जड़ों की पुकार

 सुमित्रा की बात सुनते ही मेरे मन का सारा बोझ, सारा अपराधबोध जैसे आंसुओं के साथ बह गया। मैंने सुमित्रा की ओर देखा। एक स्त्री जब माँ बनती है तो त्याग की प्रतिमूर्ति होती है, और जब वह बहू बनती है तो बिखरते हुए रिश्तों को एक सूत्र में पिरोने वाली डोरी बन जाती है।

“सुमित्रा… तुम सच कह रही हो। हमने अपनी संतानों के लिए तो सब कुछ सोचा, पर जिन जड़ों से हम सींचे गए, उन्हें ही भूल बैठे थे। आज ही गाड़ी निकालते हैं और गाँव चलते हैं।”

दोपहर तक हम दोनों होशंगाबाद पहुँच चुके थे। गाँव के उस पुराने आंगन में जब मैंने कदम रखा, तो नीम के पेड़ के नीचे तख्त पर बैठे बाबूजी अपनी कमजोर आँखों पर हाथ की ओट बनाकर देखने लगे। जब उन्होंने पहचाना, तो उनके बूढ़े चेहरे की झुर्रियों में खुशी की अनगिनत धाराएं बह निकलीं। माँ लाठी टेकते हुए रसोई से बाहर आईं।

शाम की ढलती रोशनी भोपाल के पुराने हिस्से में बने हमारे छोटे से आशियाने के बैठक कक्ष में हौले-हौले उतर रही थी। मेज पर रखी चाय की प्यालियां ठंडी हो चुकी थीं। तभी सामने रखे लैपटॉप की स्क्रीन पर बजी घंटी ने कमरे के सन्नाटे को तोड़ दिया। मैंने चश्मा ठीक करते हुए माउस क्लिक किया, तो स्क्रीन पर हमारे इकलौते बेटे कबीर का खिलखिलाता चेहरा उभर आया। उसके चेहरे का तेज बता रहा था कि कोई बहुत बड़ी बात है जो उसके सीने में खुशी बनकर छलकने को मचल रही है।

सुमित्रा, जो पास ही सोफे पर बैठी शॉल बुन रही थी, अपनी सुइयां वहीं छोड़कर लपककर स्क्रीन के सामने आ बैठी। उसके चेहरे पर ममता भरी बेचैनी साफ झलक रही थी। कबीर ने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया, “नमस्ते पापा! प्रणाम माँ!”

औपचारिक कुशल-क्षेम के चंद जुमलों के बाद कबीर अपनी उत्सुकता को और अधिक दबा न सका। वह चहकते हुए बोला, “पापा, माँ… एक बहुत बड़ी खुशखबरी है! मेरा कैंपस प्लेसमेंट हो गया है। और सिर्फ हुआ ही नहीं है, बल्कि पूरे बैच का सबसे बड़ा पैकेज मुझे मिला है। जिस मल्टीनेशनल कंपनी का मैंने सपना देखा था, उसने मुझे चुन लिया है।”

यह सुनते ही मेरे चेहरे पर एक पिता का स्वाभाविक गर्व तैर गया। मैंने उत्साह से कहा, “अरे वाह कबीर! यह तो सचमुच तुम्हारी वर्षों की तपस्या का फल है। बहुत-बहुत बधाई बेटा! जॉइनिंग कहाँ की है? पुणे या बंगलुरु?”

स्क्रीन पर कबीर के चेहरे के भाव हल्के से बदले। उसने मुस्कुराते हुए संकोच के साथ कहा, “पापा, कंपनी का मुख्य मुख्यालय फ्रैंकफर्ट में है। मेरी शुरुआती पोस्टिंग जर्मनी के लिए हुई है। कंपनी अगले महीने ही मेरा वर्क वीज़ा और टिकट का प्रबंध कर रही है।”

कमरे में जैसे एकदम से हवा भारी हो गई। मेरे होठों से निकला, “विदेश? बेटा… अपने देश में कोई मौका नहीं था क्या? क्या अपने ही वतन में रहकर काम नहीं किया जा सकता था?”

