“मुझे माफ कर दे नंदिनी,” सुमित्रा का गला भर आया। “मैं यह भूल गई थी कि किसी पौधे को बड़ा करने के लिए उस पर धूप बरसाने से ज्यादा जरूरी उसे खाद और पानी देना होता है। मैंने तुझसे उस समझदारी की उम्मीद की, जिसे हासिल करने में मुझे खुद पच्चीस साल लग गए। तूने पोहा जैसा भी बनाया है, वह बहुत प्यार से बनाया है। चल, आज हम दोनों मिलकर रसोई संभालते हैं। मैं तुझे सिखाऊंगी कि हमारे घर में दाल को गाढ़ा कैसे करते हैं, और तू मुझे अपनी मुस्कान से इस घर को महकाना सिखाना।”
भोपाल के पुराने मोहल्ले में स्थित ‘सदाशिव सदन’ केवल ईंट और गारे की हवेली नहीं था, बल्कि वह चार पीढ़ियों के संस्कारों, खट्टी-मीठी नोकझोंक और अनकहे आंसुओं का गवाह था। घर के बीचों-बीच बने खुले आंगन में सुबह की धूप जब तुलसी के चौबारे को छूती, तो घर की धड़कनें तेज हो जाती थीं। आज की सुबह आम दिनों से कुछ अलग थी। रसोई में खटपट की आवाजें सामान्य से अधिक तेज थीं, बर्तनों के टकराने की गूंज बैठक तक आ रही थी और वातावरण में एक अनकहा तनाव तैर रहा था।
रसोई में खड़ी सुमित्रा देवी के माथे पर गहरी त्योरियां चढ़ी हुई थीं। सुमित्रा इस घर की बड़ी बहू थीं, जिन्होंने पिछले पच्चीस वर्षों से गृहस्थी की हर एक चाबी को अपनी उंगलियों पर नचाया था। उनका हर काम घड़ी की सुई की तरह सटीक होता था। आज वही सटीकता उनकी छोटी देवरानी, नंदिनी के लिए परीक्षा का कठिन प्रश्नपत्र बन गई थी। नंदिनी का ब्याह अभी मुश्किल से चार महीने पहले हुआ था। नए घर का तौर-तरीका, मसालों की सही मात्रा, चाय में अदरक का स्वाद और नाश्ते की मेज पर परिवार के हर सदस्य की व्यक्तिगत पसंद को साधने में वह अभी भी लड़खड़ा रही थी।
“अरे नंदिनी! हाथ जरा जल्दी चलाओ। सवा आठ बज चुके हैं। बाबूजी के दफ्तर जाने का वक्त हो रहा है और तुमने अभी तक पोहे में मूंगफली तक नहीं भुनी? और यह दाल देखो, इसमें पानी ज्यादा और दाल कम तैर रही है। क्या तुम्हारे मायके में किसी ने यह नहीं सिखाया कि दाल को कितनी आंच पर पकाया जाता है? इतने बड़े घर की रसोई संभालना कोई गुड़ियों का खेल नहीं है। अगर ऐसे ही चलता रहा, तो घर की मर्यादा और स्वाद दोनों ही रसातल में चले जाएंगे!” सुमित्रा की आवाज में तीखापन साफ झलक रहा था। उनके शब्द सीधे नंदिनी के आत्मसम्मान को छलनी कर रहे थे।
नंदिनी ने अपनी आंखें नीची कर लीं। उसकी पलकों के कोरों पर दो आंसू छलकने को बेताब थे, जिन्हें उसने अपने पल्लू के छोर से बड़ी खामोशी से पोंछ लिया। वह कुछ बोलना चाहती थी, अपनी सफाई देना चाहती थी कि कुकर की सीटी अटक गई थी और चूल्हे का बर्नर धीमा जल रहा था, मगर जेठानी के दबदबे के आगे उसके होंठ सिर्फ कांप कर रह गए। उसने सिर झुकाकर धीमी आवाज में कहा, “माफ कीजिए भाभी, बस पांच मिनट में सब मेज पर लगाती हूं।”
सुमित्रा का गुस्सा यहीं शांत नहीं हुआ। वे हाथ में चाय की छन्नी लिए रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं और कमर पर हाथ रखकर बोलीं, “हर बात में माफी मांग लेने से काम सुधर नहीं जाता, छोटी बहू। गृहस्थी जिम्मेदारी से चलती है। जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तो कभी किसी को उंगली उठाने का मौका नहीं दिया। हर काम वक्त पर, हर चीज अपनी जगह पर। मुझे तो कभी किसी ने नहीं सिखाया, फिर भी मैंने सब कुछ पहले ही महीने में सीख लिया था। समझदारी इंसान के खून में होनी चाहिए, सिखाई नहीं जाती।”
