अनकही कसक और ममता का सच

रात के करीब दस बज रहे थे। जयपुर की गुलाबी ठंड धीरे-धीरे अपने पैर पसार रही थी। पूरे दिन की गहमागहमी के बाद घर में सन्नाटा उतरने लगा था। रसोई का सारा काम निबटाकर, गैस का चूल्हा पोंछकर अवनि ने भारी सांस छोड़ी। सुबह पांच बजे से वह लगातार पैरों पर खड़ी थी। घर के हर सदस्य की पसंद-नापसंद, नाश्ता, दोपहर का भोजन, शाम की चाय और फिर रात का खाना—सब कुछ उसने अकेले ही बड़ी फुर्ती से संभाला था। लेकिन उसके चेहरे पर थकान के बजाय एक अजीब सा संतोष था, क्योंकि आज उसकी सासू माँ सुशीला जी पूरे छह महीने बाद अपने छोटे बेटे के यहाँ से उसके घर आई थीं।

सुशीला जी के आने की खबर मिलते ही अवनि ने उनके कमरे की एक-एक चीज़ खुद संवारी थी। गद्दों पर उनकी पसंदीदा सूती चादर बिछाई थी, खिड़कियों के पर्दे बदले थे और मंदिर में उनके लिए नए आसन की व्यवस्था की थी। सुशीला जी को घुटनों का पुराना दर्द था, इसलिए अवनि ने आयुर्वेदिक तेल भी पहले से मंगाकर रख लिया था।

अवनि ने पीतल के चमचमाते सस्पैन में गाय का दूध उबाला, उसमें केसर, थोड़ी सी पिसी हुई हल्दी और इलायची की खुशबू मिलाकर दो सुंदर कांच के गिलासों में डाला। तभी उसका पति मयंक रसोई में आया। मयंक ने अवनि के चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें देखीं तो मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

“अवनि, तुम बहुत थक गई हो। इतनी रात को यह सब करने की क्या ज़रूरत थी? माँ से पूछ लेते, अगर मन होता तो मैं खुद बना देता,” मयंक ने प्यार भरे लहजे में कहा।

अवनि ने हंसते हुए सिर हिलाया, “कैसी बातें करते हो मयंक! माँ जी पूरे छह महीने बाद आई हैं। उन्हें रात को हल्दी वाला गुनगुना दूध पीने की पुरानी आदत है। वो खुद कभी नहीं मांगेंगी, पर अगर नहीं मिलेगा तो रात भर ठीक से सो नहीं पाएंगी। चलो, तुम एक गिलास उठाओ, हम दोनों साथ चलकर माँ जी को दे आते हैं और उनके पैर भी दबा देंगे।”

मयंक अपनी पत्नी की इस समझदारी और संवेदनशीलता पर मन ही मन गर्व से भर उठा। दोनों हाथ में दूध का गिलास थामे दबे पांव सुशीला जी के कमरे की ओर बढ़े। घर का गलियारा शांत था। जैसे ही वे कमरे के दरवाज़े के पास पहुँचे, दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था और भीतर की हल्की पीली रोशनी फर्श पर बिखर रही थी।

मयंक दरवाज़े पर दस्तक देने ही वाला था कि भीतर से आती सुशीला जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम अचानक वहीं जम गए। सुशीला जी फोन पर अपनी बेटी रोहिणी से बात कर रही थीं। कमरे का स्पीकर शायद ऑन था या फिर सन्नाटे की वजह से उनकी आवाज़ बिल्कुल साफ बाहर तक आ रही थी।

“अरे रोहिणी, तू बस दो दिन में अपनी गाड़ी भेजकर मुझे अपने पास बुला ले बेटा। मैं तो यहाँ बेकार ही आ फँसी। सोचा था कुछ दिन बड़े बेटे के यहाँ रहूँगी, अवनि से अपनी अच्छी तरह सेवा करवाऊँगी, हाथ-पैर दबवाऊँगी और थोड़ा आराम मिलेगा। पर यहाँ आने का तो कोई मतलब ही नहीं निकला। अपने ही घर में जैसे कोई बेगाना बैठा हो। दिन भर यह अपने ही तौर-तरीकों में लगी रहती है। मुझे तो लगता है मेरा यहाँ कोई मान ही नहीं है…”

