संस्कारों की पूँजी
रोहन की एक-एक बात मेरे कानों में अमृत की तरह घुल रही थी। मेरा गला भर आया। एक मध्यमवर्गीय माँ के लिए इससे बड़ा दिन और क्या हो सकता है कि जिस बेटे की उँगली पकड़कर उसने चलना सिखाया था, आज वही बेटा उसका संबल बनकर खड़ा था और कह रहा था कि ‘माँ, अब … Read more