ठीक उसी समय, रसोई से सटे दालान में एक नक्काशीदार लकड़ी के झूले पर कल्याणी अम्मा बैठी थीं। कल्याणी अम्मा की उम्र पचासी पार कर चुकी थी। सफेद सूती साड़ी, चेहरे पर समय की उकेरी अनगिनत झुर्रियां, मगर आंखों में गंगा जैसी निर्मल और गहरी समझ। उनके कांपते हुए हाथों में तुलसी की 108 दानों वाली माला घूम रही थी। उनका मुख तो ‘राम-राम’ का मौन जाप कर रहा था, मगर उनके कान और आंखें रसोई की हर एक हरकत और हर शब्द को बहुत बारीकी से तौल रहे थे।
कल्याणी अम्मा ने अपनी माला फेरना एक पल के लिए रोका। उन्होंने अपने चश्मे को नाक पर थोड़ा ठीक किया और एक गहरी, शांत सांस ली। आंगन में पसरी चुप्पी को चीरती हुई उनकी खनकती आवाज गूंजी, “सुमित्रा, जरा इधर तो आना बहु!”
सुमित्रा ने चौंककर पीछे देखा। अम्मा की आवाज में कभी कठोरता नहीं होती थी, मगर उनका प्रभाव ऐसा था कि घर का कोई भी सदस्य उनकी बात को अनदेखा नहीं कर सकता था। सुमित्रा अपने पल्लू को ठीक करते हुए झूले के पास पहुंचीं और चेहरे पर बनावटी सौम्यता लाते हुए बोलीं, “जी अम्मा, कहिए। आपको काढ़ा बना दूं या नाश्ता यहीं मंगवाऊं?”
कल्याणी अम्मा ने सुमित्रा के चेहरे को ध्यान से देखा, फिर एक हल्की सी मुस्कान उनके सूखे होंठों पर तैर गई। अम्मा बोलीं, “अरे नहीं, नाश्ता तो बाद में भी हो जाएगा। मैं तो बस यह देख रही थी कि आज हमारे घर में नई बहू की परीक्षा कौन ले रहा है! वह ले रही है, जो खुद जब पच्चीस साल पहले इस चौखट के अंदर आई थी, तो आए दिन कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर देती थी।”
सुमित्रा का चेहरा एकदम फक पड़ गया। उनकी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं। “अम्मा… आप… आप यह क्या कह रही हैं?”
अम्मा ने मुस्कुराते हुए माला को अपनी गोद में रखा और सुमित्रा का हाथ थाम लिया। अम्मा की यह छुअन सुमित्रा को झकझोर गई। अम्मा ने रसोई की तरफ इशारा करते हुए कहा, “नंदिनी को इधर बुलाओ, उसे भी तो पता चले कि उसकी यह सर्वगुण संपन्न, अनुशासन की मूरत जेठानी जब खुद नई-नई बहू बनकर आई थी, तब उसका क्या आलम था।”
नंदिनी भी सहमी कदमों से रसोई से बाहर निकलकर दालान के खंभे की ओट में खड़ी हो गई। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या होने वाला है।
कल्याणी अम्मा ने अपनी यादों के झरोखे को खोलते हुए कहा, “सुमित्रा, याद है तुम्हें वह पहली दिवाली? जब तुमने पूरे उत्साह में आकर घर के सभी मेहमानों के लिए खीर बनाई थी? तुमने शक्कर के डिब्बे की जगह गलती से सेंधा नमक का पूरा डिब्बा खीर में उड़ेल दिया था। जब तुम्हारे ससुर जी ने पहला चम्मच मुंह में लिया, तो उनका चेहरा देखने लायक था। तब तुम्हारी बड़ी जेठानी, जानकी, पास ही खड़ी थी। क्या उसने तुम्हें डांटा था? क्या उसने यह ताना मारा था कि तुम्हारे मायके वालों ने तुम्हें नमक और शक्कर में फर्क करना नहीं सिखाया?”
