आँगन की छाँव

 आंचल की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने थाली को पास की मेज पर रखा और झुककर प्रमिला के पैर छूने लगी। प्रमिला ने तुरंत उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लगा लिया। इस बार दोनों के आंसुओं में कोई दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसा पवित्र संतोष था जो शब्दों की सीमाओं से बहुत परे था।

नीलेश जी ने आगे बढ़कर आलोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “आलोक भाई, आज के दौर में जहाँ सगे रिश्तों में दीवारें खिंच जाती हैं, वहाँ आपकी इस गृहस्थी ने मुझे यह सिखा दिया कि रिश्ते दौलत से नहीं, दिल की विशालता से सींचे जाते हैं। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे इस घर का दामाद बनने का अवसर मिला।”

दिसंबर की गुनगुनी धूप छत पर रखी तुलसी की क्यारी और पुराने संदूक पर एक समान बिखर रही थी। घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे दोपहर से ढलते हुए सूरज की ओर सरक रही थीं, लेकिन रसोई और आँगन के बीच बैठी प्रमिला और उसकी बेटी तन्वी को समय बीतने की रत्ती भर भी खबर नहीं थी। तन्वी अभी कॉलेज से लौटी थी और अपनी माँ के पास बैठकर मटर छीलते हुए कॉलेज के किस्से सुना रही थी। प्रमिला के हाथ तेजी से बेसन के लड्डू बांध रहे थे, पर उसका ध्यान लगातार रसोई की खिड़की से बाहर गली के मोड़ पर लगा हुआ था। हर आते-जाते ऑटो की आवाज पर उसके कान खड़े हो जाते।

“माँ, आज तो आपने मेरे पसंदीदा बेसन के लड्डू बनाए हैं, लेकिन आपका ध्यान मेरी बातों पर बिल्कुल नहीं है। आप बार-बार दरवाजे की तरफ क्या देख रही हैं?” तन्वी ने थोड़ा लाड़ और थोड़ी बनावटी शिकायत भरे लहजे में पूछा।

प्रमिला मुस्कुरा दी। उसने अपने हाथ का पल्लू ठीक करते हुए कहा, “पगली, आज तेरी बुआ आ रही हैं। पूरे आठ महीने बाद आंचल दीदी अपने मायके कदम रख रही हैं। जब से तेरी दादी जी का साया हमारे सिर से उठा है, तब से दीदी का यहाँ आना बहुत कम हो गया है। पर इस बार उन्होंने खुद फोन करके कहा कि ‘भाभी, इस बार छुट्टियाँ सिर्फ अपने पुराने कमरे में बिताऊँगी।’ अब तू ही बता, भला मेरा मन कैसे स्थिर रह सकता है? उनके आने से पहले मुझे सब कुछ वैसा ही सजाना है, जैसा माँ जी के समय हुआ करता था।”

तन्वी अपनी माँ के चेहरे पर फैली चमक को निहारने लगी। उसने अक्सर अपनी सहेलियों से सुना था कि ननद के आने की खबर सुनकर भाभियों के माथे पर सिलवटें पड़ जाती हैं, लेकिन यहाँ उसकी माँ की आँखों में ऐसी अधीरता थी जैसे कोई अपनी ही सगी बहन या बेटी की प्रतीक्षा कर रहा हो। प्रमिला जब ब्याह कर इस घर में आई थी, तब आंचल बहुत छोटी थी। माँ जी की लंबी बीमारी के दौरान प्रमिला ने न केवल घर संभाला था, बल्कि आंचल के ब्याह तक के सारे दायित्व किसी बड़ी बहन और माँ की तरह अपनी हथेलियों पर उठाए थे। जब माँ जी चली गईं, तो सबको लगा कि अब इस घर की धुरी टूट जाएगी और आंचल का मायके से नाता औपचारिक हो जाएगा। पर प्रमिला ने उस शून्य को कभी पनपने नहीं दिया।

शाम की लालिमा आकाश में बिखरने लगी थी और घर के मुख्य द्वार पर एक गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी के दरवाजे बंद होने की आवाज सुनते ही प्रमिला ने हाथ धोए और लगभग दौड़ते हुए मुख्य द्वार की ओर बढ़ी। पीछे-पीछे तन्वी भी चली आई।