दरवाज़े के बाहर खड़े मयंक के हाथ कांप गए। दूध के गिलास की तश्तरी हल्की सी खनक उठी। मयंक का चेहरा गुस्से और अविश्वास से लाल हो गया। जिस माँ के आने की खुशी में उसकी पत्नी सुबह से भूखी-प्यासी एक पैर पर नाच रही थी, वही माँ अपनी बेटी से ऐसी बातें कर रही थीं? मयंक का मन हुआ कि वह अभी दरवाज़ा धकेल कर अंदर जाए और माँ से पूछे कि आखिर अवनि की सेवा में ऐसी क्या कमी रह गई थी।

लेकिन इससे पहले कि मयंक एक भी कदम आगे बढ़ाता या अपना मुंह खोलता, अवनि ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। मयंक ने मुड़कर देखा। अवनि की आँखों में आंसू छलक आए थे, मगर उसके होंठों पर उँगली थी। उसने बेहद धीमे से सिर हिलाकर मयंक को चुप रहने का इशारा किया। अवनि के दिल पर जैसे किसी ने खौलता हुआ तेल डाल दिया हो, मगर उसने अपने आंसुओं को पलकों के भीतर ही समेटने की कोशिश की।

अवनि ने मयंक के हाथ से दूध का गिलास लिया, खुद को सामान्य किया, गहरी सांस ली और फिर दरवाज़े को हल्का सा खटखटाते हुए अंदर कदम रखा।

सुशीला जी ने हड़बड़ाकर फोन काट दिया और तकिए के नीचे छिपा लिया। उनके चेहरे पर एक पल के लिए पकड़े जाने का डर उभरा, मगर अगले ही पल उन्होंने चेहरे पर एक गंभीर और उदास भाव ओढ़ लिया।

“माँ जी, आपका दूध,” अवनि ने बेहद सहज स्वर में कहा, जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। उसकी आवाज़ में वही मिठास और सम्मान था जो हमेशा रहता था।

सुशीला जी ने बिना देखे हाथ आगे बढ़ाया और गिलास पकड़ लिया, “हम्म… रख दो।”

मयंक अंदर आया, पर उसकी आँखें माँ से नज़रें नहीं मिला पा रही थीं। उसमें क्षोभ था। उसने भारी मन से कहा, “माँ, तबियत ठीक है आपकी? घुटनों में ज़्यादा दर्द तो नहीं है?”

“अब इस उम्र में तबियत क्या खाक ठीक रहेगी? बूढ़ी हड्डियों को आराम चाहिए होता है, पर यहाँ किसे फुर्सत है जो बैठकर दो घड़ी बतियाए,” सुशीला जी ने ताना मारते हुए कहा।

मयंक कुछ बोलने ही वाला था कि अवनि ने बात संभाल ली। वह तुरंत नीचे फर्श पर बैठ गई और सुशीला जी के पैरों के पास तेल की कटोरी रख ली।

“माँ जी, आज सफर की थकान है आपको। आप दूध पी लीजिए, तब तक मैं आपके पैरों की मालिश कर देती हूँ। दिन भर बाज़ार और रसोई के चक्कर में आपसे बैठकर बात करने का समय ही नहीं मिला, इसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिए,” अवनि ने मुस्कुराते हुए उनके पैर अपनी गोद में रख लिए।

सुशीला जी ने एक बार पैर पीछे खींचने की कोशिश की, “रहने दे बहू, तू भी थक गई होगी। मुझे किसी से सेवा कराने का कोई शौक नहीं है।”

“माँ जी, आप मेरी माँ जैसी हैं। बेटी समझकर डांट लीजिए, पर सेवा करने से मत रोकिए,” अवनि ने कोमलता से कहा और सुशीला जी के घुटनों पर धीरे-धीरे गुनगुने तेल की मालिश करने लगी।

मयंक कमरे में खड़ा अपनी पत्नी के इस असीम धैर्य को देखता रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि जो औरत कुछ देर पहले अपनी सास के मुंह से अपने लिए कड़वे बोल सुनकर रो पड़ी थी, वह इतनी आत्मीयता कहाँ से ला रही है। मयंक बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चला गया, क्योंकि वह अपने गुस्से को दबा नहीं पा रहा था।

कमरे में केवल अवनि और सुशीला जी बची थीं। अवनि बिना किसी शिकायत के करीब आधे घंटे तक सुशीला जी के पैरों और तलवों की मालिश करती रही। धीरे-धीरे तेल का असर और अवनि के हाथों की नरमी ने सुशीला जी की नसों को सुकून पहुँचाना शुरू कर दिया। उनके चेहरे की तल्खी ढलने लगी। थकान के मारे उनकी आँखें भारी होने लगीं।