सुमित्रा ने लज्जा से अपनी गर्दन झुका ली। उसकी पुरानी स्मृतियां आंखों के सामने सजीव हो उठीं।
अम्मा ने आगे कहना जारी रखा, “जानकी ने बिना एक पल गंवाए हंसते हुए सबको कह दिया था कि आज की खीर अम्मा के व्रत के लिए बनी थी, इसलिए इसमें फलाहारी नमक डाला गया है, मेहमानों की खीर अंदर रखी है। और फिर उसने चुपचाप रसोई में जाकर तुम्हारे साथ मिलकर आधे घंटे में नई रबड़ीदार खीर तैयार कर दी ताकि तुम्हारी लाज बच सके। उसने तो तुम्हें कभी नीचा नहीं दिखाया।”
दालान में बिल्कुल सन्नाटा छा गया था। केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
अम्मा ने सुमित्रा की आंखों में झांकते हुए पूछा, “और वह दिन याद है जब तुमने पहली बार सिल्क की बनारसी साड़ियों पर प्रेस करते हुए अपने ससुर जी का सबसे पसंदीदा कुर्ता जला दिया था? तुम कमरे में बैठकर फूट-फूट कर रो रही थीं। तब किसने आकर तुम्हारे आंसू पोंछे थे? जानकी ने ही ना? उसने खुद वह कुर्ता अपने हाथ से रफू कराया और कहा कि गलती तो किसी से भी हो सकती है। फिर मुझे यह बताओ सुमित्रा, तुम्हारी जेठानी जानकी तो इतनी समझदार, इतनी धैर्यवान और ममतामयी थी, फिर तुम्हें समझदार बनने में इतना समय क्यों लग गया? तुम तो सालों तक हर तीज-त्योहार पर कुछ न कुछ गड़बड़ करती ही रहती थी। कभी दाल में तड़का जल जाता था, तो कभी मेहमानों के आगे पानी का गिलास हाथ से छूट जाता था।”
सुमित्रा की आंखों से पश्चाताप के आंसू टपक पड़े। अम्मा की बातें कोई ताना नहीं थीं, बल्कि वे एक आईना थीं, जिसमें सुमित्रा को अपना बीता हुआ कल साफ दिखाई दे रहा था। वह यह भूल चुकी थी कि जिस पूर्णता पर आज उसे इतना घमंड है, वह रातों-रात हासिल नहीं हुई थी; बल्कि वर्षों की गलतियों, अपनों के धैर्य और क्षमा के सहारे गढ़ी गई थी।
अम्मा ने अब दोनों बहुओं को अपने करीब बुलाया। उन्होंने एक हाथ से सुमित्रा का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ से नंदिनी की कांपती हुई उंगलियों को थामा। अम्मा का स्वर बेहद गंभीर और वात्सल्य से भर गया।
“देखो बहुओं, यह जो घर होता है ना, यह कोई दफ्तर या अदालत नहीं है जहां हर गलती पर सजा सुनाई जाए और हर कमी पर जुर्माना लगाया जाए। जब एक लड़की अपना भरा-पूरा मायका, अपने माता-पिता, अपनी सहेलियां और अपनी पुरानी आदतें छोड़कर किसी नए घर में कदम रखती है, तो वह भीतर से बहुत डरी हुई होती है। उसे नए बर्तनों की जगह ढूंढने में ही नहीं, बल्कि नए रिश्तों के दिलों में अपनी जगह बनाने में भी वक्त लगता है।”
अम्मा ने सुमित्रा के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “सुमित्रा, बड़ी बहू होना केवल सत्ता या अधिकार पाना नहीं होता। बड़ी बहू का मतलब होता है उस छत की तरह होना, जो नीचे रहने वालों को धूप और बरसात से बचाती है। तुम जानकी की छांव में पली-बढ़ी हो। उसने तुम्हें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि तुम पराई हो या तुममें कोई कमी है। उसने तुम्हारी हर नादानी को अपनी समझदारी से ढंक लिया। आज जब भगवान ने तुम्हें बड़ी बहू के स्थान पर बैठाया है, तो तुम्हारा फर्ज क्या बनता है? क्या तुम्हारा यह काम है कि तुम नंदिनी की गलतियों की गिनती करो? या तुम्हारा काम यह है कि तुम उसका हाथ पकड़कर उसे सही रास्ता दिखाओ?”