कबीर ने समझाने वाले लहजे में कहा, “पापा, आप आज के दौर को समझिए। ग्लोबल एक्सपोज़र करियर के लिए कितना ज़रूरी होता है! अगर शुरुआती दो-तीन साल यूरोप में काम कर लिया, तो आगे चलकर यहाँ की कम्पनियाँ भी मुंहमांगा पद और पैकेज देंगी। यह सिर्फ कुछ सालों की बात है। पापा, माँ कुछ बोल क्यों नहीं रही हैं? आप माँ को समझाइए न, यह मेरे भविष्य और सपनों की उड़ान का सवाल है।”

स्क्रीन पर सुमित्रा की आँखें डबडबा आई थीं। वह एकटक अपने लाल को देख रही थी, लेकिन उसके हलक से एक शब्द भी नहीं फूट रहा था। कबीर अपनी माँ की इस उदासी को भांप गया था, इसलिए वह बार-बार मुझे ही संबोधित कर रहा था ताकि उस असहज खामोशी से बच सके।

मैंने अपने भीतर की कसक को दबाते हुए कहा, “हाँ बेटा, तुम्हारी तरक्की में ही हमारी खुशी है। पर जाने से पहले घर आओगे न?”

“यह भी कोई पूछने की बात है पापा! फ्लाइट से पहले पूरे दो हफ्ते आपके साथ रहूँगा। माँ से कहिए कि मेरी पसंद के बेसन के लड्डू, कढ़ी-चावल और गाजर का हलवा बनाने की तैयारी शुरू कर दें। बहुत दिन हो गए घर के स्वाद के लिए तरस गया हूँ।”

कबीर ने बात संभाल ली थी। कुछ देर की हँसी-मजाक के बाद कॉल कट गया। लैपटॉप की स्क्रीन काली होते ही कमरे का मौन और भी गहरा हो गया। तभी मेरे कंधे पर एक गर्म बूंद गिरी। मैंने मुड़कर देखा, सुमित्रा अपने आंचल से चेहरा ढँककर फूट-फूटकर रो रही थी।

“अठारह साल की उम्र में बारहवीं के बाद कोटा गया, फिर चार साल इंदौर में इंजीनियरिंग, उसके बाद दो साल दिल्ली में पोस्ट-ग्रेजुएशन… छह-सात साल तो यूँ ही निकल गए। हर बार यही तसल्ली रहती थी कि जब भी दिल घबराएगा, रात की ट्रेन पकड़कर बारह घंटे में उसके पास पहुँच सकते हैं या वह आ सकता है। अब तो वह सात समंदर पार जा रहा है। हमारा इकलौता बच्चा इतनी दूर चला जाएगा तो हम बुढ़ापे में किसके सहारे जिएंगे?”

सुमित्रा का दर्द एक माँ का स्वाभाविक विलाप था। रात बहुत गहरी हो चुकी थी। मैं जानता था कि इस वक्त तर्क या सांत्वना के कोई भी शब्द उसके जख्मों पर मरहम नहीं लगा सकते। मैंने बस उसका हाथ थामकर हौले से थपथपाया, “सुमित्रा, चलो अब सो जाओ। बहुत रात हो गई है, सुबह ठंडे दिमाग से बात करेंगे।”

