विश्वास की डोर – रमा शुक्ला
** “सुहागरात की वो सेज, जो फूलों से सजी थी, उस पर बैठी दुल्हन कांप रही थी—शर्म से नहीं, बल्कि एक डर से। एक ऐसा डर जो उसके अतीत के साये से जुड़ा था। क्या उसका पति उसका हाथ थामेगा या फिर समाज के तानों से डरकर उसे बीच मझधार में छोड़ देगा? जानिये राघव … Read more