कार से सबसे पहले आंचल के पति, नीलेश जी उतरे और उन्होंने डिक्की से सूटकेस निकालना शुरू किया। फिर दोनों बच्चे—आठ साल का आरव और छह साल की सृष्टि—गाड़ी से कूदकर बाहर आए और “मामी जी! मामी जी!” पुकारते हुए प्रमिला की टाँगों से लिपट गए। प्रमिला ने झुककर दोनों को अपनी बाहों में समेटा, उनके गाल चूमे और अपनी साड़ी के पल्लू से आरव का पसीना पोंछा।

तभी कार के पिछले दरवाजे से आंचल बाहर निकली। पीले रंग के सादे कुर्ते में, आँखों में यात्रा की थकान लिए जैसे ही उसने उस घर की चौखट को देखा, उसकी आँखों की कोरें भीग गईं। यह वही चौखट थी जहाँ कभी उसकी माँ बैठी उसका इंतजार किया करती थी। आंचल का गला भर आया। लेकिन अगले ही पल जब उसकी नजर सामने खड़ी प्रमिला पर पड़ी, जो दोनों बाहें फैलाए, चेहरे पर वात्सल्य और अपनत्व का अथाह सागर लिए खड़ी थी, आंचल अपने कदमों को रोक न सकी।

वह दौड़कर प्रमिला के सीने से लग गई। आंचल के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला, बस एक गहरी सिसकी निकली, जिसने बरसों के बिछोह और दिल में दबे दर्द को एक झटके में बहा दिया। प्रमिला ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे अपने सीने में कसकर भींच लिया।

“आ गई मेरी बच्ची… रोते नहीं हैं पगली। देख, तेरा मायका बिल्कुल वैसा ही है, कुछ भी तो नहीं बदला।” प्रमिला की अपनी आवाज भी भीग चुकी थी।

आंचल ने प्रमिला के कंधे पर अपना सिर टिकाए हुए रुंधे गले से कहा, “भाभी, रास्ते भर दिल में यही डर सता रहा था कि माँ के बिना इस घर का आँगन मुझे काटने को दौड़ेगा। पर आपको देखते ही लगा जैसे माँ कहीं गई ही नहीं, वो आपके रूप में यहीं मेरा इंतजार कर रही हैं।”

“अरे भाई, अब क्या सारा प्यार दरवाजे पर ही लुटाओगी या हमें अंदर भी आने दोगी?” पीछे खड़े नीलेश जी ने माहौल को हल्का करने के लिए मुस्कुराते हुए कहा।

सबके चेहरे पर हंसी खिल उठी। प्रमिला ने झेंपते हुए अपनी आँखें पोंछीं और हाथ जोड़कर नीलेश जी का अभिवादन किया, “माफ कीजिएगा जीजाजी, आंचल को देखकर मैं सब भूल ही गई थी। आइए, अंदर आइए। आप लोगों का सफर बहुत लंबा था, थक गए होंगे।”

तन्वी ने तुरंत आगे बढ़कर फूफाजी और बुआ के चरण स्पर्श किए और बच्चों को हाथ पकड़कर बैठक में ले गई। थोड़ी ही देर में प्रमिला के पति और आंचल के बड़े भाई, आलोक भी दफ्तर से घर लौट आए। अपने जीजाजी और बहन को देखकर आलोक का चेहरा खिल उठा। घर का जो आँगन पिछले कई महीनों से शांत पड़ा था, वह अचानक बच्चों की किलकारियों और बड़ों के ठहाकों से गूँजने लगा।

बैठक में सब बैठे तो प्रमिला ने गरमा-गरम चाय, बेसन के ताजे लड्डू और मेथी की मठरी की तश्तरियाँ सजाकर रख दीं। आंचल ने जैसे ही लड्डू का एक टुकड़ा मुँह में रखा, उसकी आँखें फिर छलक आईं। “भाभी, बिल्कुल वही स्वाद… माँ भी इसी तरह गोंद और मेवे कूटकर डाला करती थीं। आपको कैसे याद रहा कि मुझे बारीक पिसे हुए मेवों वाले लड्डू पसंद हैं?”