बत्ती बुझाकर मैं बिस्तर पर लेट गया, पर नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी। छत पर घूमते पंखे की लयबद्ध आवाज़ के साथ मेरे दिमाग में अतीत की रील घूमने लगी। बारहवीं की परीक्षा पास करते ही जब पहली बार कबीर हॉस्टल जा रहा था, तब सुमित्रा कई दिनों तक बीमार रही थी। उसका कमरा, उसकी किताबें, उसका खाली बिस्तर देखकर वह अक्सर रो पड़ती थी। लेकिन उस समय कबीर जब भी छुट्टियों में घर आता, तो पूरे घर में जैसे प्राण फूंक देता था। वह खुद से ज्यादा हमारी फिक्र करता था। जाते वक्त हिदायतें देता—”पापा, माँ को अकेले बाज़ार मत जाने देना। माँ, पापा की बीपी की दवाई समय पर देना।” जब कभी हम बीमार पड़ते, वह बिना बताए अचानक टिकट कटाकर सरप्राइज देने आ पहुँचता था। उन दिनों का वह प्यार और लगाव ही तो था जिसके दम पर हम इतने साल उसके लौटने की राह देखते रहे। हमारे मन में यही आस बंधी थी कि पढ़ाई पूरी होते ही वह हमारे पास वापस लौट आएगा।

सुबह के करीब चार बजे मेरी आँख खुली। खिड़की से हल्की नीली भोर झांक रही थी। मैंने देखा, सुमित्रा बिस्तर पर सीधी बैठी हुई थी, दोनों हाथ घुटनों पर टिके थे और उसकी दृष्टि दीवार पर टिकी हुई थी।

मैंने उठते हुए पूछा, “क्या बात है सुमित्रा? सोई नहीं रात भर? तबीयत तो ठीक है?”

सुमित्रा ने धीरे से मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में रात वाला वह बिखराव और रोना नहीं था, बल्कि एक अजीब सा ठहराव और शांति थी। उसने बहुत ही सधे हुए स्वर में कहा, “मैं रात भर यही सोचती रही कि अगर कबीर की यह नौकरी न लगती, वह बेकार बैठा रहता या किसी छोटी-मोटी जगह संघर्ष कर रहा होता, तब भी तो हम परेशान होते न? तब हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते कि हमारे बच्चे को दुनिया की सबसे बेहतरीन कामयाबी मिले। आज जब ईश्वर ने हमारी झोली भर दी, उसे इतनी बड़ी कंपनी और इतना बड़ा अवसर मिला है, तो मैं अपने स्वार्थ के लिए आँसू बहा रही हूँ?”

मैं हैरान होकर उसे देखने लगा, “तो क्या तुम्हें अपने इकलौते बेटे के इतनी दूर चले जाने का कोई मलाल नहीं है?”

सुमित्रा एक फीकी मुस्कान के साथ बोली, “मलाल है भी और नहीं भी। वही बात है न… कभी खुशी, कभी गम। इतने सालों से भी तो वह घर से बाहर ही था। जब छुट्टियों में आएगा, तो वो दिन हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होंगे। लेकिन अगर वह केवल हमारे पास रहने के लिए अपने सपनों की बलि चढ़ा देगा, तो क्या वह अंदर से कभी खुश रह पाएगा? अगर वह यहाँ खुश नहीं रहेगा, तो क्या हम उसे उदास देखकर चैन से रह पाएंगे? उसका पूरा जीवन आगे पड़ा है, उसका करियर है। अगर हम उसे खुशी-खुशी विदा करेंगे, तो वह परदेस में भी बिना किसी अपराधबोध के, खुलकर मेहनत कर सकेगा और खुश रहेगा।”

मैं सुमित्रा का चेहरा देखता रह गया। रात भर जिस माँ के विलाप ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था, सुबह होते-होते वही माँ अपने बेटे के भविष्य के लिए चट्टान की तरह मजबूत हो चुकी थी। ममता का यह रूप सचमुच अचंभित कर देने वाला था।

सुमित्रा ने उठते हुए कहा, “सुनिए, आप उठिए और मुझे बाज़ार से सामान लाकर दीजिए। कबीर के आने में ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। उसके लिए सारे मेवे, मसाले और उसकी पसंद की चीजें लानी हैं। वह परदेस जाएगा तो अपने साथ घर का बना नाश्ता लेकर जाएगा।”