नंदिनी की आंखों से अब कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे। उसे लगा जैसे अम्मा ने उसके मन के सारे बोझ को अपने एक ही स्पर्श से हल्का कर दिया हो।
सुमित्रा का सिर पूरी तरह झुक चुका था। उसके भीतर का अहंकार, जो वर्षों से एक कुशल गृहिणी होने के दंभ से पनप रहा था, पूरी तरह पिघल चुका था। उसे समझ आ गया कि वह अनजाने में अपनी ही छोटी देवरानी के साथ वही अन्याय कर रही थी, जिसे उसने खुद कभी नहीं झेला था। उसे अपनी दिवंगत जेठानी जानकी की वह ममतामयी मुस्कान याद आ गई, जो हर मुश्किल वक्त में उसका हौसला बढ़ाती थी।
सुमित्रा आगे बढ़ी और उसने नंदिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। सुमित्रा की आंखों से आंसू बह रहे थे, मगर अब उनकी आवाज में कड़वाहट की जगह गहरा अपनत्व था।
“मुझे माफ कर दे नंदिनी,” सुमित्रा का गला भर आया। “मैं यह भूल गई थी कि किसी पौधे को बड़ा करने के लिए उस पर धूप बरसाने से ज्यादा जरूरी उसे खाद और पानी देना होता है। मैंने तुझसे उस समझदारी की उम्मीद की, जिसे हासिल करने में मुझे खुद पच्चीस साल लग गए। तूने पोहा जैसा भी बनाया है, वह बहुत प्यार से बनाया है। चल, आज हम दोनों मिलकर रसोई संभालते हैं। मैं तुझे सिखाऊंगी कि हमारे घर में दाल को गाढ़ा कैसे करते हैं, और तू मुझे अपनी मुस्कान से इस घर को महकाना सिखाना।”
नंदिनी ने बिना कुछ कहे सुमित्रा के गले लगकर अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया। जो दूरियां और कड़वाहट पिछले चार महीनों से दोनों के बीच दीवार बनकर खड़ी हो रही थीं, वे प्रेम के एक ही आलिंगन में ढह गईं। रसोई से आ रही बर्तनों की आवाज अब कर्कश नहीं, बल्कि एक मधुर संगीत जैसी लग रही थी।
कल्याणी अम्मा ने संतोष की एक लंबी सांस ली। उनके चेहरे की झुर्रियों में एक अलौकिक तृप्ति बिखर गई। उन्होंने फिर से अपनी तुलसी की माला उठाई और मणियों को फेरते हुए धीरे से मुस्कुरा दीं। आंगन में खिली धूप अब और भी सुनहरी लग रही थी, मानो पूरे सदाशिव सदन को प्रेम, क्षमा और आपसी समझ की एक नई चादर में लपेट रही हो।
घर केवल कायदे-कानूनों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करने और उन्हें प्रेम से संवारने से ही स्वर्ग बनता है।
अगर आप इस कहानी में सुमित्रा देवी की जगह होते, तो नई बहू की गलतियों को कैसे संभालते? क्या हमारे समाज में पुरानी बहुओं को अपनी पुरानी गलतियां याद रखकर नई बहुओं के प्रति अधिक संवेदनशील नहीं होना चाहिए? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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