प्रमिला ने आंचल के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बड़े सहज भाव से कहा, “माँ जब यह सब बनाती थीं, तो मैं सिर्फ देखती नहीं थी, बल्कि यह सीखती थी कि मेरी ननद को क्या पसंद है। जब माँ जा रही थीं, तो उन्होंने मुझसे यही कहा था कि ‘प्रमिला, आंचल का मन बहुत कोमल है, उसे कभी यह मत लगने देना कि उसकी माँ नहीं रही।’ मैं तो बस अपना फर्ज निभा रही हूँ दीदी।”

रात का खाना किसी उत्सव से कम नहीं था। प्रमिला ने आंचल की पसंद की कढ़ी-चावल, भरवां करेले और मक्के की रोटी बनाई थी। डाइनिंग टेबल पर बैठकर जब सबने एक साथ खाना खाया, तो ऐसा लगा मानो वक्त ठहर गया हो। पुराने दिनों की बातें, बचपन की शरारतें और माँ की यादों के बीच रात के बारह कब बज गए, किसी को पता ही नहीं चला। नीलेश जी और आलोक दूसरे कमरे में सोने चले गए, बच्चे तन्वी के कमरे में गद्दे लगाकर सो गए, लेकिन आंचल और प्रमिला उसी पुराने कमरे में बैठी रहीं जो कभी माँ जी का कमरा हुआ करता था।

बिस्तर पर लेटे हुए आंचल ने प्रमिला की गोद में अपना सिर रख दिया। प्रमिला हौले-हौले उसके बालों में उंगलियाँ फिराने लगी।

“भाभी, सच कहूँ तो ससुराल में जब कभी कोई बात चुभ जाती है या किसी बात पर मन उदास होता है, तो सबसे पहले माँ की याद आती है। दिल करता है कि किसी के कंधे पर सिर रखकर जी भरकर रो लूँ। कई बार सोचा कि आपको फोन करूँ, पर फिर यह सोचकर रुक जाती थी कि आप अपने परिवार, घर और बच्चों की जिम्मेदारियों में उलझी होंगी, कहीं आपको यह न लगे कि ननद अपनी परेशानियाँ लेकर बैठ गई।” आंचल की आवाज में एक झिझक थी।

प्रमिला ने उसके माथे को चूमा और बेहद गंभीर स्वर में कहा, “दीदी, आज के बाद यह बात अपने मन से हमेशा के लिए निकाल दीजिए। एक बेटी का मायका सिर्फ तब तक मायका नहीं होता जब तक उसकी माँ जीवित है। मायका उस प्रेम और अपनेपन से बनता है जो चौखट के भीतर रहने वाले लोग एक-दूसरे को देते हैं। अगर आपने मुझे अपनी माँ की जगह दी है, तो मेरा भी यह कर्तव्य बनता है कि मैं आपके हर सुख-दुख में आपकी ढाल बनूँ। भाभी सिर्फ भाई की पत्नी नहीं होती, अगर रिश्ते को दिल से निभाया जाए तो वह सहेली भी बन सकती है और जरूरत पड़ने पर माँ की तरह आँचल पसारकर छाँव भी दे सकती है।”

आंचल ने उठकर प्रमिला के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसने देखा कि प्रमिला के हाथों में काम करने की वजह से हल्की खुरदुराहट आ गई थी, पर उन हाथों में जो गर्माहट थी, वह दुनिया के किसी भी कोने में मिलना असंभव थी।

“भाभी, मैंने अक्सर अपने आस-पास देखा है कि माँ-बाप के गुजर जाने के बाद भाइयों के घर पराया अहसास कराने लगते हैं। भाभियाँ यह गिनने लगती हैं कि ननद कब आएगी और कब जाएगी। उपहारों और पैसों का हिसाब होने लगता है। पर आपने कभी मुझे परायेपन का अहसास नहीं होने दिया। आज मुझे यकीन हो गया कि मायका कभी नहीं मरता, बशर्ते वहाँ आपके जैसी समझदार और विशाल हृदय वाली भाभी मौजूद हो।” आंचल ने कृतज्ञता से कहा।

अगले पाँच दिन कैसे पंख लगाकर उड़ गए, किसी को भनक तक नहीं लगी। इन पाँच दिनों में प्रमिला ने आंचल को एक पल के लिए भी रसोई के भारी काम में हाथ नहीं लगाने दिया। वह सुबह की चाय से लेकर रात के गर्म दूध तक हर चीज का खुद ख्याल रखती। आंचल को लगता मानो वह अपने बचपन के दिनों में लौट आई हो, जहाँ कोई चिंता नहीं थी, कोई जिम्मेदारी का बोझ नहीं था, बस लाड़ था और दुलार था।

