. अपने मन की आपने सुना दिया अभय, अब मेरी भी सुनिए। क्या अपनी सहेलियों के साथ मैं नहीं खुश होऊँ? घूमने नहीं जाऊँ, मेरी कोई जिंदगी नहीं है।
अभय ने कीर्ति के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.. काम को समय में बाँधो कीर्ति! तुम अकेले नहीं हो तुम्हारे साथ तुम्हारा परिवार भी है। नैना के सास ससुर नहीं हैं, उनकी ननद की जिम्मेदारी नहीं है वो शादी शुदा हैं शायद आमदनी भी मुझसे ज्यादा हो। हमारे घर मम्मी पापा और एक अविवाहित बहन की भी जिम्मेदारी है सब ले के चलना है। इतना बोलने के बाद अभय का सिर बहुत तेज दुखने लगा और चक्कर आ गया। अभय को निढाल होते देख कीर्ति घबरा गयी और सोनल… शुभम को आवाज़ लगाकर रोने लगी।
दोनों बेटे दौड़े आए और कीर्ति ने बोला.. पापा के लिए पानी लाओ और सिर दर्द की दवा ढूंढो। सोनल ढूँढने लगा तभी दरवाजे पर घंटी बजी। उसकी पड़ोसन नैना मिठाई लेकर खड़ी थी। शुभम को घबराया देख वो घर के अंदर गयी। नैना कुछ बोलती उससे पहले कीर्ति ने कहा.. देखो ना नैना! इन्हें क्या हो गया। नैना बिना देर किए अपने पति कौशल को बुला लाई। कौशल ने बिना देर किये हुए कहा.. मैं गाड़ी निकालता हूँ और अभय जी को अस्पताल ले जाता हूँ इन्हें जांच कराने की जरूरत है।
कौशल ने गाड़ी निकाली और सोनल के साथ अभय को पकड़ कर गाड़ी में बिठा कर अस्पताल ले गए। नैना के आँखों से आँसू नहीं रूक रहे थे। अभय को भर्ती कर लिया गया फिर जांच के बाद डॉक्टर ने कहा.. चिंता और तनाव इन पर हावी हो गया है। अंदर से बहुत कमजोर हैं चिंता बढ़ने पर कभी भी समस्या बड़ी हो सकती है, सही समय पर आप ले आए।
उपचार के आधे घंटे बाद कीर्ति जब वापस अभय को होश में देखी तो उसके दिल को थोड़ी ठंडक मिली । नर्स ने नसीहत देते हुए कहा.. तनाव भरी कोई बातें नहीं करना है। डॉक्टर के जाने के बाद कीर्ति ने खुद पर काबू करते हुए कहा.. मुझे नहीं पता था अभय! मेरी छोटी सी बात आपको इस क़दर चुभ जाएगी। ईश्वर ने मुझे दुबारा मौका दिया है आपको संभालने के लिए अब वो गलती नहीं दोहराउंगी। आपने थोड़ी देर के लिए आँखें क्या बंद की मुझे दिखना मानो बंद हो गया।
अभय ने प्यार से कीर्ति का माथा चूमते हुए कहा.. “सब चीजें अपने समय पर हो जाएँगी तुम मुझे समझो तो सही, वक़्त को वक़्त देना सीखो। पड़ोसन हो या कोई हो सुख मे किसी के सुखी होना सीखो आज उसीने तुम्हें दुबारा से अपनी सोच बदलने का मौका दिया है।
नैना हाथ जोड़कर मन ही मन भगवान को शुक्रिया करते हुए आगे कभी जलन न करने और झगड़े से दूर रहने की कसम खायी।
#जलन
मौलिक, स्वरचित
(अर्चना सिंह)