मालिश खत्म करने के बाद अवनि ने गर्म पानी में भिगोए तौलिए से उनके पैर पोंछे, उन्हें रजाई ओढ़ाई और सिरहाने पानी की बोतल रखकर उठ खड़ी हुई।

“माँ जी, खिड़की बंद कर दी है ताकि ठंडी हवा न आए। अगर रात में कोई भी ज़रूरत हो, तो बस एक आवाज़ लगा दीजिएगा। मैं बराबर वाले कमरे में ही हूँ,” अवनि ने धीमी आवाज़ में कहा और सुशीला जी के माथे पर हाथ फेरकर कमरे की बत्ती बुझा दी।

सुशीला जी चुपचाप लेटी रहीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर अंधेरे में उनकी आँखें खुली थीं। उनके ज़ेहन में अपनी बेटी से कही हुई बात और अवनि का यह निस्वार्थ समर्पण दोनों गूंज रहे थे।

उधर अपने कमरे में जाकर मयंक बेचैनी से टहल रहा था। जैसे ही अवनि कमरे में आई, मयंक ने दरवाज़ा बंद किया और गुस्से में फुसफुसाया, “अवनि! तुम पागल हो क्या? तुमने सुना नहीं माँ फोन पर रोहिणी से क्या कह रही थीं? वो कह रही थीं कि तुम उनकी सेवा नहीं करतीं, उनका यहाँ कोई मान नहीं है और वो यहाँ से जाना चाहती हैं! तुम सुबह से उनके लिए खट रही हो और उनके मन में तुम्हारे लिए यह ज़हर है? तुमने मुझे बोलने क्यों नहीं दिया?”

अवनि ने मयंक का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर बैठाया। उसने मयंक के चेहरे को दोनों हाथों में थामकर शांत स्वर में कहा, “मयंक, गुस्सा मत होइए। एक बात बताइए, जब कोई इंसान बीमार होता है या कमज़ोर होता है, तो उसका स्वभाव कैसा हो जाता है?”

मयंक ने चिढ़कर कहा, “चिड़चिड़ा।”

“हाँ, बिल्कुल,” अवनि ने समझाया, “माँ जी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ उन्हें हर पल यह डर सताता है कि कहीं वो परिवार के लिए बोझ तो नहीं बन गईं। जब वो रोहिणी से बात कर रही थीं, तो वो वास्तव में मेरी शिकायत नहीं कर रही थीं, बल्कि वो अपनी उस असुरक्षा को बयां कर रही थीं जो हर बूढ़े इंसान के दिल में होती है। उन्होंने ज़िंदगी भर घर पर राज किया है, सबको अपनी उंगलियों पर चलाया है। आज जब शरीर साथ नहीं दे रहा, तो उन्हें लगता है कि शायद अब उनकी अहमियत कम हो गई है।”

“पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वो तुम्हारी मेहनत को अनदेखा करके तुम्हें बुरा-भला कहें!” मयंक ने तकिए पर मुक्का मारते हुए कहा।

“मयंक, अगर मैं उस वक्त अंदर जाकर बहस करती या आप उन पर चिल्लाते, तो क्या होता? उनका शक यकीन में बदल जाता कि इस घर में सचमुच उनकी कोई कद्र नहीं है। वो कल ही रोहिणी के यहाँ चली जातीं और उनके दिल में हमेशा के लिए यह कड़वाहट रह जाती कि बड़े बेटे और बहू ने उन्हें बेगाना कर दिया। क्या आप चाहते हैं कि हमारी माँ इस उम्र में बेगानेपन के दर्द के साथ जिएं?” अवनि की आँखों में गहरी समझदारी थी।

मयंक अवाक होकर अपनी पत्नी को देखता रहा। जिस उम्र में लोग ज़रा सी बात पर रिश्ते तोड़ लेते हैं, उस उम्र में अवनि रिश्तों की गहराई को इस कदर समझ रही थी।

अवनि ने आगे कहा, “बुज़ुर्ग बच्चों की तरह होते हैं मयंक। बच्चे जब रूठते हैं या उल्टी-सीधी बातें करते हैं, तो हम उन्हें घर से नहीं निकालते, बल्कि उन्हें और ज़्यादा प्यार देते हैं। माँ जी को इस वक्त हमारी सेवा से ज़्यादा हमारे वक्त और अपनेपन की ज़रूरत है। मैं साबित करूँगी कि यह घर उनका है और वो यहाँ मेहमान नहीं, मालकिन हैं।”