मैंने धीरे से कहा, “हाँ, तुम लिस्ट बना दो, मैं थोड़ी देर में जाकर ले आता हूँ। तब तक मुझे ज़रा दस मिनट और आँखें मूंद लेने दो।”

सुमित्रा कमरे से बाहर चली गई। मैंने करवट ली, लेकिन अब मेरी अपनी आँखें छलक आई थीं। बंद पलकों के पीछे यादों का एक पुराना झरोखा खुल गया था।

अचानक मुझे अपना अतीत याद आने लगा। आज से करीब पच्चीस-तीस साल पहले, मैं भी तो होशंगाबाद के अपने छोटे से गाँव को छोड़कर भोपाल पढ़ने आया था। मेरे बाबूजी शिवप्रसाद जी गाँव के एक साधारण किसान थे और माँ निरक्षर थीं। उन्होंने पेट काटकर, अपनी ज़रूरतें मारकर मुझे शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ाया था। जब मेरी पहली सरकारी नौकरी भोपाल में लगी थी, तो मैंने भी तो गाँव लौटने के बजाय शहर में ही बसने का सपना देखा था।

उस दिन का दृश्य मेरी आँखों के आगे किसी ताज़ा तस्वीर की तरह तैर गया। जब मुझे शहर में सरकारी क्वार्टर मिला था, तो बाबूजी स्टेशन छोड़ने आए थे। उनकी आँखों में भी ठीक वही भाव थे जो कल रात मेरी और सुमित्रा की आँखों में थे—गर्व और बिछोह का एक मिला-जुला दर्द। बाबूजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “जा बेटा, खूब नाम कमा। गाँव में रखा ही क्या है।”

उस समय मैं अपनी नई दुनिया, अपनी नई नौकरी, फिर सुमित्रा के साथ नई गृहस्थी और बाद में कबीर की परवरिश में ऐसा उलझा कि गाँव पीछे छूटता चला गया। शुरुआत में हर महीने जाता था, फिर छह महीने हुए, फिर साल भर, और धीरे-धीरे केवल किसी की शादी-ब्याह या गमी में ही गाँव जाना होता था। पिछले पाँच सालों से तो गाँव के घर के दरवाजे भी ठीक से नहीं खुले थे। बाबूजी अब अस्सी के पार हो चुके हैं, माँ के घुटनों ने जवाब दे दिया है। वे दोनों आज भी गाँव के उसी पुराने खपरैल वाले घर में अकेले रहते हैं। हम यहाँ से महीने में एक-दो बार फोन करके औपचारिकता पूरी कर लेते थे और पैसे भेजकर समझ लेते थे कि हमारा फर्ज पूरा हो गया।

हे भगवान! आज जब मेरा अपना बेटा मुझसे दूर, सात समंदर पार जा रहा था, तब जाकर मुझे उस दर्द का अहसास हुआ जो मेरे बूढ़े माँ-बाबूजी ने पिछले पच्चीस सालों से हर रोज़, हर पल घूंट-घूंट करके पिया था। आज मुझे समझ आया कि जब औलाद उड़ने के लिए अपने पर फैलाती है, तो उन बुजुर्ग परिंदों के सीने पर क्या बीतती है जिनकी पूरी दुनिया ही वह घोंसला होती है। मैं अपनी जगह अपने बाबूजी को और कबीर की जगह खुद को महसूस कर पा रहा था। पश्चाताप की एक तीव्र लहर मेरे सीने से उठी और मेरी हिचकियाँ बंध गईं।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। सुमित्रा हाथ में पानी का गिलास लिए अंदर आई। उसने मुझे बिस्तर पर बैठे रोते देखा। उसने कोई सवाल नहीं पूछा। शायद तीस साल के वैवाहिक जीवन ने उसे मेरी हर खामोशी को पढ़ने का हुनर सिखा दिया था।