आखिरकार विदाई का दिन आ पहुँचा। रविवार की सुबह आँगन में फिर से वही खामोशी छाने लगी थी जो किसी प्रियजन के जाने से पहले हवा में तैरने लगती है। नीलेश जी ने गाड़ियों में सूटकेस रखवा दिए थे। आरव और सृष्टि तन्वी दीदी से बिछड़ने के नाम पर मुँह फुलाए बैठे थे।

प्रमिला अंदर कमरे से एक बड़ी सी पीतल की थाली लेकर आई। थाली में एक सुंदर जरीदार रेशमी साड़ी, चाँदी की दो पायजेब, बच्चों के नए कपड़े, और ढेर सारे घर के बने नमकीन और मिठाइयों के डिब्बे सजे हुए थे। थाली के एक कोने में रोली और अक्षत के साथ एक शगुन का लिफाफा भी रखा था।

प्रमिला ने आंचल के माथे पर तिलक लगाया, अक्षत लगाए और थाली उसके हाथों में थमा दी।

आंचल ने चौंककर थाली देखी और फिर प्रमिला की ओर देखा, “भाभी, यह सब क्या है? मैं यहाँ आपसे प्यार और अपनेपन की छाँव लेने आई थी, यह सब सामान और इतने महंगे उपहार लेने नहीं। भैया और आप पहले ही हमारे लिए इतना कुछ कर चुके हैं। मुझे यह सब नहीं चाहिए।”

प्रमिला ने दृढ़ता से उसके हाथ पर अपनी हथेली रख दी और बोली, “दीदी, यह कोई लेन-देन नहीं है और न ही यह कोई दिखावा है। यह उस घर का आशीर्वाद है जहाँ आपका बचपन बीता है। जब बेटी मायके से जाती है, तो खाली हाथ नहीं जाती। माँ जब विदा करती थीं, तो क्या आप उनसे मना करती थीं? आज अगर आपने मुझे माँ का दर्जा दिया है, तो मेरी दी हुई इस भेंट को ठुकराकर मुझे पराया मत कीजिए। यह साड़ी सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, यह मेरा वह प्यार है जो हर वक्त आपके साथ रहेगा। और यह जो पायल हैं, यह मेरी ननद के उन कदमों के लिए हैं जो इस घर में हमेशा ऐसे ही बिना झिझक के आते रहें।”

आंचल की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने थाली को पास की मेज पर रखा और झुककर प्रमिला के पैर छूने लगी। प्रमिला ने तुरंत उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लगा लिया। इस बार दोनों के आंसुओं में कोई दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसा पवित्र संतोष था जो शब्दों की सीमाओं से बहुत परे था।

नीलेश जी ने आगे बढ़कर आलोक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “आलोक भाई, आज के दौर में जहाँ सगे रिश्तों में दीवारें खिंच जाती हैं, वहाँ आपकी इस गृहस्थी ने मुझे यह सिखा दिया कि रिश्ते दौलत से नहीं, दिल की विशालता से सींचे जाते हैं। मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे इस घर का दामाद बनने का अवसर मिला।”

गाड़ी स्टार्ट हुई। आंचल खिड़की से बाहर हाथ हिलाते हुए तब तक देखती रही जब तक कि घर का वह आँगन और दरवाजे पर हाथ हिलाती प्रमिला की आकृति आँखों से ओझल नहीं हो गई। आंचल के दिल में अब कोई खालीपन नहीं था। उसे पता था कि माँ भले ही ईश्वर के पास चली गई हों, लेकिन मायके का वह आँचल कभी सूना नहीं होगा, क्योंकि उस आँचल को थामने वाली प्रमिला भाभी रूपी माँ आज भी उसी प्यार से उसका इंतजार कर रही है।

अक्सर यह माना जाता है कि ननद और भाभी का रिश्ता तकरार और औपचारिकताओं की नींव पर टिका होता है, लेकिन अगर नीयत में सच्चाई और दिल में ममता हो, तो वही रिश्ता माँ और बेटी की तरह अटूट और पवित्र बन सकता है। क्या आपको भी लगता है कि एक समझदार और संवेदनशील भाभी किसी भी उजड़ते हुए मायके को फिर से स्वर्ग बना सकती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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