अगले दिन सुबह अवनि और भी नई ऊर्जा के साथ उठी। उसने सुशीला जी के उठने से पहले ही उनके लिए ताज़ा तुलसी की चाय तैयार रखी। जब सुशीला जी बाहर आईं, तो अवनि ने मुस्कुराकर उनके चरण छुए। पूरे दिन अवनि ने एक नई रणनीति अपनाई। उसने सिर्फ सेवा नहीं की, बल्कि सुशीला जी को हर काम में शामिल किया।

“माँ जी, आज दोपहर में कढ़ी बना रही हूँ। जैसी कढ़ी आप बनाती हैं, वैसी मुझसे कभी नहीं बनती। ज़रा रसोई में बैठकर बताइए ना कि छौंक में क्या-क्या डालना है?” अवनि ने बड़े आदर से कहा।

सुशीला जी, जो मुंह फुलाए बैठी थीं, उनका चेहरा अचानक खिल उठा। वो रसोई में कुर्सी डालकर बैठ गईं और बड़े रौब से बताने लगीं, “अरे, कढ़ी में मेथी दाना थोड़ा ज़्यादा डाला कर, और हींग असली वाली इस्तेमाल किया कर।”

अवनि ने बिल्कुल एक आज्ञाकारी शिष्या की तरह उनकी हर बात मानी। दोपहर में जब खाना मेज़ पर लगा, तो अवनि ने मयंक के सामने कटोरी रखते हुए कहा, “आज कढ़ी का स्वाद देखना मयंक, बिल्कुल माँ जी के हाथों जैसा बना है क्योंकि पूरी विधि माँ जी ने ही बताई है।”

मयंक ने माँ की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “अरे वाह! सच में माँ, आपके हाथ के स्वाद की तो बात ही अलग है।”

सुशीला जी के चेहरे पर बरसों बाद एक संतुष्टि भरी मुस्कान तैर गई। उन्हें महसूस हुआ कि वो अभी भी घर की धुरी हैं, उनकी ज़रूरत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

शाम को अवनि ने सुशीला जी की पुरानी सहेलियों को, जो उसी शहर में रहती थीं, चाय पर बुला लिया। सुशीला जी को जब अपनी पुरानी सखियाँ ड्राइंग रूम में बैठी दिखीं, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। अवनि ने सबके लिए गरमा-गरम नाश्ता परोसा और बड़ी विनम्रता से सबकी खातिरदारी की। सहेलियां सुशीला जी से कहने लगीं, “सुशीला, तू बड़ी भाग्यशाली है जो तुझे अवनि जैसी संस्कारी और ख्याल रखने वाली बहू मिली। आज के ज़माने में ऐसी बहुएं कहाँ मिलती हैं जो सास की सहेलियों का भी इतना मान रखें!”

यह सुनकर सुशीला जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया, मगर साथ ही उनके दिल के किसी कोने में एक तीखा कांटा सा चुभ गया। उन्हें बीती रात की अपनी कही बातें याद आने लगीं।

तीसरे दिन दोपहर में रोहिणी की गाड़ी सुशीला जी को लेने के लिए दरवाज़े पर आकर रुक गई। रोहिणी का ड्राइवर बाहर खड़ा था। उसने आकर कहा, “माता जी, दीदी ने गाड़ी भेजी है। आपका सामान रखने के लिए कहा है।”

सुशीला जी अपने कमरे में बैठी थीं। मयंक और अवनि दोनों कमरे में आए। मयंक का दिल धड़क रहा था कि माँ अब क्या फैसला लेंगी।

अवनि ने आगे बढ़कर एक सुंदर सा बैग सुशीला जी के पास रखा, जिसमें उसने सुशीला जी के पसंद के बेसन के लड्डू, उनकी दवाइयां और कुछ नए कपड़े सहेज कर रखे थे। अवनि की आँखों में उदासी थी।

“माँ जी, आपका सामान तैयार है। रास्ते के लिए मैंने गर्म पानी की थरमस और मखाने भी रख दिए हैं। पर…” अवनि की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई, “अगर आपका मन न हो, तो मत जाइए ना माँ जी। अभी तो आपको आए सिर्फ तीन दिन हुए हैं। मैंने तो सोचा था कि इस बार आपको अपने हाथ से आपके पसंद के सारे पकवान बनाकर खिलाऊंगी। आपके बिना यह घर फिर से सूना हो जाएगा।”