उसने पानी का गिलास मेज पर रखा और मेरे पास आकर बैठ गई। उसने बहुत ही अपनत्व से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, “मैं आपकी आँखों में चल रही हलचल समझ रही हूँ। कबीर के आने से पहले चार दिन का समय है हमारे पास। क्यों न आज ही होशंगाबाद चला जाए? हम गाँव चलेंगे, माँ जी और बाबूजी को अपने साथ यहीं भोपाल ले आएंगे। अब वे गाँव में अकेले नहीं रहेंगे। कबीर आएगा तो अपने दादा-दादी के हाथ का आशीर्वाद लेकर जाएगा। और कबीर के जाने के बाद, यह घर खाली नहीं रहेगा। हम अपने बुजुर्गों की सेवा करेंगे और उनके साथ मिलकर इस सूनेपन को खुशियों में बदल देंगे।”

सुमित्रा की बात सुनते ही मेरे मन का सारा बोझ, सारा अपराधबोध जैसे आंसुओं के साथ बह गया। मैंने सुमित्रा की ओर देखा। एक स्त्री जब माँ बनती है तो त्याग की प्रतिमूर्ति होती है, और जब वह बहू बनती है तो बिखरते हुए रिश्तों को एक सूत्र में पिरोने वाली डोरी बन जाती है।

“सुमित्रा… तुम सच कह रही हो। हमने अपनी संतानों के लिए तो सब कुछ सोचा, पर जिन जड़ों से हम सींचे गए, उन्हें ही भूल बैठे थे। आज ही गाड़ी निकालते हैं और गाँव चलते हैं।”

दोपहर तक हम दोनों होशंगाबाद पहुँच चुके थे। गाँव के उस पुराने आंगन में जब मैंने कदम रखा, तो नीम के पेड़ के नीचे तख्त पर बैठे बाबूजी अपनी कमजोर आँखों पर हाथ की ओट बनाकर देखने लगे। जब उन्होंने पहचाना, तो उनके बूढ़े चेहरे की झुर्रियों में खुशी की अनगिनत धाराएं बह निकलीं। माँ लाठी टेकते हुए रसोई से बाहर आईं।

जब मैंने झुककर उनके पैर छुए और उनके गले से लगा, तो मुझे लगा कि दुनिया का सबसे बड़ा सुकून इसी आलिंगन में है। जब मैंने उनसे कहा कि अब उन्हें हमारे साथ शहर चलना होगा और हमेशा हमारे साथ ही रहना होगा, तो बाबूजी की पथराई आँखों में बरसों बाद संतोष के आंसू छलछला आए।

गाँव से लौटते समय कार की पिछली सीट पर बैठे माँ और बाबूजी खिड़की से बाहर देखते हुए आपस में बतिया रहे थे। बगल में बैठी सुमित्रा उनके लिए पानी निकाल रही थी। मैंने रियर-व्यू मिरर में देखा, शाम का ढलता सूरज अब डूबने का नहीं, बल्कि कल सुबह एक नई, सुनहरी शुरुआत का संदेश दे रहा था। मेरे मन में कबीर के परदेस जाने का दर्द अब भी था, लेकिन अपने माता-पिता को अपने पास वापस पा लेने की असीम शांति ने उस दर्द को बहुत छोटा कर दिया था। जीवन सचमुच धूप और छाँव का, मिलने और बिछड़ने का, कभी खुशी और कभी गम का ही एक खूबसूरत नाम है।

हम अक्सर अपनी संतानों के जाने के दर्द में इतने डूब जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि कभी हम भी किसी के बच्चे थे और किसी ने हमारे जाने का दर्द भी उसी खामोशी से सहा था। क्या आपने कभी अपने माता-पिता के उस अनकहे दर्द को महसूस किया है जब आप अपने करियर या सपनों के लिए उनसे दूर हुए थे? आपकी इस पर क्या सोच है, अपने विचार कमेंट में ज़रूर लिखें।

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