सुशीला जी ने नज़रें उठाकर अवनि को देखा। अवनि के चेहरे पर कोई बनावट नहीं थी, कोई शिकायत नहीं थी, सिर्फ एक बेटी की सच्ची तड़प थी। सुशीला जी की नज़र उस डायरी पर पड़ी जो मेज़ पर खुली रखी थी। वह अवनि की रसोई की डायरी थी, जिसमें उसने बड़े-बड़े अक्षरों में लिख रखा था—”माँ जी के नाश्ते का समय: सुबह 8 बजे, दवाइयां: दोपहर खाने के बाद, घुटनों की सिकाई: रात 9 बजे।”

सुशीला जी का दिल भीतर तक हिल गया। उन्हें अपनी ही सोच पर इतनी घिन आई कि उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। जो बहू उनके एक-एक पल के आराम का हिसाब रख रही थी, उसके बारे में उन्होंने अपनी बेटी से क्या कुछ नहीं कह दिया था!

सुशीला जी ने कांपते हाथों से अवनि का हाथ पकड़ लिया और उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया। कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ सुशीला जी की सिसकियों की आवाज़ गूंज रही थी।

“माँ जी! क्या हुआ? आपकी तबियत तो ठीक है ना?” अवनि घबरा गई।

“मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ़ कर दे,” सुशीला जी फफक-फफक कर रो पड़ीं। “मैं कितनी अंधी थी, कितनी स्वार्थी थी। तू मेरी सेवा में अपनी जान खपा रही थी और मैं… मैं अपने झूठे अहंकार में अंधी होकर रोहिणी से तेरी बुराई कर रही थी। तूने सब सुन लिया था ना उस रात? फिर भी तूने उफ़ तक नहीं किया? तूने मुझे पलटकर एक ताना तक नहीं मारा?”

अवनि ने सुशीला जी के आंसू पोंछे और उनके घुटनों पर सिर रख दिया, “माँ, माँ से भी कभी कोई नाराज़ होता है क्या? अगर माँ अपनी औलाद पर गुस्सा नहीं करेगी, अपने मन का गुबार नहीं निकालेगी, तो कहाँ जाएगी? आपने जो कहा, वो आपका गुस्सा था, पर जो आप मुझे दे रही हैं, वो आपका आशीर्वाद है। मुझे बस आपका आशीर्वाद चाहिए माँ जी।”

दरवाज़े पर खड़े मयंक की आँखें भी भीग गईं। उसने देखा कि नफरत और गलतफहमी की दीवार को अवनि ने अपने अगाध प्रेम और धैर्य से एक ही पल में ढहा दिया था।

सुशीला जी ने बाहर खड़े ड्राइवर को आवाज़ दी, “जाकर रोहिणी से कह दे कि गाड़ी वापस ले जाए। मैं कहीं नहीं जा रही। मेरा घर यही है, मेरा तीर्थ यही है और मेरी बेटी अवनि के पास ही मेरी बाकी ज़िंदगी कटेगी।”

ड्राइवर गाड़ी लेकर चला गया। घर के आंगन में धूप खिल उठी थी। सुशीला जी ने अवनि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज से तू मेरी बहू नहीं, मेरी सबसे बड़ी ताकत है।”

उस दिन के बाद से उस घर की फिज़ा ही बदल गई। रिश्तों में जो एक औपचारिकता की दरार थी, वह हमेशा के लिए भर चुकी थी। प्यार और सम्मान का ऐसा दीपक जला था जिसकी रोशनी में पूरा परिवार सुख की छाँव महसूस कर रहा था।

आज के समय में जब पीढ़ियों के बीच का फासला बढ़ रहा है, छोटी-छोटी बातों पर परिवार बिखर जाते हैं और बुज़ुर्गों की कड़वी बातों को दिल से लगाकर लोग रिश्ते तोड़ लेते हैं, तब अवनि जैसी समझदारी की हर घर को ज़रूरत है। बुज़ुर्गों का चिड़चिड़ापन अक्सर उनकी शारीरिक कमज़ोरी और अकेलेपन का डर होता है। क्या आपको भी लगता है कि अगर हम गुस्से का जवाब गुस्से से देने के बजाय धैर्य और प्रेम से दें, तो हर बिखरता हुआ परिवार बचाया जा सकता है? आपकी अपनी ज़िंदगी में इस बारे में क्या राय है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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